Sunday, 21 June 2020

बागवानी की शुरुआत कैसे करें

बागवानी की खेती 


भारतीय कृषि मे फलों का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। अधिकांश क्षेत्रों मे फलों की खेती व्यापार के लिए की जाती है। बागवानी मे वर्ष भर कुछ न कुछ कार्य चलता रहता है। जिसे कराने के लिए श्रमिकों की आवश्यकता पड़ती है। जबकि अनाज वाली फसलों मे केवल विशेष समय पर ही श्रमिकों की आवश्यकता पड़ती है। इस प्रकार बागवानी से कुछ सीमा तक बेरोजगारी की समस्या कम की जा सकती है। 


बाग लगाने के लिए भूमि का चुनाव

फलों का बाग लगने के लिए भूमि का चयन करते समय विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए । 


[1] मृदा के प्रकार -

बाग लगाने के लिए यह आवश्यक है कि जिस जगह बाग लगाना हों वहाँ की मिट्टी उत्तम किस्म की हों । अर्थात बाग लगाने के लिए बलुई,दोमट,तथा मटियार दोमट ,मिट्टी सर्वोत्तम रहती है। कंकरीली ,पथरीली भूमि का चुनाव बाग लगाने मे नहीं करना चाहिए। भूमि पर्याप्त गहरी हों। क्योंकि फल वृक्षो की जड़ें  भूमि मे  गहराई तक जाती है।  

(2) जल निकास का प्रबंध

जिस भूमि में बाग लगाना हो उस भूमि में वर्षा का पानी एकत्र नहीं होना चाहिए क्योंकि पौधे अधिक पानी अधिक समय तक भरे रहने पर मर जाते हैं नीची भूमि में फल वृक्ष नहीं पनप सकते। अगर पास में कोई नाला हो तो उसमें फालतू पानी निकास नली द्वारा निकाल कर छुटकारा पाया जा सकता है। नेहरों के पास नीचे भूमि में पानी थोड़ा थोड़ा निकलता रहता है। ऐसी भूमि का बाग लगाने के लिए चुनाव नहीं करना चाहिए।

(3) सिंचाई की सुविधा

बाग लगाने से पहले ध्यान रखना आवश्यक है की सिंचाई की ठीक व्यवस्था हो क्योंकि बाग के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है उचित तो यह रहता है की सिंचाई का अपना निजी साधन हो। पौधों को पानी देना शाम के समय उचित रहता है पौधों को आवश्यकतानुसार पानी देती रहें अन्यथा पौधे मर सकते हैं।

(4) यातायात की सुविधा

बाल लगाने का उद्देश्य फल पैदा कर धन कमाना है इसके लिए बाग सड़क के किनारे हो। माल ढोने के लिए वाहन का मिलना आवश्यक है। साथ ही वह स्थान जहां बाग लगा रहे है सड़क द्वारा किसी शहर या रेलवे स्टेशन से जुड़ा होना चाहिए जिससे कि फलों को सुविधा पूर्वक मंडियों में बिक्री के लिए पहुंचाया जा सके।



(5) मंडी की निकटता

अगर पास में ऐसी मंडी या बाजार हो जहां पर फलों को ले जाकर बेचा जा सके। अन्यथा फलों को दूर ले जाने में अतिरिक्त व्यय करना पड़ेगा और पके फलों को खराब होने का डर भी बना रहेगा। आजकल कच्चे फल तोड़कर उसमें रासायनिक पदार्थ लगाकर मंडियों को भेज दिए जाते हैं। जो स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक होते हैं।

(6) आवश्यक जलवायु

फलों का बाग लगाते समय वहां की जलवायु का ध्यान रखना आवश्यक होता है। सेव, नाशपाती, खुबानी बेरी आदि को शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में, आम केला उष्णकटिबंधीय तथा नींबू, लीची आदि को समशीतोष्ण क्षेत्रों में लगाना चाहिए।

