This is default featured slide 1 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 2 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 3 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 4 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 5 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

Sunday, 21 June 2020

गन्ना की खेती




गन्ना की खेती

गन्ना चीनी का प्रमुख स्रोत है भारत में कपड़ा उद्योग के बाद चीनी उद्योग का दूसरा स्थान है। चीनी उद्योग से देश के कुल राष्ट्रीय आय में महत्वपूर्ण योगदान है। इसमें लाखों लोगों को रोजगार प्राप्त होता है तथा हमारे भोजन में ऊर्जा का मुख्य स्रोत भी  है। गन्ने का मुख्य उपयोग शक्कर या चीनी बनाने के लिए 35 से 55% तथा गुड़ बनाने के लिए 40 से 42% और चूसने एवं बीज के लिए 18 से 20% के लिए किया जाता है।
इसके अतिरिक्त इससे शराब भी बनाई जाती है और गन्ने की खोई से कार्डबोर्ड या गत्ता तथा कागज आज बनाए जाते हैं इसे जलाने के रूप में भी प्रयोग किया जाता है।
गन्ने की हरी पत्तियां जानवरों के चारे के रूप में तथा सूखी पत्तियों को छप्पर तथा खाद बनाने में प्रयोग किया जाता है


क्षेत्रफल एवं उत्पादन

गन्ना विश्व के लगभग सभी क्षेत्रों में उगाया जाता है किंतु भारत मैं इसकी खेती लगभग 5 मिलियन हेक्टेयर में की जाती है जिससे कुल 350 मिलियन टन गन्ना पैदा होता है। इसकी औसत हो पाजी 690 कुंतल प्रति हेक्टेयर है। क्षेत्रफल और उत्पादन की दृष्टि से भारत में गन्ना उत्पादन का उत्तर प्रदेश का प्रथम स्थान है। इसकी औसत उपाय 593 कुंतल प्रति हेक्टेयर है। भारत में गन्ने की प्रति हेक्टेयर सर्वाधिक उत्पादन तमिलनाडु राज्य की 1070 कुंतल प्रति हेक्टेयर है उत्तर प्रदेश में इसकी खेती सहारनपुर मेरठ गोरखपुर तथा रोहिलखंड मंडलों में सर्वाधिक होती है।

गन्ना के लिए आवश्यक जलवायु
गन्ना उष्णकटिबंधीय जलवायु का पौधा है। इसके लिए अधिक तापमान तथा चमकीली धूप सामान आर्द्रता और पाला रहती जलवायु उपयुक्त होती है। इसके अंकुरण के लिए 25 से 30 सेंटीग्रेड तापमान अच्छा होता है जबकि इसकी वृद्धि और विकास के लिए 32 से 37 डिग्री तापमान उपयुक्त होता है इसकी खेती 50 सेमी से 250 सैनी वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में जहां सिंचाई के साधन है वहां पर आसानी से की जा सकती है।

गन्ने के लिए मिट्टी तथा खेत की तैयारी
गन्ने के लिए दोमट मिट्टी का खेत सबसे बढ़िया होता है किंतु भारी दोमट मिट्टी होने पर भी गन्ने की अच्छी फसल हो सकती है खेत को तैयार करने के लिए एक बार मिट्टी पलटने वाले हल से जोत कर तीन चार बार हैरो चलाना चाहिए । बुवाई के समय खेत में नमी होना आवश्यक है। खेत में उचित जल निकास का साधन होना चाहिए।




गन्ने के लिए  बीज का चुनाव

गन्ने का पूरा थाना कभी भी नहीं बोया जाता है इसे सदैव टुकड़ों में काटकर बोया जाता है क्योंकि गन्ने मैं शीर्ष सुषुप्त अवस्था में पाई जाती है। यदि पूरा गन्ना बिना कांटे बो दिया जाता है तो केवल ऊपरी भाग ही अंकुरित हो पाता है निचला नहीं। गन्ने में कुछ हार्मोन ऐसे होते हैं जो पौधों में ऊपर से नीचे की ओर प्रभावित होते हैं। टुकड़ों में काटकर बोलने से इनका प्रभाव रुक जाता है तथा कालिका आसानी से अंकुरित हो जाती हैं।
गन्ने के तने को टुकड़ों में काटकर बोया जाता है। काटते समय तेज धार वाले गड़ासी से इस प्रकार काटते हैं कि गन्ने की गांठ या कलिका को कोई हानि ना पहुंचे। प्रत्येक टुकड़े में दो या तीन कलिका होनी चाहिए। डीजे ऐसी फसल से लेना चाहिए जो निरोगी हो तथा उसमें की आदि का प्रकोप ना हुआ हो और बीज शुद्ध तथा स्वस्थ हो।


गन्ना बोने की विधियां---

समतल खेत में गन्ना बोना --- चंचल खेतों में गन्ना की बुवाई हल्के पीछे पंक्तियों में करते हैं। इस विधि में गन्ने के लिए 75 से 90 सेमी की दूरी पर देशी हल द्वारा 8 से 10 सेमी गहरे कोड बनाए जाते हैं जिनमें गन्ने के टुकड़ों को सिरा से सिरा मिलाकर बो दिया जाता है। आटा चलाकर टुकड़ों को ढक दिया जाता है उत्तर भारत में इसी विधि का ज्यादा से ज्यादा प्रचलन है।

रिजर द्वारा बनाए गए कूँड में गन्ना बोना

इस विधि में गन्ना रिजर द्वारा 10 से 15 सेमी गहरे कूड  बनाए जाते हैं। गन्ने के टुकड़ों को इन कुंडों में बोकर ऊपर से 5 से 7 सेमी मिट्टी डाल देते हैं। इसमें बुवाई के तुरंत बाद पानी दे दिया जाता है। पाटा नहीं लगाया जाता। यह विधि पूर्वी उत्तर प्रदेश और दक्षिणी भारत में भारी भूमि के लिए प्रचलित है।

नालियों में गन्ना बोना

यह विधि गन्ने की अधिकतम पैदावार लेने के लिए उपयुक्त है। इस विधि द्वारा खाद व पानी की बचत होती है क्योंकि उस का अधिकतम उपयोग होता है गन्ना गिरता नहीं है। इस विधि में 90 से मी की दूरी पर मजदूरों द्वारा 20 सेमी गहरी नालियां बनाई जाती हैं। इन नालियों का निर्माण करने से 45 सेमी चौड़ी नाली व 45 सेमी चौड़ी और 15 सेमी ऊंची मैंने बन जाती हैं। नालियों में उर्वरक बिखेर कर मिला दिया जाता है। इसके बाद उपचारित टुकड़ों को नालियों में एक-एक करके वह दिया जाता है और मिट्टी से ढक देते हैं।


गन्ना बोने की दोहरी पंक्ति विधि

अच्छी उपज आयु एवं खाद तथा सिंचाई सुविधा वाले स्थानों के लिए भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान लखनऊ द्वारा विकसित गन्ना बोने की दोहरी पंक्ति विधि अधिक उपयोगी पाई गई है। दोहरी पंक्ति विधि में गन्ने के दो टुकड़ों को अगल-बगल बोलते हैं जिससे पौधे भरत तो बढ़ने से पैदावार में 25 से 60% तक वृद्धि होती है।

अंकुरित गन्ने के टुकड़ों का या रेग्यून्गन बुवाई हेतु प्रयोग

रेग्यून्गन शब्द जापानी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है एक आंख वाले अंकुरित गन्ने के टुकड़े की बुवाई। भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान लखनऊ ने शोध में पाया है कि यदि बुवाई से एक या दो माह पहले गन्ने के अंगोलो को काट दिया जाए तो ऊपर ही भाग से कल खाएं सक्रिय होकर तीन से चार पंक्तियों की हो जाती हैं फिर इन्हें 40 सेमी के लंबाई की तीन आंख के टुकड़ों को काट कर बोया जाए तो उपज अच्छी होती है।


बीज की दर--  

तीन आंख के लगभग 35000 से 40000 टुकड़े जिनका वजन गन्ने की मोटाई के अनुसार 60 से 70 कुंतल हो सकता है प्रति हेक्टेयर बुवाई के लिए पर्याप्त होते हैं। देर से बुवाई करने पर बीज की मात्रा को 25 से 50% तक बढ़ा देना चाहिए।

  गन्ने का बीज उपचार

बीज जनित्र बीमारियों से बचाव के लिए कटे हुए टुकड़ों को पारा युक्त रसायन जैसे -एरीटान 6% की 280 ग्राम, या एग लाल 3% की 360 ग्राम मात्रा को 112 लीटर पानी में घोलकर बीज को उपचारित करते हैं। इससे पहले टुकड़ों को 4 से 5 घंटे पानी में डुबोकर रखने से अंकुरण अच्छा हो जाता है।


 गन्ने के लिए खाद तथा उर्वरक

पोषक तत्वों की मात्रा का निर्धारण करने से पहले खेत का परीक्षण कराना आवश्यक होता है। अधिक लंबी अवधि की फसल होने के कारण गन्ना में कार्बनिक खाद्य जैसे हरी खाद या गोबर की खाद अथवा कंपोस्ट खाद ओं का उपयोग आवश्यक होता है हरी खाद या गोबर खाद द्वारा खेत में कम से कम एक तिहाई नाइट्रोजन की मात्रा की पूर्ति करनी चाहिए शेष पोषक तत्वों की पूर्ति उर्वरकों द्वारा करनी चाहिए। यदि मृदा का परीक्षण किसी कारणवश ना हो सके तो गन्ने की फसल को निम्न पोषक तत्व प्रदान करने चाहिए जैसे
150 से 180 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 से 80 किलोग्राम फास्फोरस, 20 से 40 किलोग्राम पोटाश और लगभग 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट की आवश्यकता पड़ती है।
खाद को फसल बोने के एक महीना पहले खेत में डालकर अच्छी तरह मिला देना चाहिए। उर्वरकों द्वारा नाइट्रोजन की एक तिहाई मात्रा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय तथा नाइट्रोजन की शेष मात्रा को कल्ले फूटते समय तथा अधिकतम वृद्धि की अवस्था में देना चाहिए।

गन्ने की सिंचाई---- उत्तर प्रदेश में गन्ने में सिंचाई के अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न मात्रा में आवश्यकता होती है प्रदेश के पूर्वी भाग में चार से पांच सिंचाई मध्य क्षेत्र में 5 से 6 सिंचाई पश्चिमी क्षेत्र में 7 से 8 सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है।


गन्ने की  निराई गुड़ाई--  

 अंकुरण बढ़ाने के उद्देश्य से गन्ने में अंकुरण से पहले ही खेत की गुड़ाई करनी पड़ती है जिससे खेत में वायु संचार तथा मृदा में नमी संरक्षण भी होता है। गन्ने में बरसात शुरू होने से पहले तक निराई गुड़ाई चार पांच बार करनी पड़ती है जिसे खुरपी या फावड़े की सहायता से कर सकते हैं।

खरपतवार नियंत्रण

फसल की प्रारंभिक अवस्था में है खरपतवारो का नियंत्रण आवश्यक होता है। इसके लिए ग्रीष्मकालीन फसल में दो से तीन तथा वर्षा कालीन फसल में तीन से चार निकाय गुड़ाई की आवश्यकता होती है। निकाय गुड़ाई का कार्य खुरपी फावड़ा आदि के द्वारा किया जा सकता है। निकाई गुड़ाई करने से खरपतवार नष्ट होने के साथ-साथ मृदा मैं वायु संचार बढ़ जाता है तथा मृदा नमी संरक्षण में भी लाभ होता है। 

रासायनिक विधि से खरपतवारो को नष्ट करने के लिए वैशालीन दवा का एक किलोग्राम सक्रिय अवयव को 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से बीज बोने से पूर्व खेत में छिड़क करें मिट्टी में मिला देने से प्रारंभ में खरपतवार अंकुरित नहीं होते हैं।

मेडी चढ़ाना एवं बांधना

वर्षा शुरू होने तक खेत में फसल पर एक बार मिट्टी चढ़ाने का कार्य पूरा कर देना चाहिए। दो पंक्तियों के बीच से मिट्टी उठाकर दोनों तरफ फसल पर 15 से 20 सेमी ऊंची मिट्टी चढ़ाने से फसल गिरने से बच जाती है। और वृद्धि एवं विकास अच्छा होता है जिससे उपज बढ़ जाती है।



गन्ने की कटाई 

गन्ने की फसल की कटाई उस समय करनी चाहिए जब उसमें मिठास की अधिकतम प्रतिशत हो। यह फसल की आयु बुवाई के समय आदि पर निर्भर करती है। कटाई हेतु गन्ना पकने की जानकारी प्राय रिफ्रैक्टोमीटर की रीडिंग से ज्ञात की जाती है। जब गन्ने में ब्रिक्स 17% से अधिक हो तो गन्ना कटाई योग्य माना जाता है।

गन्ने की पैड़ी का प्रबंध 

गन्ने की मुख्य फसल को कटाई के बाद तने के भूमिगत भाग पर स्थित कालियाँ अंकुरित होकर जब पुनः नई फसल उत्पन्न करती हैं तो उस फसल को पेडी कहते हैं। भारत में गन्ने का 30% से अधिक भाग पेडी से प्राप्त होता है जबकि उत्तर प्रदेश में यह लगभग 50% है। गन्ने में पैड़ी लेने के मुख्य भाग निम्नलिखित है--
(1)- पेडी रखने से खेत की तैयारी बीज एवं बुवाई का खर्च तथा समय बच जाता है।
(2)- पैड़ी की फसल में उत्पादन व्यय कम आता है।
(3)- पेडी की फसल में चीनी प्रतिशत अधिक पाया जाता है।
(4)- पेड़ी कम समय में पक कर तैयार हो जाती है ।
(5)- शीघ्र पकने के कारण चीनी मिलें पेराई शीघ्र शुरू कर देती है।
(6)- पेडी की फसल लेने से मुख्य फसल में दी गई खाद की मात्रा के अवशेष का उपयोग हो जाता है।



पैड़ी से हानियां--

● एक खेत में लगातार गन्ने की फसल वर्षों तक खड़ी रहने के कारण फसल पर कीटों तथा बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है 
● भूमि कमजोर या खराब हो जाती है।
● कभी-कभी फसल कमजोर होने से उपज कम प्राप्त होती है जिससे किसान को आर्थिक हानि का सामना करना पड़ता है

गन्ने की पेड़ी से अधिक उपज प्राप्त करने के लिए कृषि क्रियाएं

फसल का चुनाव---- बुवाई के लिए गन्ने की अच्छी निरोग शुद्ध तथा कीट व रोग रहित फसल का चुनाव करना चाहिए। बसंत काल में बोई गई फसल पैड़ी के लिए सर्वाधिक उपयुक्त होती है।

फसल की कटाई----- फसल की कटाई फरवरी से मार्च के महीने तक तेजधार हथियार से जमीन से सटाकर करनी चाहिए जिससे खेत में अधिक डंठल ना हो।

खेत की सफाई---- खेत में अनावश्यक ठूॅठो की छटाई, पत्तियों को इकट्ठा करके जलाना, खरपतवार को नष्ट करना खेत में बनी  मेड़ों को तोड़ना, फावड़े की सहायता से खेत में पड़े कूड़े करकट को इकट्ठा करके जलाना, आदि।


गन्ने के प्रमुख कीट एवं रोग तथा नियंत्रण

दीमक-- यह कीट बुवाई से कटाई तक कभी भी लग सकता है। यह गन्ने के बोए हुए टुकड़ों, जड़ तथा तने को काटकर वहां पर मिट्टी भर देता है।

नियंत्रण विधि--  इस कीट के नियंत्रण के लिए 4% फेनवैलेरेट की धूल का 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बोरगांव करना चाहिए अथवा एमेड़ा क्लोप्रेड 200 एसएल की 400 मिलीमीटर मात्रा को 2000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।

तना बेधक कीट----  यह कीट गन्ने के तने में छेद करके प्रवेश कर जाता है तथा उसे अंदर ही अंदर खाता रहता है गन्ना फाड़ने चीरने पर लाल रंग का दिखाई देता है यह कीट गन्ने को अधिक नुकसान पहुंचाते हैं।

