Sunday, 21 June 2020

काशीफल की खेती


काशीफल की खेती भारत में प्राचीन काल से की जा रही है इसके पके फलों को सामान्य ताप पर काफी लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है इसकी कोमल पत्तियों तथा फूलों से भी सब्जी बनाई जाती है इनके बीजों से कीटनाशक तैयार किए जा सकते हैं।

 जलवायु---सीताफल गर्म मौसम की सब्जी है इसकी खेती जायद तथा खरीफ दोनों मौसम में की जाती है। नेपाली के प्रति बहुत प्रभावित होती है इसके अंकुरण के लिए 20 से 21 सेंटीग्रेड तथा वृद्धि और विकास के लिए 22 से 25 सेंटीग्रेड तापक्रम उचित होता है।

भूमि एवं उसकी तैयारी---

यह फसल सभी प्रकार की मिट्टियों में उगाई जा सकती है। इसके लिए हल्की दोमट मिट्टी सर्वोत्तम मानी जाती है। भूमि में उचित जल निकास का होना आवश्यक होता है।
इसलिए खेत की तैयारी के लिए एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा 3-4 जुताइयाॅ कल्टीवेटर से करनी चाहिए प्रत्येक देसी हल्की जुताई के बाद पाटा लगाकर खेत को भुरभुरा बना लिया जाता है।

उन्नत किस्में----
पूसा विश्वास ,कोयंबटूर-1, कोयंबटूर-2 ,पूसा विकास , पूसा रत्नाकर ,पूषा अलंकार, सोलन बादामी ,आजाद कद्दू, पूसा शंकर ,सी॰एम-14,

 पूसा विश्वास ----
बीज बोने लगभग 120 दिन के अंदर फल पककर तैयार हो जाता है । फल गोल एवं मध्यम आकार के होते है। इनकी उपज 300 से 400 कुंतल तक मिल जाती है।

पूसा विकास --- यह  किस्म 125 दिन मे तैयार हो जाती है। फल गोल तथा छोटे आकार के होते है। यह किस्म व्यवसायिक उत्पादन के लिए उपयुक्त है। इस किस्म का औसत उत्पादन 300 कुंतल प्रति हेकटेर है।

अर्का चंदन----यह फल माध्यम आकार के जिनका औसत भार 2.5 से 3 किलोग्राम और फल दोनों सिरों पर कुछ दबा हुआ होता है। गूदा मीठा व अत्यंत मधुर गंध वाला होता है। इनमे विटामिन ए अधिक मात्रा मे पाया जाता है। इस किस्म की ऑसत उपज 325 कुंतल प्रति हेक्टेयर है।

अर्का सूर्यमुखी-----  इस किस्म के फल लगभग 110 दिन मे तैयार हो जाते है। फल छोटे,गोल चपटे व नारंगी रंग के होते है। फलों पर सफेद धारियाँ बनी होती है,गूदा सुगंधित एवं अधिक विटामिन सी वाला होता है। यह किस्म फल मक्खी के लिए अत्यंत प्रीतिरोधी होती है। इस किस्म का औसत उत्पादन 350 कुंतल प्रति हेक्टेयर है।

वी आर एम 5---- यह किस्म भारतीय अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली द्वारा तैयार की गई है। इसका गूदा गहरे हरे रंग का होता है। यह किस्म फफूंदी तथा कुकूम्बर ग्रीन मोटेल विषाणु की प्रतिरोधी किस्म है।

पूसा संकर --- -यह किस्म लगभग 120 दिन मे फसल देना शुरू कर देती है। इसके फल चपटे और भार मे लगभग 4.5 किलो के होते है। इनकी लताओं की लंबाई अधिक होते है। इस किस्म का उत्पादन 450 कुंतल प्रति हेक्टेयर है।

कोयंबटूर---- यह एक पछेती किस्म है। जो लगभग 125 से 135 दिनों मे तैयार हो जाती है। फल ग्लोब के आकार के मध्यम बड़े एवं आकर्षक होते है। प्रत्येक बेल पर 7 से 9 फल लगते है।


खाद तथा उर्वरक----
गोबर की सड़ी खाद   -------200 से 250 कुंतल प्रति हेक्टेयर
नाइट्रोजन        ---------    50 से 60 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर 
फास्फोरस-------'----         70 से 80 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर 
पोटाश    ----------------   50 से 60 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर
गोबर की खाद बीज बोने की तीन चार सप्ताह पूर्व खेत में मिला दे नाइट्रोजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा बीज बोने के समय खेत में अच्छी तरह से मिला देनी चाहिए नाइट्रोजन की आधी मात्रा जो पौधे पर तीन से चार पत्तियां आ जाएं तथा शेष नाइट्रोजन फूल निकलने के समय पौधों के चारों तरफ से टॉप ड्रेसिंग के रूप में देकर मिट्टी में मिला दें तथा बाद में सिंचाई कर दें।

बोने का समय
ग्रीष्मकालीन फसल  -------- जनवरी से मार्च तक 
वर्षा कालीन फसल----------- जून से जुलाई तक


बोने की विधि 
(1) ग्रीष्मकालीन फसल की बुवाई नालियों में की जाती है यह नालियां 70 से 75 सेमी चौडी 10 से 12 सेमी गहरी तथा 150 सेमी की दूरी पर बनाई जाती है नालियों में 2-3 बीज एक स्थान पर 60 सेमी की दूरी पर बोए जाते हैं।
(2) वर्षा कालीन फसल में 1.5 मीटर की दूरी पर थाले बनाकर एक स्थान पर तीन या चार बीज 3 से 5 सेमी की गहराई पर लगाए जाते हैं एक थाले से दूसरे थाले की दूरी 1 मीटर रखी जानी चाहिए।