(7) श्रमिकों की सुविधाएं

बाग लगाने में विभिन्न कार्यों के लिए श्रमिकों की आवश्यकता पड़ती है। फल लगाने, देखभाल करने, पैकिंग करने एवं बाहर भेजने में भी श्रमिकों की आवश्यकता होती है। अतः बाघ ऐसे स्थान पर लगाया जाए जहां मजदूर आसानी से मिल जाएं।

           बाग लगाने के लिए प्रारंभिक तैयारियां

भूमि चुनने के बाद वृक्षारोपण से पहले उस भूमि की कुछ प्रारंभिक तैयारियां की आवश्यकता होती है इन तैयारियों में से कुछ निम्न है

(1) भूमि को समतल करना

यह  बात याद रखनी चाहिए कि बागों में सिंचाई के प्रबंध की आवश्यकता होती है और यह तब तक संतोष पूर्ण नहीं हो सकती जब तक कि बाघ की भूमिका धरातल समतल ना हो, यदि ढाल हो तो बहुत साधारण हो ऊंची नीची भूमि को समतल करना होगा ।ढालू अथवा ऊंची नीची भूमि में सिंचाई करने में कठिनाई होती है और साथ ही वर्षा ऋतु में डालू भूमि के कटकर बहने से बहुत हानि हो सकती है।

(2) भूमि में खाद डालना

ऊंची नीची भूमि को समतल करने में भूमि के ऊपर की उपजाऊ मिट्टी नीचे गड्ढे में ढक जाती है और नीचे की कम उपजाऊ भूमि ऊपर आ जाती है। ऐसी भूमि में पेड़ लगाने से पहले उसमें खूब खाद डालना चाहिए यदि भूमि समतल रही हो और पहले से ही उसमें खेती होती आई हो तो उसमें खाद की कम आवश्यकता पड़ती है अधिक उपाधि लेने के लिए भूमि में 200 से 250 कुंतल गोबर की सड़ी हुई खाद , 100 किलो नत्रजन 60 किलोग्राम फास्फोरस 50 किलो पोटाश इन तत्वों को खाद के रूप में प्रयोग कर सकते हैं।


(3) पानी का प्रबंध करना

बाग लगाने से पहले सिंचाई का प्रबंध कर लेना बहुत आवश्यक है यदि कुआं खोदना हो तो उसे बाल लगाने से पहले खुद कर ठीक कर लेना चाहिए। अन्यथा इसके अलावा बहुत से नलकूप , समर सेविल तथा ट्यूबैलों का भी उपयोग सिंचाई के लिए किया जा सकता है। सिंचाई के लिए स्थानीय नालियां भी पहले से ही तैयार कर लेनी चाहिए कम से कम नालियों का नक्शा पहले से ही बना लेना चाहिए जिससे पौधों तक पानी आसानी से पहुंच सके।



(4) वायु रोधी पेड़ लगाना

लू अथवा ठंडी हवा उत्तर पश्चिम और दक्षिण पश्चिम से जाड़े और गर्मियों में क्रम से चला करती है इसके प्रभाव को कम करने के लिए और फलदार वृक्षों को आंधी और तूफान से बचाने के लिए इन दिशा में ऊंचे उगने वाले पेड़ किनारों के आसपास लगा देते हैं जो तेज हवा को रोकने का काम करते हैं। और आंधी के प्रचंड वेग को रोक कर पेड़ तथा फल फूलों को गिरने से बचाते हैं। यह बाग के कोमल पेड़ों को गर्म तथा ठंडी हवाओं से भी बचाते हैं इसके कारण पाला भी कम असर करता है।

(5) क्षेत्रों का विभाजन

अलग-अलग जाति के फलों के लिए क्षेत्र विभाजन में भूमि की सतह और सड़कों तथा रास्तों का पूरा पूरा ध्यान रखना चाहिए। एक ही फल की विभिन्न जातियां एक ही चक्र में लगाई जाए और उनको पकने के समय के अनुसार ही विभाजन किया जाए।

                     फलों का वर्गीकरण

फलों का वर्गीकरण निम्न आधारों पर किया गया है-

 जलवायु की आवश्यकता के आधार पर 
जलवायु के आधार पर फलों को तीन वर्गों में विभाजित किया गया है-