नियंत्रण विधि--- जुलाई से अक्टूबर तक 15 दिन के अंतर पर ट्राइकोकार्ड का प्रयोग करें। अगस्त से सितंबर माह में मोनोक्रोटोफॉस की 2 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 1000 लीटर पानी में घोलकर 15 दिन में दो बार छिड़काव करें

कण्डुआ रोग--- इस रोग के कारण अगले की पत्तियां छोटी , पतली व नुकीली हो जाती है इसका अंगुली से लगाव एक समान दूरी पर इस प्रकार हो जाता है कि अंगोला पंखी नुमा लगता है। आगोले के सिरे से काले रंग का चाबुक जो कि एक सफेद पतली झिल्ली से ढका रहता है निकल आता है जिसकी लंबाई लगभग 1 मीटर तक हो जाती है।

नियंत्रण (1)- बीजोपचार करके टुकड़ों की बुवाई करना।
(2)- रोग रोधी प्रजातियों  को लगाना।
(3)- रोगी फसल से पेडी ना लेना।
(4)- रोग ग्रस्त पौधों को उखाड़ कर या जलाकर नष्ट कर देना

● उकठा रोग--- यह फफूंदी से फैलने वाला रोग है इससे प्रभावित गन्ने के अगोले शुरू में पीले पड़ने लगते हैं तथा धीरे धीरे पूरा अंगोला सूख जाता है और नीचे की ओर मुड़ जाता है। इन गन्नों की पोरियों का रंग हल्का पीला तथा अंदर से खोखला हो जाता है।

नियंत्रण--  इस कीट के नियंत्रण के लिए एगलाल या एरीटान से बीजोपचार करना।उचित फसल चक्र अपनाना। रोग रोधी किस्मों का प्रयोग करना।


पत्ती की लालधारी--- गन्ने की पत्तियों पर लाल अथवा भूरे रंग की समांतर धारियां निचली सतह पर पड़ जाती है। कभी-कभी धारियॉ इतनी अधिक हो जाती है कि पूरी लाल दिखने लगती है। पत्तियों का क्लोरोफिल समाप्त हो जाता है इस रोग से फसल की बढ़वार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

नियंत्रण--- (1) बीज उपचार करना।
(2)  रोग रोधी प्रजातियों की बुवाई करना।
(3) उचित फसल चक्र का प्रयोग करना।




   गन्ने का बीज उत्पादन----

(1)- गन्ने के आधार पर बीज उत्पादन के लिए प्रजनक बीज गन्ना नर्सरी से प्राप्त किया जा सकता है जो शुद्ध किस्म का हो, अर्थात रोग मुक्त होना चाहिए।
(2)- ऐसे खेत का चुनाव करना चाहिए जो उपजाऊ हो उचित जल निकास युक्त हो, तथा उसमें पिछले वर्ष से गन्ने की कोई फसल न की गई हो
(3)- बीज को 50 सेंटीग्रेड पर 2 घंटे तक फफूंदी नाशक दवा से उपचारित करने के बाद बुवाई करनी चाहिए।
(4)- गन्ने की अधिक उपज लेने के लिए 150 किलोग्राम नाइट्रोजन 100 किलोग्राम फास्फोरस तथा 75 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में प्रयोग करना चाहिए।
(5)- भूमि की किस्म तथा क्षेत्र की जलवायु के अनुसार सिंचाई की आवश्यकता होती है। खेत में उचित जल निकास की सुविधा होना अति आवश्यक है।
(6)- खरपतवार नियंत्रण के लिए रासायनिक दवाओं का प्रयोग करना चाहिए ।
(7)- उकठा व कंडुआ गन्ने के मुख्य रोग हैं। इनसे प्रभावित गन्ने के झुण्डों को कड़ाई से पूर्व निकाल कर नष्ट कर देना चाहिए।
(8)- कंसुआ, तनाबेदक ,दीमक गन्ने के प्रमुख कीट है। इनका नियंत्रण समय से रसायनों के प्रयोग से करना चाहिए।
(9)- आवाच्छनीय पौधों को समय-समय पर निकालते रहना चाहिए।
(10)- गन्ने की फसल 10 महीने की होने पर कटाई की जा सकती है। किंतु यह ध्यान रखना चाहिए कि कटाई ,छिलाई तथा ढुलाई के समय गन्ने की आंख को नुकसान ना होने पाए तथा कटा हुआ गन्ना अधिक समय तक धूप में ना रहने पाए। इसलिए बुवाई के समय ही गन्ने की कटाई करना अच्छा रहता है।



केला की खेती


केला की खेती
केला एक  बहुत प्राचीनतम पौधा है। जो प्राचीनकाल समय से ही भारतवर्ष मे उगाया जा रहा है। इसमे खनिज पदार्थ तथा विटामिन प्रचुर मात्रा मे पाये जाते है। हमारे देश मे हिंदुओं के सभी धार्मिक  तथा शुभ कार्यों मे केले को प्रमुख स्थान मिल है। कोई भी धार्मिक उत्सव या शादी विवाह ऐसा नहीं है जिसमे केले के पौधे अथवा पत्तों का प्रयोग न किया जाता हो।  केले के फलों का प्रयोग फल की तरह खाने मे,सब्जी के रूप मे,आटा,चॉकलेट ,फिग,चिप्स इत्यादि के रूप मे किया जाता है।
केले के लिए जलवायु 



केला उष्ण जलवायु का पौधा है। जो भू मध्य रेखा के दोनों तरफ गर्म तथा ठंडी जलवायु के क्षेत्रों मे अधिक मात्रा मे पैदा किया जाता है। जहां पर वर्ष अधिक होती है। यह मध्य तथा उत्तरी भारत मे ऐसे क्षेत्रों मे पैदा किया जाता है जहां पर गर्मियों मे गर्म व तेज हवाये चलती है। तथा जाड़ों मे पाला पड़ता है। 175 से 200 सेमी वर्षा वाले क्षेत्र इसके लिए उपयुक्त होते है। इसकी उचित वृद्धि व विकास के लिए औसत 25-27 सेन्टीग्रेट तापक्रम तथा 77 प्रतिशत आपेक्षिक आर्द्रता की आवश्यकता होती है। भारतवर्ष मे केले के लिए उत्तम जलवायु केरल,तमिलनाडू ,महाराष्ट्र तथा बंगाल मे उपलब्ध है। 


केले के लिए  मिट्टी 
केले की खेती सभी प्रकार की मिट्टी मे की जा सकती है। इसके लिए उर्वर,गहरी,बलुई तथा दोमट मिट्टी सर्वोत्तम होती है। नदियों के किनारे की भारी व जलोढ़  मिट्टी मे भी केले को सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। इसे हम अपने घर पर गमलों मे भी लगा सकते है।
केले की किस्म ---- उपयोग के आधार पर केले की जातियों को निम्नलिखित पाँच भागों मे विभाजित किया गया है--
[1] पकी हुई ताजी खाई जाने वाली ---अल्पना,हरीछाल,रथाली,रजेली,सफ़ेदबेलची,चम्पा,पुवन, अमृतसागर ,बसराई,मर्तमान,आदि।
[2] सब्जी के रूप मे खाई जाने वाली ------ हजारा मंथन,पचमोभ, माइण्डोली मंथन नेंद्रन चिनिया, अमृत भान काबुली, कोलंबो ,मुथेली ,मुंबई मुठिया, केपियर गंज आदि।
(3) चिप्स में प्रयुक्त किस्में।
(4) जैम बनाने के लिए किस्में।
(5) पाउडर बनाने में प्रयुक्त किस्मे।
केले की प्रमुख जातियों के गुण
●    पुवन----
इसे लालबेल्ची, चंपा ,चीनी चंपा आदि भी कहते हैं यह दक्षिण भारत, पश्चिम बंगाल तथा आसाम में उगाई जाती है। इसके पौधे लंबे होते हैं फल पतला तथा फल का छिलका पतला पीले रंग का होता है। फलों मैं अविकसित बीज भी पाए जाते हैं इसके फल गुच्छे में 200 से 220 फल आते हैं। यह पर्ण- चित्ती रोग के लिए प्रतिरोधी तथा टिकाऊ किस्मे है। यह दक्षिण भारत की सबसे लोकप्रिय किस्म है।
● रॉबस्टा--- इसके पौधे मध्यम ऊंचाई के होते हैं। इसकी खेती मुख्य रूप से महाराष्ट्र ,आंध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु में की जाती है। इसके पहले लंबे, गुच्छे सघन तथा गोदा मुलायम क्रीम रंग का होता है। यह  पर्ण चित्ती रोग से अधिक तथा पनामा रोग से कम ग्रसित होता है।
मंथन----- इसे बंकेश, कसादिया, कनचर केला आदि भी कहते हैं। इसकी खेती सब्जी के लिए केरल मदुरई तंजौर कोयंबटूर सूरत तथा बड़ौदा में की जाती है। इसके पौधे लंबे होते हैं। प्रतिफल गुच्छे इसमें 100 से 110 फल लगते हैं। इस की भंडारण क्षमता अधिक होती है।
हरी छाल------ ऐसे ही मुंबई ,मालभोग ,बनान व राजपुरी भी कहते हैं। इसकी खेती मुंबई तथा आंध्र प्रदेश के क्षेत्रों में की जाती है। इसके फल लंबे, सीधे तथा गहरे रंग के होते हैं। यह किस्म पर्ण चिट्टी रोग से अधिक ग्रसित होती है।
अल्पान----- इसका पौधा 3 से 4 मीटर तथा सफेद हरा, भारी लंबा कसा हुआ, फलियां मध्यम पकने पर पीली स्वादिष्ट खटास लिए हुए मीठी तथा टिकाऊ होती हैं।
नेंद्रन--- इसे बाना नेंद्रन, ऑटू नेंद्रन, राजेली आदि नामों से जाना जाता है। इसके पौधे लंबे ,फल बड़े व मोटे होते हैं। यह किस्म मालाबार कर्नाटक तथा कोचिन में अधिक होती है।


प्रवर्धन या प्रसारण----- केले का प्रसारण अधो भुस्तारी द्वारा वानस्पतिक तरीके से किया जाता है आधो- भूस्तारी  दो तरह के पाए जाते हैं-
(1) नुकीली वा पतली पत्तियों वाले----- यह अधो-भूस्तारी पतली नुकीली पत्तियों वाले तलवार की तरह होते हैं। देखने में कमजोर मालूम होते हैं लेकिन इनके आंतरिक रूप से यह अधिक ताकतवर होते हैं। प्रसारण के लिए इनका ही प्रयोग किया जाता है।
(2) चौड़ी पत्तियों वाले------- यह अधो- भूस्तारी चौड़ी पत्तियों वाले होते हैं। देखने में यह अधिक मजबूत एवं ताकतवर दिखाई देते हैं लेकिन ये आंतरिक रूप से कमजोर होते हैं। यह अधो भुस्तारी प्रसारण के लिए प्रयोग नहीं करने चाहिए।
रोपण---
पश्चिमी तथा उत्तरी भारत में केला लगाने का सबसे अच्छा समय जून-जुलाई है। दक्षिणी भारत केरल मालाबार मैं सितंबर से अक्टूबर तक तथा कर्नाटक और आंध्र प्रदेश तथा उड़ीसा में केला लगाने का सबसे उपयुक्त समय जून है।
रोपड़ का कार्य दो विधियों द्वारा किया जा सकता है-
(1) नालियों में रोपाई---- खेत की अच्छी तरह तैयारी करें 50 सेमी चौड़ी तथा 50 सेमी गहरी और 3 मीटर की दूरी पर नालियां बनाई जाती हैं। इन नालियों में किस्म के अनुसार एक या 2 मीटर की दूरी पर केले की रोपाई की जाती है।
(2) गड्ढों में रोपाई----- गड्ढों को 2 से 3 मीटर की दूरी पर पंक्तियां बनाकर 45×45×45 सेमी आकार के गड्ढे खोद लिए जाते हैं। इसमें ढाई सौ से 300 कुंतल प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर की खाद का भराव कर दिया जाता है प्रति गड्ढे 10 किलोग्राम गोबर की खाद तथा 100 ग्राम नाइट्रोजन, 80 ग्राम फास्फोरस, तथा 100 ग्राम पोटाश का भराव उपयुक्त होता है।
इन्हीं गड्ढों में केलो की रोपाई की जाती है।
खाद तथा तथा उर्वरक----
भूमि की उर्वरता के अनुसार प्रति पौधा 18 से 20 किलोग्राम गोबर की साड़ी खाद, 300 ग्राम नाइट्रोजन, 100 ग्राम फास्फोरस तथा 300 ग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है। गोवर की साड़ी खाद गड्ढे को भरते समय प्रयोग करें। फास्फोरस की आधी मात्रा रोपाई के समय सतह से आधी मात्रा रोपाई के बाद देनी चाहिए। नत्रजन की पूरी मात्रा पांच भागों में विभाजित कर अगस्त, सितंबर ,अक्टूबर ,फरवरी तथा अप्रैल महीने में देनी चाहिए। और पोटाश को तीन भागों में विभाजित कर सितंबर ,अक्टूबर तथा अप्रैल महीने में देनी चाहिए।
सिंचाई---- रोपाई के तुरंत बाद एक सिंचाई अवश्य कर देनी चाहिए, इसके बाद वर्षा ऋतु में वर्षा ना होने पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहें। जाड़ों में आवश्यकतानुसार 15 से 20 दिन के अंतर पर तथा ग्रीष्म ऋतु में हर 7 से 8 दिन के अंतर पर सिंचाई करते रहना चाहिए।
निकाई गुड़ाई व देखभाल---
केले के प्रारंभिक अवस्था में आवश्यकतानुसार निराई गुड़ाई कर खरपतवार को खेत से निकाल देना चाहिए। वर्षा  समाप्त होने के बाद पौधों पर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए जब तक पौधों में फूल बनाना प्रारंभ ना हो जाए तब तक पुतियों को नहीं बढ़ने देना चाहिए। कभी-कभी यह पौधे गिर भी जाते हैं। इन्हें गिरने से बचाने के लिए बांस या लकड़ी के सहारे का प्रयोग आवश्यक होता है ।
अंतरासस्य-----
पौधों को लगाने के पश्चात उद्यान में सनई को हरी खाद के रूप में बोया जा सकता है। ऐसा करने से भूमि कटाव से सुरक्षित रहती है एवं उसको जमीन में जोत कर खाद्य नत्रजन की मात्रा को भी बढ़ाया जा सकता है।
केले के पौधे की निचली पत्तियां आधी सूख जाती हैं जो सूर्य की रोशनी से इनकी रक्षा करती हैं। पत्तियों के  सूख जाने पर इसे तेज चाकू से काटा जा सकता है।


