Tuesday, 9 June 2020

नींबू की खेती कैसे करें


फलदार फसलों मे सबसे ज्यादा फायदा देने वाली फसलों की बात की जाए तो नीबू की फसल सबसे कम समय मे सबसे ज्यादा फायदा देती है नीबू की फसल मे नुकसान भी कम होता है |
खट्टे फलों में नींबू का प्रमुख स्थान है भारत में इसे बड़े पैमाने पर उगाया जाता है इसमें विटामिन सी और अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं इनके फलों से साइट्रिक अम्ल ,परिरक्षित रस ,पेक्टिन, अचार, तेल तथा अनेक दवाइयां बना सकते हैं यह गृह वाटिका के लिए आदर्श फल है।


नींबू के लिए आवश्यक जलवायु---नींबू की खेती उत्तरी भारत में जहां पर कम पाला पड़ता है, वातावरण नम व जाड़े की ऋतु लंबी होती है। खट्टी किस्म के नींबू शुष्क और नाम दोनों प्रकार की जलवायु में उगाए जाते हैं ।नींबू प्रजाति के उत्पादन पर तापक्रम का काफी प्रभाव पड़ता है इन्हें केवल एक निश्चित ऊंचाई पर ही वाया जा सकता है।


नींबू के लिए आवश्यक मिट्टी--
इसे सभी प्रकार की मिट्टियों में उगाया जा सकता है लेकिन दो से 3 मीटर गहरी और उर्वर दोमट मिट्टी इसके लिए उपयुक्त पाई गई है जल प्लावन क्षेत्र नींबू के लिए हानिकारक होते हैं।



उन्नत किस्में-----
नींबू की अनेक अच्छी किस्में प्रचलित हैं------ कागजी नींबू ,लखनऊ सीड, यूरेका लंबा ,यूरेका गोल, पंत लेमन -1, मेगर, पंत नींबू,बारहमासी, पहाड़ी नींबू, खट्टा सलेक्शन, वेदना, मेयर ,कागजी कला नींबू, जंबूरी आदि।

नींबू की प्रमुख जातियों के गुण---

(1) यूरेका लंबा-----::इस किस्म के फल अंडाकार होते हैं और उनके सिर पर चोच सी निकली रहती है। फलों में बीज बहुत कम या बिल्कुल नहीं होती और रस की मात्रा अधिक होती है इसमें फल अधिक लगते हैं।

(2) पंत लेमन-1-----::यह किस में पंतनगर विश्वविद्यालय द्वारा विकसित की गई है एनी के फल बड़े आकर्षक और अधिक रसीले होते हैं पंत नींबू से वर्ष फल मिलते रहते हैं।

(3) यूरेका गोल-----यह किस्म के पौधे छोटे आकार के होते हैं ।और काफी फैलते हैं । इनके फल गोल और चिकने होते हैं ,फलों का छिलका पतला होता है ।और उन में रस की मात्रा अधिक होती है।
(4) बारहमासी नींबू-----::इसका फल चटपटा छिलका थोड़ा मोटा पीले रंग का गूदा नरम और काफी रसदार होता है ।  इसके फल वर्ष भर मिलते हैं।

(5) कागजी नींबू-------::इसके फल छोटे आकार के गोल तथा अंडाकार होते हैं इसका छिलका पतला नरम तथा कसा हुआ होता है इन फलों में रस अधिक होता है तथा फल का रंग पीला होता है।




प्रवर्धन या प्रसारण------नींबू को बीज द्वारा अथवा वनस्पतिक प्रवर्धन विधियों द्वारा लगाया जा सकता है बीजू पौधे देर से फल देते हैं परंतु यह अधिक सहिष्णु और दीर्घ जीवी होते हैं वानस्पतिक भागों द्वारा इनको कई तरह से लगाया जा सकता है जैसे----कलम बांधना, दाब लगाना , गूटी भेंट- कलम ,और चश्मा चढ़ाना आदि।

(1) बीज द्वारा----:
बीजों को बसंत ऋतु में ही बोनाअच्छा रहता है जब भूमि का तापमान 12. 7 डिग्री सेंटीग्रेड से ऊपर होता है तो बीजों का जमाव शुरू हो जाता है।  12.7 से 14.4 डिग्री सेंटीग्रेड औसत तापमान बीज अंकुरण के लिए उपयुक्त होता है। बीज को क्यारियों में 2.5 सेमी की दूरी पर और 2.5 सेमी की गहराई पर होना चाहिए। बोने के समय भूमि में काफी नमी होनी चाहिए। वुवाई के बाद जब पौधे 0.5 से 2 सेमी मोटे हो जाते हैं तो उन्हें बीज क्यारी से निकालकर दूसरी क्यारियों में लगा देना चाहिए। नई स्थान में लगाते समय केवल स्वस्थ व प्रबल पौधे ही चुने जाने चाहिए और असामान्य पौधों को छांट देना चाहिए। नर्सरी में भी पौधों की देखभाल करनी चाहिए।