सिंचाई तथा जल विकास---वर्षा कालीन फसल में आमतौर पर सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है यदि लंबे समय तक वर्षा ना हो तो आवश्यकतानुसार सिंचाई कर देनी चाहिए। ग्रीष्मकालीन में फसल की 5 से 7 दिन के अंतर से सिंचाई करनी चाहिए। 
वर्षा कालीन फसल के लिए जल निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए जिससे खेत के फालतू पानी को समय से बाहर निकाला जा सके।


खरपतवार नियंत्रण-------
ग्रीष्मकालीन फसल में दो से तीन तथा वर्षा कालीन फसल में तीन से चार बार निकाय गुड़ाई की आवश्यकता होती है निकाय गोडाई का कार्य खरपी तथा फावड़ा के द्वारा किया जा सकता है। निकाई गुड़ाई करने से खरपतवार नष्ट होने के साथ-साथ मिट्टी वायु संचार बढ़ जाता है तथा मिट्टी नमी संरक्षण में भी लाभ होता है।
खरपतवार को नष्ट करने के लिए वैशालीन दवा का एक किलोग्राम सक्रिय अवयव को 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से बीज बोने से पहले खेत में छिड़क छिड़क कर मिट्टी में मिला देने से खरपतवार अंकुरित नहीं होते हैं।


रोग नियंत्रण----

(1) मृदु रोमिल आसिता 
यह फफूंदी केवल पत्तियों पर आक्रमण करती है जिन क्षेत्रों में वर्षा अधिक होती है वहां पर इसरो का प्रकोप अधिक होता है। पत्तियों की ऊपरी सतह पर पीले से लेकर भूरे रंग के धब्बे पढ़ते हैं तथा निचली सतह पर रुई के सामान मुलायम वृद्धि होती है जिसके कारण पौधों पर फल कम लगते हैं।
रोकथाम--
इस रोग के नियंत्रण के लिए डाईथेन  M-45  के 0.2% के घोल का 10 से 15 दिन के अंतराल पर दो से तीन बार छिड़काव करते है।


पाउडर आशिता  --
इस रोग से पत्तियों पर सफेद तथा पीले रंग का पाउडर जैसा पदार्थ इकट्ठा हो जाता है और बाद में बादामी रंग बदल कर पत्तियां समाप्त हो जाती हैं।
रोकथाम---- इस रोग के नियंत्रण के लिए 0.3%  केराथेन का छिड़काव करना चाहिए।


कीट नियंत्रण

ऐपीलेकना कीट--- यह कीट फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं यह अंकुरित हो रहे छोटे पौधों को खाते हैं।
उपाय--- मैलाथियान के घोल का छिड़काव करना चाहिए।

तना छेदक कीट----इस कीट की सुडियाॅ रात में निकलते हैं जो कोमल तनों को जमीन की सतह से काट देती है।
उपाय---
इन कीटों से बचाव के लिए अंतिम जुताई के समय हेप्टाक्लोर 5% के घोल को 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में अच्छी तरह से मिला दे।

फल मक्खी ---- इस कीट की मादा अपने अण्डरोपक को फलों की ऊपरी सतह के ठीक नीचे प्रवेश कराकर अंडे देती है। वे अंडे फल के अंदर फूटते है। और उनसे मैगत निकलता है। जो फलों को अंदर ही अंदर खाता रहता है। जिससे फल खराब हो जाते है।

रोकथाम--- जब पौधे पर फूल आना प्रारंभ हो जाए उस समय सेविन दवा के 0.2 प्रतिशत घोल का 15 दिन के अंतराल पर 2 से 3  छिड़काव करने चाहिए।

माहू ---- ये अत्यंत छोटे-छोटे हरे रंग के कीट होते है। इनके शिशु तथा प्रौड पौधों के कोमल भागों से रस चूसते है। इन कीटों की संख्या बहुत तेजी से बडती है। पत्तियां पीली पड़ जाती है। यह कीट विषाणु के फैलाने का कार्य करता है। इस कीट का प्रकोप उस समय अधिक होता है जव तापमान सामान्य से कम हो और आर्द्रता अधिक हो।
रोकथाम---- इस कीट के नियंत्रण के लिए साइपर मेथन, के 0.15 प्रतिशत घोल का छिड़काव करना चाहिए। 

फलों की तोड़ाई-----सीताफल की कटाई पूर्ण रूप से पक जाने पर की जाती है जो बाजार की मांग पर आधारित होती है बीज बोने के 70 से 90 दिनों के बाद हरे फल तोड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं फल जब औसत आकार का हो जाए तो मुलायम अवस्था में ही तोड़ लेना चाहिए। लंबे समय के भंडारण के लिए फलों को उस समय तोड़ना चाहिए जब वह पूरी तरह से पक जाए।


बीज उत्पादन---
 सीताफल के शुद्ध बीज उत्पादन के लिए पृथक्करण की दूरी 400 मीटर रखनी चाहिए। जिससे दूसरी किस्म से पर परागण ना हो सके बीज लेने वाली फसल से आवांछनीय पौधों को प्रारंभिक अवस्था में ही निकाल देना चाहिए।

बीज उत्पादन वाली फसल से खरपतवार के साथ ही कीट एवं रोग नियंत्रण पर भी ध्यान रखना चाहिए फलों की कटाई पूर्ण रूप से पकने के बाद ही करें उसे कुछ दिनों तक रखने के बाद बीजों को गूदो से अलग करके साफ पानी से धोने के बाद धूप में सुखा लेना चाहिए। इस प्रकार 3 से 4 क्विंटल बीज प्रति हेक्टेयर प्राप्त होता है

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