बहु वर्षीय फसल की वृद्धि के नियमानुसार करना----
फल वृक्ष को बहु वर्षीय बनाने के लिए जब पौधे पर फल आने लगे उस समय केवल एक स्वस्थ अधो-भूस्तारी को आगे वृद्धि के लिए छोड़ देना चाहिए। शेष अधो-भूस्तारी को तेज चाकू से काटकर अलग कर दें जब पैतृक वृक्ष के फल पक जावे उस समय दूसरे अधो-भूस्तारी के आगे वृद्धि करने देना चाहिए।
पैतृक वृक्ष के फल तोड़ने के बाद, काट देना चाहिए। उस समय पहला अधोभूस्तारी जो 5 से 6 महीने का होता है। पैतृक वृक्ष का स्थान ले लेता है। इस प्रकार से 6-6 महीने बाद एक-एक अधोभूस्तारी की वृद्धि करके इसकी बहु वर्षीय फसल को नियमानुसार किया जा सकता है।
मिट्टी चढ़ाना अथवा सहारा देना
बागवानी की निकाई कुड़ाई के बाद पौधों के चारों ओर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए जिससे पानी पौधों के तने से सीधे संपर्क में नहीं आते तथा पौधे को सहारा भी मिल जाता है। केले के फलों का गुच्छा भारी होने के कारण पौधे नीचे को झुक जाते हैं उन्हें सहारा ना देने पर गिर भी जाते हैं। पौधों को सहारा देने के लिए दो बांसों को आपस में बांधकर कैंची की तरह बना लेते हैं तथा फलों के गुच्छे में लगाकर सहारा देते हैं।
फूल और फल लगना----
केले के पौधे पर फूल एवं फल अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न भिन्न समय पर लगते हैं। दक्षिण तथा पश्चिम भारत में केले की अगेती किस्में रोपाई के लगभग 7 महीने बाद फूलने लगती हैं। केला फूलने के अगले 7 महीने के अंदर फलियां पक कर तैयार हो जाती हैं। इस प्रकार के लोगों की रोपाई के लगभग 14 महीने पश्चात फल उपलब्ध हो जाते हैं और दूसरी फसल 20 से 25 महीने के बीच तैयार हो जाती है। पौधे से फल के घेर को अलग कर लेने के बाद पौधे को भूमि की सतत से काट दिया जाता है। क्योंकि केले के पेड़ पर पूरे जीवन काल में सिर्फ एक बार फल लगते हैं। तने को एक बार में ना काट कर उसे दो या तीन बार में काटना चाहिए जिससे पुत्ती पर हानिकारक प्रभाव ना हो। ठेले पर लगने वाले पुष्प का रंग लाल होता है। स्कूल में नर और मादा दोनों ही पाए जाते हैं। किंतु इसमें निषेचन की क्रिया नहीं हो पाती जिससे फल में बीज नहीं बनता है।
कटाई----- जब फल पूर्णत  परिपक्व हो जाए  तो उसको हरी दशा में ही फलों के गुच्छे को तेज चाकू से काट लेना चाहिए। और बाजार में बिक्री के लिए भेज दिया जाता है।
फलों को पकाने----
                          केले को पकाने के लिए धार को किसी बंद कमरे में रखकर केले की पत्तियों से ढक देते हैं। एक कोने में उपले तथा अंगीठी जलाकर कमरे को गीली मिट्टी से सील कर देते हैं। रघुवर 48 से 72 घंटे में केला पक कर खाने योग्य हो जाता है। इस तरह केला पकाने से चित्तियां पड़ जाती हैं तथा उनमे मिठास अधिक हो जाती है। केले के ढेर पर 500 पीपीएम एथिल का छिड़काव करके ढेर को बोरे से ढक देने से केला अच्छी तरह पक जाता है।
उपाज------ केले की उपज जलवायु तथा जातियों पर अधिकतर निर्भर करती है। केले का औसत उत्पादन 300 से 400 कुंतल प्रति हेक्टेयर हो जाता है।
केले में लगने वाले कीट
तना छेदक---- इस कीट के ग्रब्स पौधे के तने में छेद करते हैं जिसके कारण सड़न पैदा हो जाती है।
इसके नियंत्रण के लिए फोरेट   या थीमेट 10 जी दानेदार कीटनाशी को प्रतिपदा 25 ग्राम प्रयोग करना चाहिए।
केले पर पत्ती बिटल----- यह कीट केले की पत्तियों को खाकर नुकसान पहुंचाते हैं। इसके नियंत्रण के लिए मिथाइल लो डीमेटऑन 25 ई० सी० को 1 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।
फल छेदक कीट-----  इस कीट के कैटरपिलर फल में नीचे की तरफ से छेद करके अंदर सुरंग बना देते हैं जिसके कारण फली सड़ जाती है। इस कीट के नियंत्रण के लिए 0.25%  सुमिसीडीन का छिड़काव करना चाहिए।
मूल छेदक सूत्रकृमि----ये सूक्ष्मजीव पतले धागे के समान होते हैं जो केले की जड़ों पर आक्रमण करते हैं और उन पर कांटे बना देते हैं जिससे पौधे की वृद्धि व विकास रुक जाता है।
रोकथाम---- पौधे के चारों तरफ गुड़ाई करके नीम की खली मिला दें या नेमागान का छिड़काव करें। उचित फसल चक्र अपनाएं।
केले में लगने वाले रोग तथा नियंत्रण
पनामा रोग--- यह केले का सबसे हानिकारक रोग है जो फ्यूजेरियम ऑक्सीपोरम स्पेक्ट्रम कुबेन्स नामक फफूंद के कारण होता है। इस रोग से प्रभावित पौधे में सर्वप्रथम नीचे की पुरानी पत्तियों पर हल्की पीली धारियां बनती है और वे टूट कर लटक जाती हैं। ऊपर की नई पत्तियों को छोड़कर सभी पत्तियां गिर जाती हैं। नई पत्तियों की सतह दागदार पीली तथा सिकुड़न दार होती है।
रोकथाम  (1)- रोग से प्रभावित पौधे को जड़ से उखाड़ कर नष्ट कर दें
(2)- नाइट्रोजन का उपयोग कम कर दें।
(3)- जिस खेत में यह रोक लगा हो उसमें 3 से 5 वर्ष तक केले की फसल ना करें।
(4)- बाविस्टिन  के 0.2 %  घोल को मिट्टी में मिलाना चाहिए।
(5)- खेत में पानी भर देने से इसका प्रभाव कम हो जाता है।
गुच्छा शीर्ष रोग ( बन्ची टॉप)--
        भारत में उन सभी क्षेत्रों में जहां पर केले की बागवानी की जाती है वहां पर इस रोग का प्रकोप देखा गया है ।यह वायरस से होने वाला एक भयानक रोग है। इस रोग से प्रभावित पौधे की पत्तियां छोटी एवं संकरी हो जाती है तथा उनके किनारे ऊपर की ओर मुड़ जाते हैं, पत्तियां छोटे डंठलो वाली हो जाती है एवं पौधे का ऊपरी सिरा एक गुच्छे में परिवर्तित हो जाता है। कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि यह रोग माइक्रो प्लाज्मा के द्वारा होता है।
रोकथाम-(1) रोग ग्रस्त पौधों को उखाड़ कर जला दें या मिट्टी में दबा दें।
(2) महू के कीट नियंत्रण के लिए मेलाथियान 50 ई सी के 0.1% घोल का छिड़काव करना चाहिए।
फल बिगलन या झुलसा रोग---
यह रोग एक फफूंदी द्वारा उत्पन्न होता है जिसे ग्यीयोस्पोरियम फ्यूजेरम कहते हैं। यह फफूंद नम मौसम मे मुख्य रूप से बरसात में काफी सक्रिय होता है। इस रोग से फलों के गुच्छे एवं डंठल काले हो जाते हैं तथा बाद में सड़ने लगते हैं।
रोकथाम---- इस रोग की रोकथाम के लिए कॉपर ऑक्सिक्लोराइड का 0.3% का छिड़काव करना चाहिए।
अंतः बिगलन----- 
यह रोग फफूंद द्वारा होता है। इस रोग से प्रभावित पौधों के अंदर की पत्तियां गल जाती है और नई पत्तियों के निकलने में रुकावट पैदा  करती है। इस प्रकार से पत्तियों का गलना अंदर की ओर बढ़ता चला जाता है और अंततोगत्वा फूल नहीं निकल पाता।
रोकथाम (1)- खेत में उचित जल निकास की व्यवस्था करें।
(2)-- पौधों को उचित दूरी पर लगाएं।
(3)-- डाईथिन m-45 के 0.25% घोल का छिड़काव करें।






काशीफल की खेती


काशीफल की खेती भारत में प्राचीन काल से की जा रही है इसके पके फलों को सामान्य ताप पर काफी लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है इसकी कोमल पत्तियों तथा फूलों से भी सब्जी बनाई जाती है इनके बीजों से कीटनाशक तैयार किए जा सकते हैं।

 जलवायु---सीताफल गर्म मौसम की सब्जी है इसकी खेती जायद तथा खरीफ दोनों मौसम में की जाती है। नेपाली के प्रति बहुत प्रभावित होती है इसके अंकुरण के लिए 20 से 21 सेंटीग्रेड तथा वृद्धि और विकास के लिए 22 से 25 सेंटीग्रेड तापक्रम उचित होता है।

भूमि एवं उसकी तैयारी---

यह फसल सभी प्रकार की मिट्टियों में उगाई जा सकती है। इसके लिए हल्की दोमट मिट्टी सर्वोत्तम मानी जाती है। भूमि में उचित जल निकास का होना आवश्यक होता है।
इसलिए खेत की तैयारी के लिए एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा 3-4 जुताइयाॅ कल्टीवेटर से करनी चाहिए प्रत्येक देसी हल्की जुताई के बाद पाटा लगाकर खेत को भुरभुरा बना लिया जाता है।

उन्नत किस्में----
पूसा विश्वास ,कोयंबटूर-1, कोयंबटूर-2 ,पूसा विकास , पूसा रत्नाकर ,पूषा अलंकार, सोलन बादामी ,आजाद कद्दू, पूसा शंकर ,सी॰एम-14,

 पूसा विश्वास ----
बीज बोने लगभग 120 दिन के अंदर फल पककर तैयार हो जाता है । फल गोल एवं मध्यम आकार के होते है। इनकी उपज 300 से 400 कुंतल तक मिल जाती है।

पूसा विकास --- यह  किस्म 125 दिन मे तैयार हो जाती है। फल गोल तथा छोटे आकार के होते है। यह किस्म व्यवसायिक उत्पादन के लिए उपयुक्त है। इस किस्म का औसत उत्पादन 300 कुंतल प्रति हेकटेर है।

अर्का चंदन----यह फल माध्यम आकार के जिनका औसत भार 2.5 से 3 किलोग्राम और फल दोनों सिरों पर कुछ दबा हुआ होता है। गूदा मीठा व अत्यंत मधुर गंध वाला होता है। इनमे विटामिन ए अधिक मात्रा मे पाया जाता है। इस किस्म की ऑसत उपज 325 कुंतल प्रति हेक्टेयर है।

अर्का सूर्यमुखी-----  इस किस्म के फल लगभग 110 दिन मे तैयार हो जाते है। फल छोटे,गोल चपटे व नारंगी रंग के होते है। फलों पर सफेद धारियाँ बनी होती है,गूदा सुगंधित एवं अधिक विटामिन सी वाला होता है। यह किस्म फल मक्खी के लिए अत्यंत प्रीतिरोधी होती है। इस किस्म का औसत उत्पादन 350 कुंतल प्रति हेक्टेयर है।

वी आर एम 5---- यह किस्म भारतीय अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली द्वारा तैयार की गई है। इसका गूदा गहरे हरे रंग का होता है। यह किस्म फफूंदी तथा कुकूम्बर ग्रीन मोटेल विषाणु की प्रतिरोधी किस्म है।

पूसा संकर --- -यह किस्म लगभग 120 दिन मे फसल देना शुरू कर देती है। इसके फल चपटे और भार मे लगभग 4.5 किलो के होते है। इनकी लताओं की लंबाई अधिक होते है। इस किस्म का उत्पादन 450 कुंतल प्रति हेक्टेयर है।

कोयंबटूर---- यह एक पछेती किस्म है। जो लगभग 125 से 135 दिनों मे तैयार हो जाती है। फल ग्लोब के आकार के मध्यम बड़े एवं आकर्षक होते है। प्रत्येक बेल पर 7 से 9 फल लगते है।


खाद तथा उर्वरक----
गोबर की सड़ी खाद   -------200 से 250 कुंतल प्रति हेक्टेयर
नाइट्रोजन        ---------    50 से 60 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर 
फास्फोरस-------'----         70 से 80 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर 
पोटाश    ----------------   50 से 60 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर
गोबर की खाद बीज बोने की तीन चार सप्ताह पूर्व खेत में मिला दे नाइट्रोजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा बीज बोने के समय खेत में अच्छी तरह से मिला देनी चाहिए नाइट्रोजन की आधी मात्रा जो पौधे पर तीन से चार पत्तियां आ जाएं तथा शेष नाइट्रोजन फूल निकलने के समय पौधों के चारों तरफ से टॉप ड्रेसिंग के रूप में देकर मिट्टी में मिला दें तथा बाद में सिंचाई कर दें।

बोने का समय
ग्रीष्मकालीन फसल  -------- जनवरी से मार्च तक 
वर्षा कालीन फसल----------- जून से जुलाई तक


बोने की विधि 
(1) ग्रीष्मकालीन फसल की बुवाई नालियों में की जाती है यह नालियां 70 से 75 सेमी चौडी 10 से 12 सेमी गहरी तथा 150 सेमी की दूरी पर बनाई जाती है नालियों में 2-3 बीज एक स्थान पर 60 सेमी की दूरी पर बोए जाते हैं।
(2) वर्षा कालीन फसल में 1.5 मीटर की दूरी पर थाले बनाकर एक स्थान पर तीन या चार बीज 3 से 5 सेमी की गहराई पर लगाए जाते हैं एक थाले से दूसरे थाले की दूरी 1 मीटर रखी जानी चाहिए।


सिंचाई तथा जल विकास---वर्षा कालीन फसल में आमतौर पर सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है यदि लंबे समय तक वर्षा ना हो तो आवश्यकतानुसार सिंचाई कर देनी चाहिए। ग्रीष्मकालीन में फसल की 5 से 7 दिन के अंतर से सिंचाई करनी चाहिए। 
वर्षा कालीन फसल के लिए जल निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए जिससे खेत के फालतू पानी को समय से बाहर निकाला जा सके।


खरपतवार नियंत्रण-------
ग्रीष्मकालीन फसल में दो से तीन तथा वर्षा कालीन फसल में तीन से चार बार निकाय गुड़ाई की आवश्यकता होती है निकाय गोडाई का कार्य खरपी तथा फावड़ा के द्वारा किया जा सकता है। निकाई गुड़ाई करने से खरपतवार नष्ट होने के साथ-साथ मिट्टी वायु संचार बढ़ जाता है तथा मिट्टी नमी संरक्षण में भी लाभ होता है।
खरपतवार को नष्ट करने के लिए वैशालीन दवा का एक किलोग्राम सक्रिय अवयव को 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से बीज बोने से पहले खेत में छिड़क छिड़क कर मिट्टी में मिला देने से खरपतवार अंकुरित नहीं होते हैं।


रोग नियंत्रण----

(1) मृदु रोमिल आसिता 
यह फफूंदी केवल पत्तियों पर आक्रमण करती है जिन क्षेत्रों में वर्षा अधिक होती है वहां पर इसरो का प्रकोप अधिक होता है। पत्तियों की ऊपरी सतह पर पीले से लेकर भूरे रंग के धब्बे पढ़ते हैं तथा निचली सतह पर रुई के सामान मुलायम वृद्धि होती है जिसके कारण पौधों पर फल कम लगते हैं।
रोकथाम--
इस रोग के नियंत्रण के लिए डाईथेन  M-45  के 0.2% के घोल का 10 से 15 दिन के अंतराल पर दो से तीन बार छिड़काव करते है।


पाउडर आशिता  --
इस रोग से पत्तियों पर सफेद तथा पीले रंग का पाउडर जैसा पदार्थ इकट्ठा हो जाता है और बाद में बादामी रंग बदल कर पत्तियां समाप्त हो जाती हैं।
रोकथाम---- इस रोग के नियंत्रण के लिए 0.3%  केराथेन का छिड़काव करना चाहिए।


कीट नियंत्रण

ऐपीलेकना कीट--- यह कीट फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं यह अंकुरित हो रहे छोटे पौधों को खाते हैं।
उपाय--- मैलाथियान के घोल का छिड़काव करना चाहिए।

तना छेदक कीट----इस कीट की सुडियाॅ रात में निकलते हैं जो कोमल तनों को जमीन की सतह से काट देती है।
उपाय---
इन कीटों से बचाव के लिए अंतिम जुताई के समय हेप्टाक्लोर 5% के घोल को 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में अच्छी तरह से मिला दे।