(2)  कलम बांधना-------नींबू का प्रवर्धन कलम द्वारा किया जाता है कलम के लिए तीन तरह की शाखाओं का प्रयोग किया जा सकता है परिपक्व कलम अर्ध परिपक्व तथा मुलायम।
नींबू की 15 से 20 सेमी लंबी परिपक्व शाखा कलम के लिए प्रयोग की जाती है जिस स्थानों पर कुहासा उपकरण की सुविधा हो वहां अर्ध परिपक्व तथा मुलायम शाखा को भी प्रयोग में लाया जा सकता है।

कलम के लिए शाखा चुनते समय यह ध्यान रखना चाहिए। कि वह स्वस्थ हो कलम का निचला हिस्सा गांठ के 2 मिलीमीटर नीचे से सीधा काटना चाहिए। कलम को अच्छी तरह तैयार भूमि में लगा देना चाहिए कलम लगाने का मुख्य समय मार्च से अप्रैल और जून से जुलाई है।



नीबू की रोपाई-----

नीबू के पौधे 6×6 मीटर की दूरी पर लगाने चाहिए। पौधे लगाने से एक महीना पहले 75×75×75 सेमी आकार के गड्ढे खोदकर उसमें से निकाली हुई मिट्टी को 10 से 15 दिन धूप में खुला छोड़ गए इसके बाद उस मिट्टी में 20 किलोग्राम कंपोस्ट या गोबर की खाद 20 ग्राम नाइट्रोजन 50 ग्राम फास्फोरस 25 ग्राम पोटाश और 100 ग्राम एल्डेक्स अच्छी तरह मिला देना चाहिए। अब इस मिट्टी को गड्ढे में भरकर हल्की सिंचाई कर दें जिससे मिट्टी गड्ढे में अच्छी तरह बैठ जाए इसके बाद गड्ढे के बीच में नींबू का पौधा लगा देना।

             नींबू के पौधों की सिंचाई

नींबू के पौधों में सिंचाई आवश्यक होती है लेकिन अधिक सिंचाई करने पर फसल को काफी हानि पहुंचती है भूमि में पानी की निकास का उचित प्रबंध होना बहुत ही आवश्यक होता है। यदि भूमि से पानी के निकासी का उचित प्रबंध हो तो गर्मियों में 15 वे दिन और अन्य तत्वों में प्रति महीने सिंचाई की आवश्यकता होती है।
नींबू की खेती के लिए आवश्यक खाद तथा उर्वरक

कंपोस्ट व गोबर की खाद तथा फास्फेट और पोटाश को दिसंबर से जनवरी के महीने में देते हैं (यूरिया नाइट्रोजन को वर्ष में तीन बार मैं देना चाहिए) एक तिहाई मात्रा फरवरी में फिर एक तिहाई मात्रा जून में तथा शेष एक तिहाई मात्रा को सितंबर के महीने में देना चाहिए।

फूल और फल लगना------

कुछ नींबू के पौधे पर लगभग वर्षभर फूलते -फलते रहते हैं। लेकिन उनमें से अधिकांश के फूलने फलने का समय निश्चित है। नींबू के पेड़ों में फरवरी में फूल लगने की रितु को अम्ली बहारी कहते हैं।
नींबू में फल लगने का दूसरा समय जुलाई का महीना है इस समय को मृग बहार कहते हैं । इस प्रकार फरवरी में फूलने वाले पेड़ों में नवंबर से दिसंबर और जुलाई मैं फूलने वालों में अप्रैल से मई और जून में फल पकते हैं। नींबू की बस में 2 में से केवल एक ही फसल लेनी चाहिए।
नींबू के पेड़ को बाग में रोकने के लगभग 3 से 5 वर्ष बाद फल लगना प्रारंभ होता है यूरेका तथा पनत लेमन मैं दूसरे ही वर्ष फल लगने प्रारंभ हो जाते हैं।

 नींबू के फल गिरने से रोकना----- यदि फल पकने से या तोडने से पहले गिरने लगे तो इसकी रोकथाम के लिए 10 पीपीएम,2-4, 0.5% जिंक सल्फेट व 20 पी पी एम ऑरियोफंजीन का छिड़काव मई तथा सितंबर में करते हैं। 




           नींबू के फलों को तोड़ना

नींबू के फल पेड़ पर लगभग  साथ - साथ ही पक जाते हैं। एक ही पेड़ के सभी फलों को आवश्यकता पड़ने पर एक ही बार में तोड़ा जा सकता है। जब फलों का रंग गहरा पीला हो जाता है तब उन्हें तोड़ते हैं। 8 से 10 वर्ष की आयु वाले पौधे से एक से डेढ़ कुंतल फल प्रतिवर्ष पेड़ प्राप्त हो जाता है इस प्रकार 1 हेक्टेयर से लगभग 200 से 250 कुंतल उत्पादन मिल जाता है।