फल मक्खी ---- इस कीट की मादा अपने अण्डरोपक को फलों की ऊपरी सतह के ठीक नीचे प्रवेश कराकर अंडे देती है। वे अंडे फल के अंदर फूटते है। और उनसे मैगत निकलता है। जो फलों को अंदर ही अंदर खाता रहता है। जिससे फल खराब हो जाते है।

रोकथाम--- जब पौधे पर फूल आना प्रारंभ हो जाए उस समय सेविन दवा के 0.2 प्रतिशत घोल का 15 दिन के अंतराल पर 2 से 3  छिड़काव करने चाहिए।

माहू ---- ये अत्यंत छोटे-छोटे हरे रंग के कीट होते है। इनके शिशु तथा प्रौड पौधों के कोमल भागों से रस चूसते है। इन कीटों की संख्या बहुत तेजी से बडती है। पत्तियां पीली पड़ जाती है। यह कीट विषाणु के फैलाने का कार्य करता है। इस कीट का प्रकोप उस समय अधिक होता है जव तापमान सामान्य से कम हो और आर्द्रता अधिक हो।
रोकथाम---- इस कीट के नियंत्रण के लिए साइपर मेथन, के 0.15 प्रतिशत घोल का छिड़काव करना चाहिए। 

फलों की तोड़ाई-----सीताफल की कटाई पूर्ण रूप से पक जाने पर की जाती है जो बाजार की मांग पर आधारित होती है बीज बोने के 70 से 90 दिनों के बाद हरे फल तोड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं फल जब औसत आकार का हो जाए तो मुलायम अवस्था में ही तोड़ लेना चाहिए। लंबे समय के भंडारण के लिए फलों को उस समय तोड़ना चाहिए जब वह पूरी तरह से पक जाए।


बीज उत्पादन---
 सीताफल के शुद्ध बीज उत्पादन के लिए पृथक्करण की दूरी 400 मीटर रखनी चाहिए। जिससे दूसरी किस्म से पर परागण ना हो सके बीज लेने वाली फसल से आवांछनीय पौधों को प्रारंभिक अवस्था में ही निकाल देना चाहिए।

बीज उत्पादन वाली फसल से खरपतवार के साथ ही कीट एवं रोग नियंत्रण पर भी ध्यान रखना चाहिए फलों की कटाई पूर्ण रूप से पकने के बाद ही करें उसे कुछ दिनों तक रखने के बाद बीजों को गूदो से अलग करके साफ पानी से धोने के बाद धूप में सुखा लेना चाहिए। इस प्रकार 3 से 4 क्विंटल बीज प्रति हेक्टेयर प्राप्त होता है

मूली की खेती



भारतवर्ष में उगाई जाने वाली जड़ वाली सब्जियों में मूली का प्रमुख स्थान है इसकी जड़ पत्तियां एवं फलियां सभी का उपयोग किया जाता है मूली कब्ज को दूर करती है यह मूत्र को खोल कर लाती है और भूख भी बढ़ाती है सभी रोगों में मूली नित्य सेवन करने योग्य शाक  है। मूली में पाई जाने वाली चरपराहट मिथाइल आइसो थायो सायनाइड की उपस्थिति के कारण होती है।

पोषक मूल्य----
स्वास्थ्य की दृष्टि से मूली को मानव भोजन में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है मूली के संपूर्ण पौधे का किसी न किसी रूप में प्रयोग किया जाता है इसका उपयोग सब्जी सलाद पराठा आदि के रूप में किया जाता है।

जलवायु----मूली को सभी प्रकार के मौसम में उगाया जा सकता है इसकी यूरोपियन किस्मों को कम तापमान की आवश्यकता होती है जबकि एशियाई किस्मों को ऊंचे तापमान की आवश्यकता होती है मूली की अच्छी जुड़े बनने तथा अच्छे स्वाद के लिए 10 से 15 सेंटीग्रेड तापमान अच्छा रहता है।

भूमि----इसके लिए बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है बलुआ दोमट मिट्टी जिसमें जीवांश की मात्रा अधिक हो ऐसी मिट्टी में मूली की अच्छी पैदावार की जाती है।

उन्नत किस्में----
(1) एशियाई या उष्णकटिबंधीय समूह---'
इस वर्ग की किस्में मध्यम से लंबे आकार की चिकनी ठोस और चटपटी होती हैं ।यह गर्म स्थानों में वह उगाने के लिए उपयुक्त होती है । जैसे-- पूसा देसी ,पूसा चेतकी, जापानी सफेद ,कल्याणपुर ,पंजाब सफेद ,हिसार मूली ,मेघालय सिलेक्शन।

(2) यूरोपियन या शीतोष्ण समूह ----
यूरोपियन किस्मों की जड़ों का आकार छोटा, खाने में स्वादिष्ट और कम चटपटी होती हैं । यह ठंडे स्थानों पर उगाने के लिए बहुत ही उपयुक्त रहती है जैसे-- रैपिडरेड सफेद टिंण्ड, सफेद आईसीकिल ,पूसा हिमानी।

कुछ उन्नत किस्मों की विशेषताएं-----

पूसा चेतकी--:
इसकी जड़ें 15 से 20 सेमी लंबी ,पत्तियां हरी मध्यम आकार की और कटाव दार होती हैं । जड़ें बिल्कुल सफेद, चिकनी कोमल व कम तीखी होती हैं ,। मैदानी क्षेत्रों में इसे अप्रैल के अंत से अगस्त के शुरू तक उगाया जा सकता है।

कल्याणपुर-1--::इस किस्म की मूली सफेद रंग की होती है जो 22 सेमी लंबी बढ़ती है। इसे वर्षा व शरद ऋतु में उगाया जा सकता है। यह किस्म चेपा सरसों की आरा मक्खी और श्वेत रतुआ की मध्यम प्रतिरोधी किस्म है।

हिसार मूली-1 ----:
इसमें किस्म की बुवाई सितंबर से अक्टूबर तक की जाती है इसकी जड़ें सीधी लंबी और सफेद रंग की होती हैं यह किस्म बुवाई के 50 से 55 दिन बाद तैयार हो जाती है।

पूसा हिमानी---: 
यह किस्म पहाड़ी तथा मैदानी क्षेत्रों में बोई जा सकती है मैदानी क्षेत्रों में इसकी बुवाई दिसंबर से फरवरी तक तथा पहाड़ी इलाकों में पूरे वर्ष उगाया जा सकता है इसकी जड़ें 25 से 30 सेमी लंबी होती है बुवाई की 60 दिन बाद हे फसल तैयार हो जाती है।

सफेद आईसीकील---;यह किस्म ठंडी जलवायु के लिए उपयुक्त है इसकी जड़ें पतली और सफेद होती है जो ऊपर से नीचे की तरफ पतली होती जाती है इस किस्म की मूली बुवाई के 30 दिन बाद तैयार हो जाती है इसे बोने का उचित समय अक्टूबर से फरवरी तक होता है।

 भूमि की तैयारी---मूली की फसल भूमि के अंदर होती है इसलिए खेत की तैयारी अच्छी प्रकार से करनी चाहिए । पहली जुताई मिट्टी पलट हल से करके 3-4 जुताई कल्टीवेटर से करके मृदा भुर भुरी कर लेनी चाहिए।

खाद तथा  उर्वरक--- 250 मूली प्रति हेक्टेयर पैदावार बढ़ाने के लिए खेत में मृदा की जांच करना बहुत ही आवश्यक है । यदि भूमि की जांच ना हो सके तो उसमें 200 से 250 कुंतल गोबर की खाद 50 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन 40 से 50 किलोग्राम फास्फोरस और 40 से 50 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से देनी चाहिए गोबर की खाद  बीज बोने के  1 माह पूर्व  खेत में  अच्छी तरह से  मिला दे ।

बुवाई का समय---
मूली को साल भर उगाया जा सकता है। व्यावसायिक स्तर पर इसे मैदानी क्षेत्रों में सितंबर से जनवरी तक और पर्वतीय क्षेत्रों में मार्च से अगस्त तक बोया जाता है इस अवधि में मूली की बुवाई करने पर मूली अच्छी मुलायम और लंबी होती है जिसका बाजार में मूल्य अधिक होता है।

बीज बोने की विधि--मूली की बुवाई दो विधियों से की जाती है।
(1) मेड़ों पर बीज बोना--:
इस विधि में 30 से 40 सेमी की दूरी पर 25 सेमी ऊंची मेंडें बना ली जाती हैं मेडो के दोनो तरफ 2 से 3 सेमी की गहराई पर बुवाई की जाती है। बीज अंकुरण के बाद जब पौधों में दो पत्तियां आ जाएं तो पौधों को 8 से 10 सेमी की दूरी छोड़कर बाकी पौधों को निकाल दिया जाता है।

(2) कतारों में वुवाई करना--- 
खेत अच्छी प्रकार से तैयार करने के बाद उसमें क्यारियाॅ बना ली जाती हैं इन क्यारियो में 30 सेमी की दूरी पर कतारे बना ली जाती है इन  कतारों में बीज को लगभग 3 सेमी की गहराई पर बो देते हैं। जब पौधों पर दो से तीन पत्तियां आ जाएं उस समय 8 से 10 सेमी की दूरी पर एक स्वस्थ पौधे को छोड़कर शेष पौधों को निकाल देते हैं।

सिंचाई तथा जल निकास---बीज की बुआई के बाद खेत की सिंचाई करना आवश्यक है  अंकुरण के15-20 दिनों बाद पौधे जल का सर्वाधिक उपयोग करते हैं इस समय सिंचाई का विशेष रुप से ध्यान रखें । बरसात ना होने पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करेंं। और गर्मियों में एक सप्ताह के अंतर पर और सदियों में 10 से 15 दिन केेेे अंतराल पर सिंचाई करते रहनाा चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण-----
खरपतवार की मात्रा के अनुसार दो या तीन बार निकाई गुडाई मूली के लिए आवश्यक होती है बड़ी मूली वाली जातियों में मिट्टी चढ़ाई जाती है निराई गुड़ाई करते समय यदि पौधों की संख्या अधिक हो तो फालतू पौधों को निकाल देना चाहिए।
रसायन विधि से खरपतवार नियंत्रण हेतु  टोंक-ई-25 नामक खरपतवार नाशी का वुवाई के पूर्व छिड़काव किया जा सकता है   

कीट नियंत्रण------

माहू-- माहू पौधों के सभी कोमल भागो का रस चूसता है। यह पीले हरे रंग के छोटे-छोटेे कीट होतेे हैं जब आकाश में बादल छाए होते है और मौसम ठंडा होता हैै तो इस कीट का प्रकोप बढ़ जाता है।
रोकथाम---इस कीट की रोकथाम के लिए 1 लीटर मेलाथियान-50ई सी को 600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से फसल पर छिड़काव करें।

डायमंड बैकमोथा--
इस कीट की सुड़ियां पौधों की पत्तियां को खाई खाती हैं। इसे कीट का आक्रमण अगस्त से दिसंबर तक होता है यह सुडिंयां सिलेटी रंग की होती हैं ।
रोकथाम--
 इस कीट की रोकथाम के लिए साइपरमैथरीन घोल का छिडकाव करना चाहिए।

रोग नियंत्रण---

सफेद रतुआ--यह रोग फफूंदी के कारण होता है इस रोग से प्रभावित पौधों की पत्तियों पर सफेद या पीले से फफोले दार धब्बे बन जाते हैं जो बाद में मिलकर अनियंत्रित आकार के धब्बों का निर्माण करते हैं।
रोकथाम--
इसकी रोकथाम के लिए डाइथेन जेड-78 के 0.2% घोल का छिड़काव करें तथा रोग प्रतिरोधी जातियों को  उगाएं।

मोजेक रोग--यह रोग विषाणु के द्वारा होता है इस रोग से प्रभावित पौधों की पत्तियां धब्बे युक्त पीले रंग की हो जाती हैं तथा इसका आकार सामान्य से छोटा हो जाता है और पत्तियों की मोटाई भी बढ़ जाती है इस रोग के विषाणु कीटो द्वारा स्वस्थ पौधों पर पहुंचते हैं।

खुदाई---मूली की खुदाई उसकी उगाई जाने वाली किस्मों पर निर्भर करती है ।मूली की एशियाई किस्स में 40 दिन बाद खाने योग्य हो जाती हैं जबकि यूरोपियन किस्म 20 दिन बाद खाने योग्य हो जाती हैं मूली की खुदाई जड़ों की मुलायम अवस्था पर करनी चाहिए।



उपज----: मूली की उपज भूमि की किस्म भूमि की उर्वरता ,उन्नतसील किस्म, जलवायु आदि बातों पर निर्भर करती है। एशियाई किस्मों का औसतन उत्पादन 200 से 250 कुंतल प्रति हेक्टेयर तथा यूरोपियन किसानों का औसत उत्पादन 100 से 125 कुंतल प्रति हेक्टेयर है।

    बीज उत्पादन 

मूली का भारतीय एवं एशियाई जातियों का बीज मैदानी क्षेत्रों मे तथा यूरोपीय जातियों का बीज पहाड़ी क्षेत्रों मे तैयार किया जाता है। बीज तैयार करने की दो विधियाँ है-

[1] खेत मे ही पौधे को छोड़कर खेत मे ही कटाई करते समय उपयुक्त स्वस्थ पौधों की कटाई नहीं की जाती। उन्हे वही पड़ी रहने देना चाहिए। अन्य पौधे को निकाल दिया जाता है। तथा शेष पौधे मे सिचाई कर दी जाती है। कुछ समय बाद उनमे तने निकल आते है, जिन पर फूल तथा फलियाँ बनती है।

[2]  पुनः रोपाई ----

 चुने हुए पौधों को खेत से निकालकर किसी दूसरे स्थान पर पुनः रोपित कर देते है।यह रोपाई मध्य नवंबर से दिसम्बर के प्रथम सप्ताह तक करते है।  रोपाई के तुरंत बाद इनकी सिचाई कर दी जाती है। तथा आवश्यकतानुसार नत्रजन की कुछ मात्रा भी डाल दी जाती है। कुछ समय बाद इसमे तने तथा शाखाये निकल आती है। जिन पर फूल तथा फलियाँ बनती है। फलियाँ जब पककर सूख जाती है तब उनकी कटाई करके बीज प्राप्त कर लिया जाता है ।





आडू की खेती



आडू की खेती
आडू समशीतोष्ण जलवायु का फल है। इसे उन्हीं क्षेत्रों में अधिक प्रयोग में लाया जाता है जहां इसकी खेती होती है। यह मध्यम स्वाद वाला पौष्टिक फल है जिसे ताजे रूप में खाया जाता है इससे जेली तथा जैम भी बनाया जाता है।
आडू की उत्पत्ति
आडू का जन्म स्थान चीन है। यहीं से इसका प्रसार ईरान, इटली होते हुए यूरोप तथा अमेरिका में हुआ।
व्यवसायिक रूप से यह संसार में समशीतोष्ण भागों में पैदा किया जाता है। भारतवर्ष में यह पहाड़ी एवं पर्वतीय भागों में उत्पन्न किया जाता है। इसकी बागवानी उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में जैसे देहरादून नैनीताल अल्मोड़ा गढ़वाल इत्यादि में की जाती है। इसकी कुछ किस्में ऐसी है जिनको उत्तर प्रदेश के मैदानी जिलों में जैसे मेरठ मुजफ्फरनगर सहारनपुर इत्यादि में सफलतापूर्वक पैदा किया जाता है।
आडू के लिए जलवायु--- 
आडू समशीतोष्ण जलवायु का पौधा है। इसके लिए नमवा सर्द जलवायु की आवश्यकता होती है। बहुत अधिक ठंड में इसके फूल प्रभावित हो जाते हैं। अन्य फलों की अपेक्षा आडू कुछ गर्म जलवायु भी सहन कर सकता है इसी कारण मैदानी क्षेत्रों में कुछ किस्में जैसे -- शरबती सहारनपुर आदि की बागवानी की जाती है।

आडू के लिए उपयुक्त भूमि---
          आडू की बागवानी सभी प्रकार की मिट्टियों में की जा सकती है। परंतु आडू के लिए गहरे बलुई दोमट भूमि सर्वोत्तम होती है जिसमें उचित जल निकास की व्यवस्था हो। जहां भी आडू के बाग में पानी रुकता है वहां पौधे जड़ सड़न रोग से सूख जाते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों की भूमि कम गहरी होने के कारण पौधों की वृद्धि अधिक नहीं हो पाती। ऐसे स्थान पर बाग लगाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि भूमि लगभग 1 मीटर गहरी हो।
उन्नत किस्में-
(1)- शीघ्र तैयार होने वाली किस्में--- एलेक्जेंडर, काफोर्ड अर्लीरिवर्स ,अर्लीबीर्ट्रेस।
(2)- मध्यम अवधि की किस्में-- पेरी ग्रान, अर्ली रिवर्स, हेल्स अर्ली, अल्बर्टा, ड्यूक ऑफ़ याक॔ ।
(3)- देर से होने वाली किस्में-- चौबटिया  रेड, रेड विंग, प्रिंसेज ऑफ विंटर, फोस्टर, गोल्डन बुश, नोबलेस, हेल बर्टी ।
मैदानी क्षेत्रों के लिए
शरबती ,सफेदा ,फ्लोर डॉसन ,सनरेड, शान-ए-पंजाब, प्रभात, चकिया, सफेद अर्ली क्रीम, चाइना फ्लैट, सहारनपुर नंबर 6, सहारनपुर नंबर 3, नेकटिरिन ।

प्रमुख किस्मों की विशेषताएं
पहाड़ी क्षेत्रों के लिए--
● अल्बटी-- --- यह फल बड़ा, आकर्षक बीज रहित तथा मध्यम किस्म का होता है। पकने के बाद भी इसका स्वाद अलका कड़वा होता है। यह विभिन्न प्रकार की जलवायु में उत्पन्न की जा सकती है।
पैरी ग्रीन---- यह फल बड़ा तथा छिलका चमकता हुआ लाल, गोदा रसदार मीठा तथा अच्छी सुगंध वाला होता है इस किस्म के फल जून के दूसरे सप्ताह में पक जाते हैं।
ड्यूक ऑफ़ Yark--- इस फल का आकार औसतन, बक्कल लाल, गोदारा संयुक्त मीठा एवं अच्छी खुशबू वाला होता है। यह पौधे नियमित फल देते रहते हैं। फल जुलाई के प्रारंभ में पकना शुरू हो जाते हैं।
अर्ली बी ट्रीस---- यह फल छोटा छिलका चमकीले रंग वाला होता है । जिस पर लाल धारियां होती हैं। इसका गूदा स्वादिष्ट एवं रसदार होता है यह किस्म सभी किस्मों से जल्दी पक जाती है।
एलेक्जेंन्डर------  इस फल का आकार बड़ा होता है इसका छिलका हरा सफेद जो चमकते लाल रंग से ढका होता है। इस फल का गूदा हरा सफेद रसदार तथा मीठा होता है यह शीघ्र पकने वाली किसमें है।
मैदानी क्षेत्रों के लिए--
शरबती------ यह मैदानी क्षेत्र की सबसे प्रमुख किस्में है। इसके फल बड़े ,आधार पर लाल ,व  हरे - पीले रंग के होते हैं। इसमें गूदा गुठली से चिपका रहता है तथा अत्यंत रसीला, मीठा एवं मुलायम होता है। पके हुए फल जून के मध्य से मेरे नहीं लगते हैं  और इनकी की उपज अच्छी होती है । फल ताजे रूप में खाने पर अच्छे लगते हैं।
● सफेदा------ फल गोल ,औसतन आकार वाले ताजे रूप में खाने पर उत्तम रहते हैं। इनका छिलका पीले रंग का लालिमा लिए हुए होता है। इनका गोदा हल्का पीला रसीला तथा मीठा होता है। इनकी गुठली गोरे से चिपकी रहती है। यह उपाधि अच्छी व जुलाई के मध्य में पकने वाली किस्म है।
फ्लोरिडासन------ यह बहुत ही शीघ्र अप्रैल के अंतिम दिनों में पक कर तैयार हो जाती है। इसके फल औसतन आकार वाले गोल होते हैं इनका छिलका लाल होता है। गूदा, पीला ,मीठा तथा गुठली से अलग रहता है। इन की उपज अच्छी होती है।
● शान-ए-पंजाब -------  इस किस्म के फल फ्लोरिडा सन से बड़े होते हैं। इनका गूदा पीले रंग वाला गुठली से अलग रहता है यह फल अधिक समय तक रखे जा सकते हैं। डिब्बा बंदी के लिए यह अच्छी किस्में है । इसके फल मई के मध्य में पक जाते हैं।
● सहारनपुर प्रभात-----  यह किस्म शरबती तथा फ्लोरिडा सन की संकरण से तैयार पौधों के चयन से निकाली गई है। यह अगेती किस्म फल अनुसंधान संस्थान केंद्र सहारनपुर से निकाली गई है। इसके फल रसीले, मीठे व अच्छे गुणों वाले होते हैं । यह फल मई के दूसरे सप्ताह में पक जाते हैं।
फ्लोरिडा रेड------ इन फलों का आकार काफी बड़ा व रंग सुर्ख लाल होता है। इसका गूदा सफेद, मीठा व मुलायम होता है। यह फल जून के प्रथम सप्ताह में पकने आरंभ होते हैं।

प्रवर्धन-----आडू का पौधा बीज तथा वनस्पतिक प्रवर्धन दोनों विधियों से तैयार किया जाता है। बीज से उत्पन्न पौधे वानस्पतिक परिवर्धित पौधों की अपेक्षा कमजोर तथा उनकी उपज क्षमता कम होती है। वानस्पतिक प्रवर्धन में आडू प्रसारण की सबसे लोकप्रिय विधि वलय कलिकायन है। आलू और आलू चा के बीजू पौधों पर चश्मा चढ़ा कर अथवा कलम लगाकर आलू के पौधे तैयार किए जाते हैं। कलम लगाने का सही समय मई जून और अगस्त सितंबर माह है जबकि कलम लगाने के लिए फरवरी का महीना ठीक रहता है। आडू का बाग हल्की भूमि में लगाना हो तो आलू के ही बीजू पौधे मूल वृंत के रूप में प्रयोग करें तथा भारी भूमि के लिए आलूचा के पौधों पर कलम लगाये।
मूल वृन्त के लिए बीज नवंबर से दिसंबर में अच्छी तरह तैयार की हुई क्यारियों में 43 सेमी की दूरी पर कतारों में 10 से 15 सेमी के फासले पर 3 से 4 सेमी की गहराई पर बोए जाते हैं
संतुलित खाद तथा उर्वरक का प्रयोग एवं उचित प्रबंधन से जून माह में कलम लगाने के लिए पौधे तैयार किए जाते हैं। अन्यथा 1 वर्ष बाद पौधे कलम के लिए तैयार होते हैं। मैदानी क्षेत्र में विनियर कलम से अप्रैल-मई माह में पौधे तैयार किए जा सकते हैं।

आडू की पौध रोपण-------मैदानी क्षेत्र में आडू के बाग वर्षा और शीत ऋतु दोनों मौसमों में लगाई जा सकते हैं। जबकि पर्वतीय क्षेत्र में आडू के बाग शीत ऋतु में लगाने चाहिए बाल लगाने से 1 माह पूर्व5×5 मीटर की दूरी पर 1×1×1 मीटर के आकार के गड्ढे खोद लें। इन गड्ढों में 40 से 50 किलोग्राम गोबर की सड़ी हुई खाद, 500 ग्राम सुपर फास्फेट सिंगल और 150 ग्राम हेप्टाक्लोर मिट्टी के साथ मिलाकर भूमि की सतह से 15 से 20 सेमी गहराई तक भर देते हैं। गड्ढे की मिट्टी को अच्छी तरह दवा दें। यदि पानी की सुविधा हो तो सिंचाई करें अन्यथा वर्षा हो जाने के बाद ही पौधे लगाएं जिससे गड्ढे की मिट्टी अच्छी तरह से बैठ जाए और गड्ढे के मध्य में 1 वर्ष के पौधे की रोपाई करें। कलम किया हुआ भाग हमेशा भूमि की सतह से ऊपर रहे तथा जहां तक पौधे का भाग नर्सरी में था इतना भाव गड्ढे में अवश्य रहे। पहाड़ी क्षेत्र में जहां पानी का अभाव है वहां पौधे लगाने के बाद साले को घास फूस से ढक देना चाहिए

खाद तथा उर्वरक-----आडू की फलत के लिए प्रतिवर्ष बड़वार की आवश्यकता पड़ती है। इसी कारण आडू के लिए नाइट्रोजन पोषक तत्व की विशेष आवश्यकता पड़ती है।
भूमि की उर्वरता के अनुसार प्रति पौधा 18 से 20 किलोग्राम गोबर की खाद, 300 ग्राम नाइट्रोजन, 100 ग्राम फास्फोरस तथा 300 ग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है। गोवर की साड़ी खाद गड्ढे को भरते समय प्रयोग करें। फास्फोरस की आधी मात्रा रोपाई के समय तथा शेष आधी मात्रा रोपाई के बाद देनी चाहिए। नत्रजन की पूरी मात्रा पांच भागों में विभाजित कर अगस्त ,सितंबर ,अक्टूबर ,फरवरी तथा अप्रैल माह में देनी चाहिए। पोटाश तीन भागों में विभाजित कर सितंबर ,अक्टूबर तथा अप्रैल माह में देनी चाहिए।
आडू  की  सिंचाई-----
यदि पर्याप्त वर्षा हुई हो तथा उसका वितरण उपयुक्त रहा हो तो आडू मैं आमतौर पर सिंचाई नहीं की जाती। वैसे प्रारंभिक अवस्था 5 वर्ष तक एक सिंचाई प्रतिवर्ष अवश्य करनी चाहिए मुख्य रूप से फूल तथा फल लगते समय यदि भूमि में नमी की कमी हो तो सिंचाई अवश्य करनी चाहिए।
फल लगने के पश्चात छिड़काव द्वारा सिंचाई करने पर फल बड़े आकार के तथा अधिक रसदार हो जाते हैं।

निराई गुड़ाई--- आडू के बाग को प्रथम दो 3 वर्षों तक निराई गुड़ाई कर खरपतवारो से मुक्त रखना चाहिए। इसकी हल्की जुताई भी कर सकते हैं  जिससे खरपतवार नष्ट हो जाते हैं।

कटाई छटाई--'पौधों को अधिक मजबूत बनाने के लिए वृक्षों की काट छांट की जाती है जिससे फल वृक्ष की टहनियां मजबूत बनाकर फलों के भार को सहन कर सके अर्थात टूटे नहीं। अच्छे  कृन्तन करने से फलत अधिक होती है। इसके लिए पहले वर्ष आडू के पौधे को 70 सेमी की ऊंचाई तक कटाई छटाई करनी चाहिए। दूसरे वर्ष तीन से चार शाखाएं 15 से 20 सेमी की दूरी पर रखकर शेष शाखाओं को काट दें। पहली शाखा भूमि से 50 सेमी की ऊंचाई पर होनी चाहिए।
इस प्रकार 3 से 4 वर्ष में पौधा अपना आकार बना लेता है आडू मैं फलत जल्दी आती है तथा एक शाखा एक ही बार फल देती है। अता प्रत्येक वर्ष फल लेने के लिए पर्याप्त मात्रा में नई शाखाओं का आना आवश्यक है। फलतः हमेशा 1 वर्ष पुराने शाखा पर होती है। इसके लिए छटाई करते समय प्रत्येक शाखा के सरे को 20 से 30 सेमी नीचे तक काट दें जिससे निचले भाग से नई शाखाएं निकल सकें।
आडू में स्वपरागण से फल बनते हैं इसमें पर्याप्त फलत होती है आतः कुछ शाखाओं को निकाल लेना चाहिए ताकि अधिक फलत को रोका जा सके साथ ही रोगी और टूटी टहनियों को निकाल देना चाहिए। प्रत्येक वर्ष फूल उत्पन्न होने से पहले कृंन्तन की क्रिया दिसंबर महीने में करना उचित समझा जाता है।

अंतराशस्य एवं आवरणशस्य--बागवानी को प्रारंभिक अवस्था में जब पौधे छोटे होते हैं उस समय कुछ वर्षों तक अंतराशस्य  जैसे--  गाजर, शलजम टमाटर बैगन मूली आदि की फसलें उगा सकते हैं। फलों की तोड़ाई के बाद आडू की बागवानी से प्राय मूंग की फसल आवरण शस्य के रूप में बो दी जाती है। मूंग की फसल को मिट्टी में दवा देने से मृदा में जीवांश पदार्थ तथा नत्रजन की मात्रा बढ़ जाती है।

फूलना व  फलना---
पौधे लगाने की तीन चार वर्ष बाद फूल एवं फल आने आरंभ हो जाते हैं। फल पैदा करने वाली कलियां 1 वर्ष पुरानी शाखाओं के बीच से ऊपर की ओर आती है। एक गांठ पर एक पत्र कलिका तथा दो फूल कलिका पैदा होती है। पके फल किस्म के अनुसार अप्रैल से जून में मिलने लगते हैं।

फलों को तोड़ना तथा बेचना----
फलों को पकाने के समय से कुछ पहले तोड़ना चाहिए क्योंकि पकने के बाद फल शीघ्र खराब होने लगते हैं। फलों को सावधानीपूर्वक पौधों से तोड़ना चाहिए जिससे उनमें कोई चोट ना लग सके। मैदानी क्षेत्र में आडू के फल मई-जून मैं और पहाड़ी क्षेत्र में जून-जुलाई में तैयार होते हैं। फलों की छटाई करके लकड़ी की पेटीओं में भरकर बाहर बाजारों में बिक्री के लिए भेज दिया जाता है।
आडू की पैदावार---
आडू के पौधे तीसरी वर्ष से ही फल देने लगते हैं। जो 25 से 30 वर्ष तक फल देते रहते हैं। एक पौधे से लगभग 50 से 60 किलोग्राम फल मिल सकते हैं। इस प्रकार एक हेक्टेयर क्षेत्र से 200 से 250 कुंतल तक फल मिल सकते हैं।
आडू के बीज में  सुषुप्तावस्था पाई जाती है। बीज को बोलने से पहले उसे एक निश्चित ताप पर पकाते हैं। इस क्रिया को स्तरीयकरण कहते हैं।
आडू मे कीट तथा रोग नियंत्रण
आडू का माहू--- इस कीट का आडू की बागवानी में अधिक प्रकोप होता है। यह कीट पत्तियों और फूलों से रस को चूस कर नुकसान पहुंचाते हैं। जिससे पत्तियां सिकुड़ जाती हैं।इस कीट की रोकथाम के लिए मेटा स्टॉक्स के 0.1 प्रतिशत घोल का पहला छिड़काव  फूल आने से पहले  तथा दूसरा छिड़काव  फल लगने के तुरंत बाद करना चाहिए ।

तना छेदक कीट---- यह किट पेड़ के तने में छेद करते हैं जिससे पौधे कमजोर हो जाते हैं।
रोकथाम----(1) पेट के निचले भाग में पैराडाई क्लोरो बेंजीन का छिड़काव करें।
(2) रवि को क्लोरोफॉर्म क्रियोजोट घोल में भिगोकर छेद में भरकर मिट्टी से बंद कर दें।

फल मक्खी------- यह मक्खी फल के अंदर ही अंडे देती है जिससे मेगेट्स निकलते हैं । यह मेगेट्स फल को अंदर से खाकर नुकसान पहुंचाते हैं।
रोकथाम--- (1) प्रभावित फलों को मैगेट्स सहित नष्ट कर देना चाहिए।
(2) मेटासिस्टॉक्स के घोल का छिड़काव करें।