      नींबू पर रोग नियंत्रण

(1) सिटॢस कैंकर----- यह रोग जीवाणु द्वारा होता है इस बीमारी से पत्ते कांटे टहनियां एवं फल प्रभावित होते हैं इस बीमारी में सबसे पहले पीला सा दाग पड़ता है तथा बाद में भूरे रंग में बदल जाता है। कागजी नींबू में इस रोग का प्रभाव अधिक देखा गया है जिसमें नींबू के फलों पर खुरदरे भूरे रंग के दाग पड़ जाते हैं। और फल भद्दे नजर आते है। जिससेे इनका बाजार भाव कम हो जाता है।
रोकथाम-----

* रोग से प्रभावित पेड़ों को काट कर नष्ट कर देना चाहिए। कम आक्रमण के समय प्रभावित टहनियों को काट कर जला देना चाहिए।

*  तेरे पेड़ पर बरसा के पहले ब्लाइटाॅक्स-50 का 0.3 % का घोल 15-20 दिन के अंतर से छिड़कना चाहिए।


(2) गमोसिस------यह बीमारी बहुत से कवकों द्वारा पैदा होती है इन्हीं के कारण फलों में सड़न पैदा हो जाती है लेकिन यह कवक जो नींबू प्रजाति के पौधे के तनों में  लगता है वह अधिक भयंकर होता है इस बीमारी में तने से गोंद जैसी वस्तु बाहर निकलने लगती है तत्पश्चात तने में बड़ी-बड़ी दरारें पड़ने से छाल नीचे गिरने लगती है। और पेड़ कमजोर हो जाते हैं।

रोकथाम--------
इस रोग से प्रभावित विभाग को ऊपर से छीलकर 450 ग्राम जिंक सल्फेट 450 ग्राम कॉपर सल्फेट 900 ग्राम चुना को 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। रोग से प्रभावित टहनियों को तोड़कर मिट्टी में दवा देनी चाहिए।

नींबू पर कीट नियंत्रण

(1) सफेद मक्खी------नींबू वर्ग के फलों पर इसे कीट की लगभग 12 जातियां आक्रमण करती हैं जिसमें सबसे अधिक हानी डायएल्यूरोडिश  सिट्राई कीट के द्वारा होती है। इसका रंग हल्का पीला होता है और आंखें लाल रंग की होती हैं। माधव मक्खी फरवरी के अंत से लेकर अप्रैल के मध्य और फिर अगस्त के प्रारंभ से लेकर अक्टूबर तक अंडे देती है। अंडों से लगभग 10 दिन की शिशु निकल आते हैं इसके प्प्रौढ तथा शिशु दोनों पत्तियों के निचले भाग से चिपक कर रस चूसते हैं।

रोकथाम-----कीट का प्रकोप कम होने की अवस्था में प्रभावित पत्तियों को तोड़कर जला देना चाहिए और 0.03 परिषद पैराथियान घोल के 15-20 दिन के अंतराल पर दो-तीन छिड़काव करने चाहिए।

(2) फल चूसने वाला पतंगा--------नींबू वर्ग के फलों पर इस पतंगे की अनेक जातियां आक्रमण करती हैं इनमें से अधिक हानि ओथरिअस फुलोनिक के द्वारा होती है। यह पतंगे अपनी सूॅड से फलों को छेद कर उनका रस चूसते हैं। पतंगा फलों में जिस स्थान पर छेद करता है उस क्षेत्र से हानिकारक जीवाणु भी प्रवेश कर जाते हैं और फलों को चढ़ा देते हैं दिन में यह पेड़ की छाल और नीचे गिरी हुई पत्तियों में छिप जाता है और रात में फलों को नुकसान पहुंचाता है इस कीट की मादा खरपतवारो पर अंडे देती है ।
रोकथाम----'
(1) फलों को पतले कागज के थैले से बांध देना चाहिए।
(2) बाग में समय-समय पर निराई गुड़ाई और सफाई करके खरपतवार को नष्ट कर दे ।
(3) 0.2% मेलाथियान-50 का छिड़काव करना चाहिए।

 नींबू के छिलका खाने वाली सुँडी-----

यह सूँड़ी अधिकतर पुराने पेड़ों को नुकसान पहुंचाती है मादा 15 से 25 के गुच्छो मे मई-जून में पेड़ की छाल पर अंडे देती है।जिनसे 10-12 दिन के भीतर सूँडिया निकल आती है सूँडियां प्रारंभ में तने की छाल को खुरची हैं और बड़ी हो जाने पर तने में घुस जाती हैं तने के भीतर छेद हो जाने से पेड़ के सभी भागों में पोषक तत्व नहीं पहुंच पाते जिसके कारण पेड़ कमजोर हो जाता है। पेड़ पर इस कीट के मल से बने हुए छेदो को देखकर इसके प्रकोप का पता लग जाता है।

रोकथाम---------पेट्रोल डाई क्लोरोवास अथवा एंडोसल्फान दवा में रुई भिगोकर कीट द्वारा बनाए छेद के भीतर डाल दें और फिर छेद को गीली मिट्टी से बंद कर देना चाहिए।  यदि छेद दूसरे दिन खुला हुआ दिखाई  दे तो दवा मे रूई भिगोकर फिर से छेद के भीतर डाल देनी चाहिए ।

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