पर्ण कुंचन रोग---- यह वायरस से होने वाला रोग है जो एफिड्स के द्वारा फैलता है। इस रोग के प्रभाव से पौधे की पत्तियां मुड़ जाती है सामान्य से मोटी तथा खुरदरी हो जाती है जिससे पौधे कमजोर हो जाते हैं और फलों का आकार छोटा रह जाता है।
रोकथाम----(1) प्रभावित पौधों की पत्तियों को शाखा सहित तोड़कर नष्ट कर दें।
(2) एफिड्स के नियंत्रण के लिए मेटासिस्टॉक्स के 0.15% घोल का छिड़काव करें।

आडू अंगमारी-----  यह बीमारी एक कवक द्वारा उत्पन्न होती है जिससे शाखाओं पर छोटे छोटे लाल धब्बे पड़ जाते हैं जो बाद में किंग कर के रूप में बदल जाते हैं तथा संसगिर्त टहनियां सूखने लगती हैं।
रोकथाम---- संसगिर्त  भागों एवं शाखाओं को नष्ट कर देना चाहिए। और रासायनिक दवाओं का छिड़काव करना चाहिए।

शाखाओं का सूखना----- अच्छे जल निकासी की सुविधा ना होने से यह रोग लग जाता है जिसमें तने एवं शाखाओं से गोंद जैसी वस्तु निकलने लगती है तथा शाखाएं सूखने लगती हैं।
रोकथाम----- इसके नियंत्रण के लिए जल निकासी का उचित प्रबंध होने के साथ-साथ ही सिंचाईयॉ नियमित करनी चाहिए तथा मिट्टी की गुड़ाई करते रहना चाहिए।

बागवानी की शुरुआत कैसे करें

बागवानी की खेती 


भारतीय कृषि मे फलों का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। अधिकांश क्षेत्रों मे फलों की खेती व्यापार के लिए की जाती है। बागवानी मे वर्ष भर कुछ न कुछ कार्य चलता रहता है। जिसे कराने के लिए श्रमिकों की आवश्यकता पड़ती है। जबकि अनाज वाली फसलों मे केवल विशेष समय पर ही श्रमिकों की आवश्यकता पड़ती है। इस प्रकार बागवानी से कुछ सीमा तक बेरोजगारी की समस्या कम की जा सकती है। 


बाग लगाने के लिए भूमि का चुनाव

फलों का बाग लगने के लिए भूमि का चयन करते समय विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए । 


[1] मृदा के प्रकार -

बाग लगाने के लिए यह आवश्यक है कि जिस जगह बाग लगाना हों वहाँ की मिट्टी उत्तम किस्म की हों । अर्थात बाग लगाने के लिए बलुई,दोमट,तथा मटियार दोमट ,मिट्टी सर्वोत्तम रहती है। कंकरीली ,पथरीली भूमि का चुनाव बाग लगाने मे नहीं करना चाहिए। भूमि पर्याप्त गहरी हों। क्योंकि फल वृक्षो की जड़ें  भूमि मे  गहराई तक जाती है।  

(2) जल निकास का प्रबंध

जिस भूमि में बाग लगाना हो उस भूमि में वर्षा का पानी एकत्र नहीं होना चाहिए क्योंकि पौधे अधिक पानी अधिक समय तक भरे रहने पर मर जाते हैं नीची भूमि में फल वृक्ष नहीं पनप सकते। अगर पास में कोई नाला हो तो उसमें फालतू पानी निकास नली द्वारा निकाल कर छुटकारा पाया जा सकता है। नेहरों के पास नीचे भूमि में पानी थोड़ा थोड़ा निकलता रहता है। ऐसी भूमि का बाग लगाने के लिए चुनाव नहीं करना चाहिए।

(3) सिंचाई की सुविधा

बाग लगाने से पहले ध्यान रखना आवश्यक है की सिंचाई की ठीक व्यवस्था हो क्योंकि बाग के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है उचित तो यह रहता है की सिंचाई का अपना निजी साधन हो। पौधों को पानी देना शाम के समय उचित रहता है पौधों को आवश्यकतानुसार पानी देती रहें अन्यथा पौधे मर सकते हैं।

(4) यातायात की सुविधा

बाल लगाने का उद्देश्य फल पैदा कर धन कमाना है इसके लिए बाग सड़क के किनारे हो। माल ढोने के लिए वाहन का मिलना आवश्यक है। साथ ही वह स्थान जहां बाग लगा रहे है सड़क द्वारा किसी शहर या रेलवे स्टेशन से जुड़ा होना चाहिए जिससे कि फलों को सुविधा पूर्वक मंडियों में बिक्री के लिए पहुंचाया जा सके।



(5) मंडी की निकटता

अगर पास में ऐसी मंडी या बाजार हो जहां पर फलों को ले जाकर बेचा जा सके। अन्यथा फलों को दूर ले जाने में अतिरिक्त व्यय करना पड़ेगा और पके फलों को खराब होने का डर भी बना रहेगा। आजकल कच्चे फल तोड़कर उसमें रासायनिक पदार्थ लगाकर मंडियों को भेज दिए जाते हैं। जो स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक होते हैं।

(6) आवश्यक जलवायु

फलों का बाग लगाते समय वहां की जलवायु का ध्यान रखना आवश्यक होता है। सेव, नाशपाती, खुबानी बेरी आदि को शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में, आम केला उष्णकटिबंधीय तथा नींबू, लीची आदि को समशीतोष्ण क्षेत्रों में लगाना चाहिए।

(7) श्रमिकों की सुविधाएं

बाग लगाने में विभिन्न कार्यों के लिए श्रमिकों की आवश्यकता पड़ती है। फल लगाने, देखभाल करने, पैकिंग करने एवं बाहर भेजने में भी श्रमिकों की आवश्यकता होती है। अतः बाघ ऐसे स्थान पर लगाया जाए जहां मजदूर आसानी से मिल जाएं।

           बाग लगाने के लिए प्रारंभिक तैयारियां

भूमि चुनने के बाद वृक्षारोपण से पहले उस भूमि की कुछ प्रारंभिक तैयारियां की आवश्यकता होती है इन तैयारियों में से कुछ निम्न है

(1) भूमि को समतल करना

यह  बात याद रखनी चाहिए कि बागों में सिंचाई के प्रबंध की आवश्यकता होती है और यह तब तक संतोष पूर्ण नहीं हो सकती जब तक कि बाघ की भूमिका धरातल समतल ना हो, यदि ढाल हो तो बहुत साधारण हो ऊंची नीची भूमि को समतल करना होगा ।ढालू अथवा ऊंची नीची भूमि में सिंचाई करने में कठिनाई होती है और साथ ही वर्षा ऋतु में डालू भूमि के कटकर बहने से बहुत हानि हो सकती है।

(2) भूमि में खाद डालना

ऊंची नीची भूमि को समतल करने में भूमि के ऊपर की उपजाऊ मिट्टी नीचे गड्ढे में ढक जाती है और नीचे की कम उपजाऊ भूमि ऊपर आ जाती है। ऐसी भूमि में पेड़ लगाने से पहले उसमें खूब खाद डालना चाहिए यदि भूमि समतल रही हो और पहले से ही उसमें खेती होती आई हो तो उसमें खाद की कम आवश्यकता पड़ती है अधिक उपाधि लेने के लिए भूमि में 200 से 250 कुंतल गोबर की सड़ी हुई खाद , 100 किलो नत्रजन 60 किलोग्राम फास्फोरस 50 किलो पोटाश इन तत्वों को खाद के रूप में प्रयोग कर सकते हैं।


(3) पानी का प्रबंध करना

बाग लगाने से पहले सिंचाई का प्रबंध कर लेना बहुत आवश्यक है यदि कुआं खोदना हो तो उसे बाल लगाने से पहले खुद कर ठीक कर लेना चाहिए। अन्यथा इसके अलावा बहुत से नलकूप , समर सेविल तथा ट्यूबैलों का भी उपयोग सिंचाई के लिए किया जा सकता है। सिंचाई के लिए स्थानीय नालियां भी पहले से ही तैयार कर लेनी चाहिए कम से कम नालियों का नक्शा पहले से ही बना लेना चाहिए जिससे पौधों तक पानी आसानी से पहुंच सके।



(4) वायु रोधी पेड़ लगाना

लू अथवा ठंडी हवा उत्तर पश्चिम और दक्षिण पश्चिम से जाड़े और गर्मियों में क्रम से चला करती है इसके प्रभाव को कम करने के लिए और फलदार वृक्षों को आंधी और तूफान से बचाने के लिए इन दिशा में ऊंचे उगने वाले पेड़ किनारों के आसपास लगा देते हैं जो तेज हवा को रोकने का काम करते हैं। और आंधी के प्रचंड वेग को रोक कर पेड़ तथा फल फूलों को गिरने से बचाते हैं। यह बाग के कोमल पेड़ों को गर्म तथा ठंडी हवाओं से भी बचाते हैं इसके कारण पाला भी कम असर करता है।

(5) क्षेत्रों का विभाजन

अलग-अलग जाति के फलों के लिए क्षेत्र विभाजन में भूमि की सतह और सड़कों तथा रास्तों का पूरा पूरा ध्यान रखना चाहिए। एक ही फल की विभिन्न जातियां एक ही चक्र में लगाई जाए और उनको पकने के समय के अनुसार ही विभाजन किया जाए।

                     फलों का वर्गीकरण

फलों का वर्गीकरण निम्न आधारों पर किया गया है-

 जलवायु की आवश्यकता के आधार पर 
जलवायु के आधार पर फलों को तीन वर्गों में विभाजित किया गया है-

(1) शीतोष्ण फल-
इस वर्ग के फलों को ठंडे क्षेत्रों में उगाया जाता है जहां सर्दियों में तापक्रम जमाव बिंदु से नीचे चला जाता है। इस क्षेत्र में उगने वाले फल सर्दियों में अपनी पत्तियां गिरा देते हैं और प्रसुप्तता में चले जाते हैं; जैसे-- सेब ,आडू ,नाशपाती, बादाम, अखरोट एप्रीकॉट पिकॉन नट, चेरी, स्ट्रॉबेरी आदि।

(2) समशीतोष्ण फल
समशीतोष्ण फलों को उगाने के लिए ग्रीष्मकालीन गर्म व अपेक्षाकृत उसको होना चाहिए तथा शीतकालीन में कम सर्दी की आवश्यकता पड़ती है; जैसे---  लीची ,नींबू अमरूद, अंजीर ,संतरा, फालसा ,आमला ,बेर ,अनार, लेमन आदि फल हैं।

(3) उष्ण फल
यह वे फल है जिन्हें ग्रीष्म काल में गर्म व आर्द्र तथा शीतकाल में कम ठंडी जलवायु की आवश्यकता पड़ती है।
जैसे----  आम ,केला ,अनन्नास ,काजू, चीकू, पपीता, कटहल इत्यादि फल हैं।


फलों के प्रकार के आधार पर वर्गीकरण

• बेरी-- पपीता केला चीकू खजूर बेरी अमरूद आदि ।
• पोम-- नाशपाती सेव लोकाट आदि।
• नट----  लीची काजू राम भूटान आदि।
• आष्टीफल-- बादाम आम बेर जामुन नारियल आडू आलू चाट 
• कैप्सूल-- आमला कैरम बोला आदि।
सोरोसिस-- शहतूत अनन्नास कटहल आदि।
हेस्पेरिडीयम--  नींबू वर्ग के फल।




                       वृक्षारोपण

बाग में पेड़ लगाने का कार्य बहुत ही महत्वपूर्ण है। पेड़ लगाने का काम बड़ी सावधानी से किया जाना चाहिए क्योंकि इसमें पेड़ लगाने में किसी भी प्रकार की कमियां उस समय तक भोगनी पड़ती है जब तक बाग  रहता है। उद्यान में वृक्ष लगाने का अच्छा ढंग वही कहा जाएगा जिसमें प्रत्येक फल वृक्ष को वृद्धि के लिए पर्याप्त स्थान मिल सके। फल वृक्ष देखने में सुंदर लगे और वृक्षों को सीधी रेखा में लगाया जाए।
और अधिक जानकारी के लिए सदैव अपने क्षेत्र के राजकीय बागवानी निरीक्षक की सहायता लेनी चाहिए।

पेड़ लगाने का समय--

बे पौधे जो सदैव हरे-भरे बने रहते हैं वर्षा ऋतु मैं लगते हैं पढ़ पाती या पतझड़ जिन पेड़ों में वर्ष में एक बार पतझड़ होता है उन्हें दिसंबर से फरवरी तक लगाते हैं पेड़ हमेशा सुबह या शाम के समय लगाएं।


पेड़ लगाने की विधियां---

पौधे लगाने का नक्शा बनाते समय यह ध्यान रखें कि पौधों को वृद्धि के लिए पर्याप्त स्थान मिले, अधिक पौधे भूमि में लग जाएं तथा बाग में एक से अधिक फलों के पेड़ लगाने हैं तो प्रत्येक किस्म के पौधे को अलग-अलग क्षेत्र में लगाएं। एक साथ पकने वाले फल एक स्थान पर लगाने चाहिए जिससे देखभाल तथा तोड़ने में सुविधा हो ।

(1) वर्गाकार विधि--  यह सरल विधि है इसमें पौधे सीधी पंक्तियों में लगाए जाते हैं वृक्ष से वृक्ष एवं पंक्ति से पंक्ति की दूरी समान होती है इस विधि से लगाए बाग में सिंचाई एवं कृष्ण क्रिया में सुविधा रहती है।
इस विधि में कुछ लोग पेड़ लगाते समय पंक्तियों की अपेक्षा पंक्तियों में पौधों की आपस की दूरी कम कर देते हैं। ऐसा करने से पौधे वर्गाकार रूप में ना रहकर समकोण त्रिभुज के रूप में दिखाई देते हैं इस प्रकार करने से प्रति हेक्टेयर पेड़ों की संख्या बढ़ जाती है।

(2) आयताकार विधि---  यह विधि वर्गाकार विधि से समान ही है। अंतर बस इतना है कि पंक्ति से पक्षी की दूरी वृक्ष से वृक्ष की दूरी से अधिक रहती है जिसके कारण वर्गाकार विधि की अपेक्षा इसमें पौधे कुछ कम लगते हैं। चार पौधों को मिलाकर देखने से आयत के समान आकृति दिखाई देती है। इसमें पौधो को फैलने तथा वृद्धि के लिए पर्याप्त स्थान मिल जाता है।

(3) त्रिभुजाकार विधि---- इस विधि में पौधे वर्गाकार के समान ही लगाए जाते हैं अंतर इतना है कि पौधों की दूसरी पंक्ति में पौधों को पहली पंक्ति के सामने ना लगा कर उनके बीच में लगाते हैं। दो पंक्तियों के 3 पौधे एक त्रिभुज का निर्माण करते हैं। इस पद्धति से आयताकार विधि की अपेक्षा कुछ पौधे अधिक लग जाते हैं ।

(4) पंच कोण विधि----- वर्गाकार विधि के समान ही यह विधि है अंतर यह है कि वर्ग के बीचो बीच एक पौधा और लगा दिया जाता है। यह पौधा स्थाई ना होकर अस्थाई होता है जिसे बीच से निकाल दिया जाता है इसलिए इस विधि को पूरक विधि भी कहते हैं।

(5) कंटूर विधि----- यह विधि पहाड़ी असमतल, ढाल अथवा टेढ़ी-मेढ़ी भूमि पर अपनाई जाती है। खेत के ढाल को देखकर मैंड बनाते हैं। गड्ढों को खोदते समय यह ध्यान रखते हैं कि गड्ढा खोदते समय मिट्टी गड्ढे के ऊपरी सतह की ओर लगानी चाहिए। अन्यथा वर्षा होने पर मिट्टी नीचे की ओर कट कर बह जाती है। इसमें पौधों को सही रेखाओं पर ना लगा कर कंटूर( मेंड) बनाकर वहां गड्ढे खोदकर लगा देते हैं।
पेड़ लगाने में इन विभिन्न विधियों में से किसी एक विधि से पेड़ लगाए जाते हैं।



पौधों का पालन पोषण तथा रक्षा

खेत में पौधे रोपने के बाद उनकी उचित देख-रेख करनी चाहिए। उचित देखरेख ना होने पर काफी पौधे मर जाते हैं इसलिए बाग लगाने वालों को काफी हानि होती है। पौधे लगाने के बाद उनकी देखरेख कई वर्षों तक करना बहुत ही आवश्यक है।
इस संबंध में निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए--

(1) निकाई गुड़ाई-- 
थालो के चारों तरफ वर्ष में दो से तीन बार निराई गुड़ाई करनी चाहिए। निराई गुड़ाई करके खरपतवार हटाते रहना चाहिए। जिससे पौधों में सिंचाई करने में आसानी होती है और वायु का संचार भी बढ़ता है।

(2) खाद देना--
सिंचाई व निराई गुड़ाई के साथ-साथ पौधों को 1 वर्ष में खाद देना भी आवश्यक होता है। गोवर की साड़ी खाद के अतिरिक्त रासायनिक उर्वरक भी दिए जाते हैं फरवरी-मार्च में खाद देना बहुत लाभकारी होता है प्रति पौधा 10 किलोग्राम गोबर की खाद सौ ग्राम डीएपी 50 ग्राम यूरिया सौ ग्राम म्यूरेट आफ पोटाश, तथा दिमाग से बचाने के लिए 10% एल्डरिन 25 से 50 ग्राम  भूमि में देते हैं। यह खाद तने से थोड़ी दूर दी जाती है।

(3) सिंचाई---- एक माह तक यदि वर्षा ना हो तो पौधे रोपने के बाद प्रति सप्ताह सिंचाई करते हैं 1 वर्ष तक सिंचाई प्रति सप्ताह ही करते हैं। 1 वर्ष के बाद गर्मियों में 10 से 15 दिन के अंतर पर तथा सर्दियों में 20 से 25 दिन के अंतर पर सिंचाई करते रहें।

(4) कटाई छटाई---- पौधों को सही आकार इच्छा अनुसार देने के लिए भूमि से लगभग 7 से मी ऊंचाई तक तने को छोड़कर सभी शाखाएं काट देनी चाहिए। इसके बाद 30 से 35 सेमी की दूरी पर दो या तीन शाखा ही छोड़ते हैं। रोगी तथा कमजोर शाखाओं को काट देना चाहिए। आडू सेव नाशपाती तथा अंगूर में प्रारंभ से ही छटाई करते हैं। जिन पौधों में कलम लगी हो उससे नीचे शाखा नहीं छोड़नी चाहिए। पतझड़ वाली पौधों में नवंबर महीने में छटाई का कार्य करते हैं।




(5) कीट एवं बीमारियों से सुरक्षा

पौधे छोटी अवस्था में ही कभी-कभी बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। उन पर ब्लाइटॉक्स या कॉपर ऑक्सिक्लोराइड का 0.2 प्रतिशत का घोल छिड़कते हैं। नींबू में सिट्रस कैंकर रोग के लिए भी इसी का प्रयोग करें। दीमक से बचाने के लिए नीम की खली या एल्ड्रिन का प्रयोग करें।

(6) पाले व लू से बचाएं--- पाले व तेज धूप से पौधों का बचाव करना अति आवश्यक है। तेज धूप से छोटे पौधे झुलस जाते हैं इसके लिए पौधों को पाले व लू से बचाव के लिए तीन तरफ से लकड़ी की छायादार झोपड़ी से ढक देते हैं। कुछ स्थान पर जैसे नदियों के किनारे या अन्य स्थानों पर लोग मुझे आकाश के आवरण पौधों के ऊपर बना देते हैं। पाले से बचाव के लिए सिंचाई भी की जा सकती है।


(7) अन्तः सस्य उत्पादन---

नहीं लगाए गए बागों में फल आने तक फसलों का उत्पादन भी कर सकते हैं। कम बढ़ने वाली फसलें जैसे---
बरसीम, आलू, गेहूं जो मटर मसूर मूंग तथा फूलगोभी आदि फसलें उगा कर कुछ उत्पादन लिया जा सकता है।

मशरूम की खेती से अधिक मुनाफा



 कैसे ले, मशरूम की खेती से अधिक मुनाफा

भारत बर्ष मे मशरूम जैसे गूदेदार कवकों को कई नामों से जाना जाता है। जैसे-कुकुरमुत्ता ,भूमिकवक ,खुंबी शाकाहारी मीट आदि। यह अत्यंत स्वादिष्ट एवं पौष्टिक भोज्य के रूप मे एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।


आहार मूल्य
मशरूम पथरी,कैंसर,मधुमेह ,तथा ह्रदय रोगों से पीड़ित व्यक्तियों के लिए बहुत ही लाभदायक है। इसका आहार मूल्य निम्न प्रकार है जैसे-प्रोटीन,वसा,कार्बोहाइड्रेट,कॅल्शियम ,आयरन,आदि तत्व प्रचुर मात्रा मे  पाये जाते है।


मशरूम के लिए आवश्यक जलवायु - 
मशरूम के उत्पादन के लिए समशीतोष्ण जलवायु की आवश्यकता होती है। बीज के फैलाव के समय इसे 22 से 25 सेंटीग्रेड तक तापमान की आवश्यकता होती है। तथा फलन के समय तापमान 14 से 18 सेंटीग्रेड के बीच होना चाहिए। तापमान के अलावा श्वेत बटन खुम्ब को अत्यधिक नमी की जरूरत होती है। अतः पूरे उत्पादन में 80 से 90% नमी बनाए रखनी होती है।




मशरूम के लिए उपयुक्त भूमि--
मशरूम उत्पादन के लिए भूमि की आवश्यकता नहीं होती। इसका उत्पादन साधारण कमरे में ग्रीनहाउस गैरेज तथा बंद बरामदे में सफलतापूर्वक किया जा सकता है। व्यवसायिक उत्पादन के लिए विशेष रुप से निर्मित उत्पादन कक्ष अधिक लाभकारी होता है।




मशरूम की किस्में--  भारत की जलवायु के आधार पर मशरूम की मुख्य रूप से निम्न प्रकार की किस्में उगाई जा सकती हैं।

(1) पैडी स्ट्रा मशरूम ---- इसे गर्मियों में धान के पुआल पर 30 से 35 सेंटीग्रेड तापमान पर तथा 80% आर्द्रता मैं अच्छी प्रकार से उगाया जा सकता है।


(2) ढींगरी मशरूम-- विशेष शरद ऋतु मे ( सितंबर- मार्च) 20 से 30 सेंटीग्रेड तापमान पर तथा 80 से 90% आर्द्रता में धान के पुआल पर उगाया जा सकता है।


(3) बटन मशरूम( फील्ड मशरूम)-- इसे शरद ऋतु में धान के पुआल या गेहूं के भूसे की कंपोस्ट पर 80 से 90% आर्द्रता तथा 15 से 25 सेल्सियस तापमान पर पैदा किया जा सकता है ।यह सबसे अधिक लोकप्रिय किस्म  है। बाजार में सबसे अधिक इसी किस्म के मशरूम की मांग है।


मशरूम उगाने का समय---
श्वेत बटन खुम्ब को भी एक निश्चित ऋतु में उगाया जाता है। मैदानी भागों में श्वेत खुम्ब उगाने  के लिए उचित समय शरद ऋतु में नवंबर से फरवरी तक होता है।


मशरूम उगाने का तरीका
बटन खुम्ब की दो खाद्य जातियां एगेरिकस बाइस्पोरस और एगेरिकस वाइटॉरकिस की अब कृत्रिम खेती की जाती है और वैज्ञानिकों के अनेक प्रयासों के फलस्वरूप इन खुम्बो को कृत्रिम ढंग से तैयार की गई कंपोस्ट पर उगाया जाता है।


मशरूम के लिए कंपोस्ट तैयार करना
मशरूम की अच्छी पैदावार लेने के लिए पोषक तत्वों की संतुलित मात्रा में आवश्यकता पड़ती है मृदा जांच के उपरांत खाद एवं उर्वरकों का उपभोग आर्थिक दृष्टि से उपयुक्त रहता है मृदा की जांच ना होने की अवस्था में सामान्य रूप से निम्न तत्वों का उपयोग कर सकते हैं।
गेहूं का भूसा 300 किलोग्राम, अमोनिया नाइट्रेट 9 किलोग्राम, यूरिया खाद 3 किलोग्राम, 3 किलोग्राम पोटाश, 3 किलोग्राम फास्फेट ,10 किलोग्राम आटा का चोकर ,30 किलोग्राम जिप्सम आदि तत्वों को मिलाकर कंपोस्ट खाद तैयार की जा सकती है।



(1) उर्वरक मिश्रण तैयार करना
भूसे को पक्के फर्श पर 24 घंटे तक रुक रुक कर पानी का छिड़काव करके गीला किया जाता है। भूसे को गीला करते समय पैरों से दबाना और भी अच्छा रहता है। ऐसा करने से भूसे में पानी की अवशोषण क्रिया अधिक होती है। साथ ही गीले भूसे की ढेरी बनाने के 12-16 घंटे पहले जिप्सम को छोड़कर अन्य सभी पोषक तत्व जैसे'--- उर्वरक, चोकर आदि को एक साथ मिलाकर गीला कर लेते हैं। और ऊपर से गीली बोरी से ढक देते हैं रात भर इसी प्रकार ढके रहने पर सभी उर्वरक घुलकर  चोकर में अवशोषित हो जाते हैं और एक उपयुक्त मिश्रण तैयार हो जाता है।


(2) ढेर बनाना
गीले किए गए भूसे में उर्वरक मिश्रण को मिला दिया जाता है और लकड़ी के तत्वों की सहायता से 5 फुट चौड़ा और 5 फुट ऊंचा ढेर बनाते हैं। ढेर की लंबाई सामग्री की मात्रा पर निर्भर करती है लेकिन ऊंचाई और चौड़ाई ऊपर लिखे माफ से अधिक वह कम नहीं होनी चाहिए। यह ढेर चार-पांच दिनों तक ऐसे ही बना रहता है ढेर के अंदर सूक्ष्म जीवों द्वारा किण्वन की प्रक्रिया के कारण चौथे पांचवें दिन तक तापमान बढ़कर 70 सेंटीग्रेड से भी अधिक हो जाता है जिसे एक तापमापी से नापा जा सकता है।


(3) ढेर की पलटाई
छठवें दिन को पहली पलटाई कर दी जाती है पलट आई देते समय इस बात को विशेष ध्यान रखें की ढेर के प्रत्येक हिस्से को उलट पलट अच्छी तरह से की जाए। दूसरी पलटाई 10 दिन बाद तथा तीसरी पलटाई 13 से 14 दिन बाद करे। इसके बाद उसमें जिप्सम की पूरी मात्रा मिलाकर पुनः नया ढेर बनाते हैं। इसी प्रकार चार-पांच दिन बाद लगातार 1 महीने तक पलटाई करते रहें । 30 दिन बाद कंपोस्ट में अमोनिया 1 मी का परीक्षण किया जाता है।
नमी का स्तर जानने के लिए खाद को मुट्ठी में दबाते हैं। यादव आने पर हाथी ली वह उंगलियां गीली हो जाएं तो खाद में नमी का स्तर उचित माना जाता है ऐसी दशा में खाद में लगभग 70% नमी होती है।



उपरोक्त विधि से तैयार की गई खाद में निम्नलिखित गुण होने चाहिए--
(
1) खाद का रंग गहरा भूरा हो।
(2) खाद में नमी लगभग 70% होनी चाहिए।
(3) खाद में नाइट्रोजन की मात्रा 2-2.5% हो।
(4) खाद में अमोनिया गंध नहीं होनी चाहिए।
(5) खाद का PH- 7.2--7.8 के बीच हो।
(6) खाद में कोई रोगाणु या नाशक जीव ना हो।
बीजाणु करना--
उपयुक्त विधि से तैयार खाद में बीज मिलाया जाता है।खुम्ब का बीज देखने में सफेद व रेशमी कवक जाल युक्त होता है तथा इसमें किसी भी प्रकार की गंध नहीं होती। बीज खरीदते समय इन बातों का ध्यान रखना चाहिए। यदि बीज को अधिक दूर से खरीद कर लाना हो तो खरीद कर रात्रि के समय यात्रा करनी चाहिए जिससे बीज खराब ना हो।


बीजित खाद को पॉलीथिन के थैलों में भरना व कमरों में रखना
किसान भाई  किसी हवादार कमरे में बांस या अन्य प्रकार की मजबूत लकड़ी की सहायता से कमरे की ऊंचाई की दिशा में 2 फुट के अंतराल पर 3 फुट चौड़े सेल्फी आनी चौखट बना लें इस सेल्फ की लंबाई कमरे की लंबाई के अनुसार रखी जाती है। यह कार्य बिजाई करने से पहले कर लेना चाहिए।
बीजित खाद के थैले रखने से 2 दिन पहले कमरे के फर्श तथा दीवारो पर 2% फॉर्मलीन घोल का छिड़काव करें। इसके तुरंत बाद कमरे के दरवाजे तथा खिड़कियां इस प्रकार बंद करें की बाहर की हवा अंदर ना आ सके अगले दिन कमरे को दिन भर के लिए खोल दें।
इस प्रकार खुम्ब उत्पादन कक्ष तैयार एवं स्वच्छ कर लिया जाता है। अब खाद में बीज मिलाये और 10-15 Kg बीजित खादो को पॉलीथिन के थैलों में भरकर बंद कमरे में एक दूसरे से सटाकर रख दें। कमरे मे 22-25 सेल्सियस तापमान व 80 -85 % नमी बनाये रखे। नमी कम होने पर कमरे की दीवारों पर पानी का छिड़काव करे तथा फर्श पर पानी डालकर नमी को बढ़ाया जा सकता है। ऐसी परिस्थितियों में 2 सप्ताह में खाद में कवक जाल फैल जाता है जो सफेद धागों के रूप में दिखाई देता है।


केसिंग या आवरण
कवक जाल युक्त खाद को एक विशेष प्रकार के केसिंग मिश्रण से ढकना पड़ता है। तभी खुम्ब निकलना आरम्भ होता है। केसिंग परत चढ़ाने का उद्देश्य नवजात खुम्भ कलिकाओं को नमी पोषक तत्व प्रदान करना भी होता है। केसिंग मिश्रण एक प्रकार की मिट्टी है जिसे निम्न अवयवों में मिलाकर तैयार किया जाता है-
(1)- चार भाग दोमट मिट्टी व एक भाग रेत
(2)- 2 साल पुरानी गोबर की खाद व दोमट मिट्टी बराबर ।
(3)- दो साल पुरानी खुम्ब की खाद-2भाग, गोबर की खाद- एक भाग, चिकनी दोमट मिट्टी- एक भाग  ।
इस मिश्रण को खाद पर चढ़ाने से पहले इसे रोगाणुओं से मुक्त करना होता है रासायनिक उपचार विधि या केसिंग विधि सस्ती व सरल पर होती है इस विधि के अनुसार केसिंग मिश्रण को फॉर्मलीन नामक रसायन के 4% घोल से उपचारित किया जाता है। इस घोल को तैयार करने के लिए 4 लीटर फॉर्मलीन को 40 लीटर पानी में घोला जाता है। इस घोल के केसिंग मिश्रण को गीला किया जाता है तत्पश्चात इस मिश्रण को पॉलिथीन की केसिंग प्रक्रिया शुरू करने के 24 घंटे पूर्व हटाते हैं। अच्छे केसिंग मिश्रण की जल धारण क्षमता अधिक होनी चाहिए।


केसिंग के उपरांत फसल प्रबंधन
केसिंग प्रक्रिया पूर्ण कर लेने के पश्चात फसल की अधिक देखभाल करनी पड़ती है। प्रतिदिन थैलों में नमी का जायजा लेना चाहिए तथा आवश्यकता अनुसार पानी का छिड़काव करते रहें। केसिंग करने के लगभग 1 सप्ताह बाद जब कवक जाल खाद्य से केसिंग परत में फेल जाए तब कमरे का तापमान 22 से 25 सेंटीग्रेड से घटाकर 14 से 18 सेल्सियस पर ले आना चाहिए तथा इस तापमान को पूरे फसल उत्पादन तक बनाए रखना चाहिए। तापमान और नमी के अतिरिक्त मशरूम उत्पादन के लिए खिड़की व दरवाजे द्वारा आसानी से हवा अंदर आ सके और अंदर की हवा जिसमें कार्बन डाइऑक्साइड अधिक होती है वह बाहर जा सके। सुबह लगभग 1 घंटे के लिए दरवाजे व खिड़कियां खोल देनी चाहिए जिससे ताजी हवा मिल सके परंतु दरवाजे खिड़कियों में महीन जालीदार पर्दे लगाना जरूरी है ताकि मक्खियां आदि से बचा जा सके।


मशरूम की तुड़ाई-
मशरूम कालिकाएं बनने के 2-4 दिन बाद यह मशरूम कालिकाएं विकसित होकर बड़े खुम्बो में परिवर्तित हो जाती हैं। जब खुम्भों को टोपी का आकार 3 से 4 सेमी हो परंतु टोपी बंद हो तब इन्हें परिपक्व समझना चाहिए और मरोड़ कर तोड़ लेना चाहिए। तोरई के बाद शीघ्र इन मशरूम ओं का उपयोग में ले लेना चाहिए क्योंकि यह बहुत जल्दी खराब हो जाते हैं।


मशरूम की पैदावार (मुनाफा)
अच्छी देखभाल ,अच्छी खाद एवं अच्छे किस्म के बीज का उपयोग करने से लंबी विधि से तैयार की गई प्रति क्विंटल खाद से 12 से 15 किलोग्राम तथा छोटी विधि से तैयार की गई खाद से 20 से 25 किलोग्राम मशरूम 8 से 10 सप्ताह में प्राप्त होती है। इस प्रकार खाद बनाने के लगभग डेढ़ 2 महीने बाद यह मशरूम मिलने लगती है और लगातार  8  से 10 सप्ताह तक इसका उत्पादन मिलता रहता है। जिससे किसानों की  पैदावार में वृद्धि जा सकती है।


 मशरूम की खेती से अधिक मुनाफा
भारत बर्ष मे मशरूम जैसे गूदेदार कवकों को कई नामों से जाना जाता है। जैसे-कुकुरमुत्ता ,भूमिकवक ,खुंबी शाकाहारी मीट आदि। यह अत्यंत स्वादिष्ट एवं पौष्टिक भोज्य के रूप मे एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
आहार मूल्य
मशरूम पथरी,कैंसर,मधुमेह ,तथा ह्रदय रोगों से पीड़ित व्यक्तियों के लिए बहुत ही लाभदायक है। इसका आहार मूल्य निम्न प्रकार है जैसे-प्रोटीन,वसा,कार्बोहाइड्रेट,कॅल्शियम ,आयरन,आदि तत्व प्रचुर मात्रा मे  पाये जाते है।


मशरूम के लिए आवश्यक जलवायु - 
मशरूम के उत्पादन के लिए समशीतोष्ण जलवायु की आवश्यकता होती है। बीज के फैलाव के समय इसे 22 से 25 सेंटीग्रेड तक तापमान की आवश्यकता होती है। तथा फलन के समय तापमान 14 से 18 सेंटीग्रेड के बीच होना चाहिए। तापमान के अलावा श्वेत बटन खुम्ब को अत्यधिक नमी की जरूरत होती है। अतः पूरे उत्पादन में 80 से 90% नमी बनाए रखनी होती है।


मशरूम के लिए उपयुक्त भूमि--
मशरूम उत्पादन के लिए भूमि की आवश्यकता नहीं होती। इसका उत्पादन साधारण कमरे में ग्रीनहाउस गैरेज तथा बंद बरामदे में सफलतापूर्वक किया जा सकता है। व्यवसायिक उत्पादन के लिए विशेष रुप से निर्मित उत्पादन कक्ष अधिक लाभकारी होता है।


मशरूम की किस्में--  भारत की जलवायु के आधार पर मशरूम की मुख्य रूप से निम्न प्रकार की किस्में उगाई जा सकती हैं।

(1) पैडी स्ट्रा मशरूम ---- इसे गर्मियों में धान के पुआल पर 30 से 35 सेंटीग्रेड तापमान पर तथा 80% आर्द्रता मैं अच्छी प्रकार से उगाया जा सकता है।

(2) ढींगरी मशरूम-- विशेष शरद ऋतु मे ( सितंबर- मार्च) 20 से 30 सेंटीग्रेड तापमान पर तथा 80 से 90% आर्द्रता में धान के पुआल पर उगाया जा सकता है।

(3) बटन मशरूम( फील्ड मशरूम)-- इसे शरद ऋतु में धान के पुआल या गेहूं के भूसे की कंपोस्ट पर 80 से 90% आर्द्रता तथा 15 से 25 सेल्सियस तापमान पर पैदा किया जा सकता है ।यह सबसे अधिक लोकप्रिय किस्म  है। बाजार में सबसे अधिक इसी किस्म के मशरूम की मांग है।


मशरूम उगाने का समय---
श्वेत बटन खुम्ब को भी एक निश्चित ऋतु में उगाया जाता है। मैदानी भागों में श्वेत खुम्ब उगाने  के लिए उचित समय शरद ऋतु में नवंबर से फरवरी तक होता है।
बटन खुम्ब की दो खाद्य जातियां एगेरिकस बाइस्पोरस और एगेरिकस वाइटॉरकिस की अब कृत्रिम खेती की जाती है और वैज्ञानिकों के अनेक प्रयासों के फलस्वरूप इन खुम्बो को कृत्रिम ढंग से तैयार की गई कंपोस्ट पर उगाया जाता है।



मशरूम के लिए कंपोस्ट तैयार करना
मशरूम की अच्छी पैदावार लेने के लिए पोषक तत्वों की संतुलित मात्रा में आवश्यकता पड़ती है मृदा जांच के उपरांत खाद एवं उर्वरकों का उपभोग आर्थिक दृष्टि से उपयुक्त रहता है मृदा की जांच ना होने की अवस्था में सामान्य रूप से निम्न तत्वों का उपयोग कर सकते हैं।
गेहूं का भूसा 300 किलोग्राम, अमोनिया नाइट्रेट 9 किलोग्राम, यूरिया खाद 3 किलोग्राम, 3 किलोग्राम पोटाश, 3 किलोग्राम फास्फेट ,10 किलोग्राम आटा का चोकर ,30 किलोग्राम जिप्सम आदि तत्वों को मिलाकर कंपोस्ट खाद तैयार की जा सकती है।



(1) उर्वरक मिश्रण तैयार करना
भूसे को पक्के फर्श पर 24 घंटे तक रुक रुक कर पानी का छिड़काव करके गीला किया जाता है। भूसे को गीला करते समय पैरों से दबाना और अच्छा रहता है। ऐसा करने से भूसे में पानी की अवशोषण क्रिया अधिक होती है। साथ ही गीले भूसे की ढेरी बनाने के 12-16 घंटे पहले जिप्सम को छोड़कर अन्य सभी पोषक तत्व जैसे'--- उर्वरक, चोकर आदि को एक साथ मिलाकर गीला कर लेते हैं। और ऊपर से गीली बोरी से ढक देते हैं रात भर इसी प्रकार ढके रहने पर सभी उर्वरक घुलकर  चोकर में अवशोषित हो जाते हैं और एक उपयुक्त मिश्रण तैयार हो जाता है।



(2) ढेर बनाना
गीले किए गए भूसे में उर्वरक मिश्रण को मिला दिया जाता है और लकड़ी के तत्वों की सहायता से 5 फुट चौड़ा और 5 फुट ऊंचा ढेर बनाते हैं। ढेर की लंबाई सामग्री की मात्रा पर निर्भर करती है लेकिन ऊंचाई और चौड़ाई ऊपर लिखे माफ से अधिक वह कम नहीं होनी चाहिए। यह ढेर चार-पांच दिनों तक ऐसे ही बना रहता है ढेर के अंदर सूक्ष्म जीवों द्वारा किण्वन की प्रक्रिया के कारण चौथे पांचवें दिन तक तापमान बढ़कर 70 सेंटीग्रेड से भी अधिक हो जाता है जिसे एक तापमापी से नापा जा सकता है।



(3) ढेर की पलटाई
छठवें दिन को पहली पलटाई कर दी जाती है पलट आई देते समय इस बात को विशेष ध्यान रखें की ढेर के प्रत्येक हिस्से को उलट पलट अच्छी तरह से की जाए। दूसरी पलटाई 10 दिन बाद तथा तीसरी पलटाई 13 से 14 दिन बाद करे। इसके बाद उसमें जिप्सम की पूरी मात्रा मिलाकर पुनः नया ढेर बनाते हैं। इसी प्रकार चार-पांच दिन बाद लगातार 1 महीने तक पलटाई करते रहें । 30 दिन बाद कंपोस्ट में अमोनिया 1 मी का परीक्षण किया जाता है।
नमी का स्तर जानने के लिए खाद को मुट्ठी में दबाते हैं। यादव आने पर हाथी ली वह उंगलियां गीली हो जाएं तो खाद में नमी का स्तर उचित माना जाता है ऐसी दशा में खाद में लगभग 70% नमी होती है।
उपरोक्त विधि से तैयार की गई खाद में निम्नलिखित गुण होने चाहिए--
(1) खाद का रंग गहरा भूरा हो।
(2) खाद में नमी लगभग 70% होनी चाहिए।
(3) खाद में नाइट्रोजन की मात्रा 2-2.5% हो।
(4) खाद में अमोनिया गंध नहीं होनी चाहिए।
(5) खाद का PH- 7.2--7.8 के बीच हो।
(6) खाद में कोई रोगाणु या नाशक जीव ना हो।



बीजाणु करना--
उपयुक्त विधि से तैयार खाद में बीज मिलाया जाता है।खुम्ब का बीज देखने में सफेद व रेशमी कवक जाल युक्त होता है तथा इसमें किसी भी प्रकार की गंध नहीं होती। बीज खरीदते समय इन बातों का ध्यान रखना चाहिए। यदि बीज को अधिक दूर से खरीद कर लाना हो तो खरीद कर रात्रि के समय यात्रा करनी चाहिए जिससे बीज खराब ना हो।



बीजित खाद को पॉलीथिन के थैलों में भरना व कमरों में रखना
किसान भाई  किसी हवादार कमरे में बांस या अन्य प्रकार की मजबूत लकड़ी की सहायता से कमरे की ऊंचाई की दिशा में 2 फुट के अंतराल पर 3 फुट चौड़े सेल्फी आनी चौखट बना लें इस सेल्फ की लंबाई कमरे की लंबाई के अनुसार रखी जाती है। यह कार्य बिजाई करने से पहले कर लेना चाहिए।
बीजित खाद के थैले रखने से 2 दिन पहले कमरे के फर्श तथा दीवारो पर 2% फॉर्मलीन घोल का छिड़काव करें। इसके तुरंत बाद कमरे के दरवाजे तथा खिड़कियां इस प्रकार बंद करें की बाहर की हवा अंदर ना आ सके अगले दिन कमरे को दिन भर के लिए खोल दें।
इस प्रकार खुम्ब उत्पादन कक्ष तैयार एवं स्वच्छ कर लिया जाता है। अब खाद में बीज मिलाये और 10-15 Kg वीडियो दिखा दो को पॉलीथिन के थैलों में भरकर बंद कमरे में एक दूसरे से सटाकर रख दें। कमरे मे 22-25 सेल्सियस तापमान व 80 -85 % नमी बनाये रखे। नमी कम होने पर कमरे की दीवारों पर पानी का छिड़काव करे तथा फर्श पर पानी डालकर नमी को बढ़ाया जा सकता है। ऐसी परिस्थितियों में 2 सप्ताह में खाद में कवक जाल फैल जाता है जो सफेद धागों जैसे दिखाई देता है।



केसिंग या आवरण
कवक जाल युक्त खाद को एक विशेष प्रकार के केसिंग मिश्रण से ढकना पड़ता है। तभी खुम्ब निकलना आरम्भ होता है। केसिंग परत चढ़ाने का उद्देश्य नवजात खुम्भ कलिकाओं को नमी पोषक तत्व प्रदान करना भी होता है केसिंग मिश्रण एक प्रकार की मिट्टी है जिसे निम्न अवयवों में मिलाकर तैयार किया जाता है-
(1)- चार भाग दोमट मिट्टी व एक भाग रेत
(2)- 2 साल पुरानी गोबर की खाद व दोमट मिट्टी बराबर ।
(3)- दो साल पुरानी खुम्ब की खाद-2भाग, गोबर की खाद- एक भाग, चिकनी दोमट मिट्टी- एक भाग  ।

इस मिश्रण को खाद पर चढ़ाने से पहले इसे रोगाणुओं से मुक्त करना होता है रासायनिक उपचार विधि या केसिंग विधि सस्ती व सरल पर होती है इस विधि के अनुसार केसिंग मिश्रण को फॉर्मलीन नामक रसायन के 4% घोल से उपचारित किया जाता है। इस गोल को तैयार करने के लिए 4 लीटर फॉर्मलीन को 40 लीटर पानी में घोला जाता है। इस घोल के केसिंग मिश्रण को गिला किया जाता है तत्पश्चात इस मिश्रण को पॉलिथीन की केसिंग प्रक्रिया शुरू करने के 24 घंटे पूर्व हटाते हैं। अच्छे केसिंग मिश्रण की जल धारण क्षमता अधिक होनी चाहिए।



केसिंग के उपरांत फसल प्रबंधन
केसिंग प्रक्रिया पूर्ण कर लेने के पश्चात फसल की अधिक देखभाल करनी पड़ती है। प्रतिदिन थैलों में नवमी का जायजा लेना चाहिए तथा आवश्यकता अनुसार पानी का छिड़काव करते रहें। केसिंग करने के लगभग 1 सप्ताह बाद जब कवक जाल खाद्य से केसिंग परत में फेल जाए तब कमरे का तापमान 22 से 25 सेंटीग्रेड से घटाकर 14 से 18 सेल्सियस पर ले आना चाहिए तथा इस तापमान को पूरे फसल उत्पादन तक बनाए रखना चाहिए। तापमान और नमी के अतिरिक्त मशरूम उत्पादन के लिए खिड़की व दरवाजे द्वारा आसानी से हवा अंदर आ सके और अंदर की हवा जिसमें कार्बन डाइऑक्साइड अधिक होती है वह बाहर जा सके। सुबह लगभग 1 घंटे के लिए दरवाजे व खिड़कियां खोल देनी चाहिए जिससे ताजी हवा मिल सके परंतु दरवाजे खिड़कियों में महीन जालीदार पर्दे लगाना जरूरी है ताकि मक्खियां आदिसे बचा जा सके।



मशरूम की तुड़ाई-
मशरूम कालिकाएं बनने के 2-4 दिन बाद यह मशरूम कालिकाएं विकसित होकर बड़े खुम्बो में परिवर्तित हो जाती हैं। जब खुम्भों को टोपी का आकार 3 से 4 सेमी हो परंतु टोपी बंद हो तब इन्हें परिपक्व समझना चाहिए और मरोड़ कर तोड़ लेना चाहिए। तोरई के बाद शीघ्र इन मशरूम ओं का उपयोग में ले लेना चाहिए क्योंकि यह बहुत जल्दी खराब हो जाते हैं।



मशरूम की पैदावार (मुनाफा)
अच्छी देखभाल अच्छी खाद एवं अच्छे किस्म के बीज का उपयोग करने से लंबी विधि से तैयार की गई प्रति क्विंटल खाद से 12 से 15 किलोग्राम तथा छोटी विधि से तैयार की गई खाद से 20 से 25 किलोग्राम मशरूम 8 से 10 सप्ताह में प्राप्त होती है। इस प्रकार खाद बनाने के लगभग डेढ़ 2 महीने बाद यह मशरूम मिलने लगती है और लगातार  8 से 10 सप्ताह तक इसका उत्पादन मिलता रहता है। जिससे किसानों की  पैदावार में वृद्धि जा सकती है।