(1) शीतोष्ण फल-
इस वर्ग के फलों को ठंडे क्षेत्रों में उगाया जाता है जहां सर्दियों में तापक्रम जमाव बिंदु से नीचे चला जाता है। इस क्षेत्र में उगने वाले फल सर्दियों में अपनी पत्तियां गिरा देते हैं और प्रसुप्तता में चले जाते हैं; जैसे-- सेब ,आडू ,नाशपाती, बादाम, अखरोट एप्रीकॉट पिकॉन नट, चेरी, स्ट्रॉबेरी आदि।

(2) समशीतोष्ण फल
समशीतोष्ण फलों को उगाने के लिए ग्रीष्मकालीन गर्म व अपेक्षाकृत उसको होना चाहिए तथा शीतकालीन में कम सर्दी की आवश्यकता पड़ती है; जैसे---  लीची ,नींबू अमरूद, अंजीर ,संतरा, फालसा ,आमला ,बेर ,अनार, लेमन आदि फल हैं।

(3) उष्ण फल
यह वे फल है जिन्हें ग्रीष्म काल में गर्म व आर्द्र तथा शीतकाल में कम ठंडी जलवायु की आवश्यकता पड़ती है।
जैसे----  आम ,केला ,अनन्नास ,काजू, चीकू, पपीता, कटहल इत्यादि फल हैं।


फलों के प्रकार के आधार पर वर्गीकरण

• बेरी-- पपीता केला चीकू खजूर बेरी अमरूद आदि ।
• पोम-- नाशपाती सेव लोकाट आदि।
• नट----  लीची काजू राम भूटान आदि।
• आष्टीफल-- बादाम आम बेर जामुन नारियल आडू आलू चाट 
• कैप्सूल-- आमला कैरम बोला आदि।
सोरोसिस-- शहतूत अनन्नास कटहल आदि।
हेस्पेरिडीयम--  नींबू वर्ग के फल।




                       वृक्षारोपण

बाग में पेड़ लगाने का कार्य बहुत ही महत्वपूर्ण है। पेड़ लगाने का काम बड़ी सावधानी से किया जाना चाहिए क्योंकि इसमें पेड़ लगाने में किसी भी प्रकार की कमियां उस समय तक भोगनी पड़ती है जब तक बाग  रहता है। उद्यान में वृक्ष लगाने का अच्छा ढंग वही कहा जाएगा जिसमें प्रत्येक फल वृक्ष को वृद्धि के लिए पर्याप्त स्थान मिल सके। फल वृक्ष देखने में सुंदर लगे और वृक्षों को सीधी रेखा में लगाया जाए।
और अधिक जानकारी के लिए सदैव अपने क्षेत्र के राजकीय बागवानी निरीक्षक की सहायता लेनी चाहिए।

पेड़ लगाने का समय--

बे पौधे जो सदैव हरे-भरे बने रहते हैं वर्षा ऋतु मैं लगते हैं पढ़ पाती या पतझड़ जिन पेड़ों में वर्ष में एक बार पतझड़ होता है उन्हें दिसंबर से फरवरी तक लगाते हैं पेड़ हमेशा सुबह या शाम के समय लगाएं।


पेड़ लगाने की विधियां---

पौधे लगाने का नक्शा बनाते समय यह ध्यान रखें कि पौधों को वृद्धि के लिए पर्याप्त स्थान मिले, अधिक पौधे भूमि में लग जाएं तथा बाग में एक से अधिक फलों के पेड़ लगाने हैं तो प्रत्येक किस्म के पौधे को अलग-अलग क्षेत्र में लगाएं। एक साथ पकने वाले फल एक स्थान पर लगाने चाहिए जिससे देखभाल तथा तोड़ने में सुविधा हो ।

(1) वर्गाकार विधि--  यह सरल विधि है इसमें पौधे सीधी पंक्तियों में लगाए जाते हैं वृक्ष से वृक्ष एवं पंक्ति से पंक्ति की दूरी समान होती है इस विधि से लगाए बाग में सिंचाई एवं कृष्ण क्रिया में सुविधा रहती है।
इस विधि में कुछ लोग पेड़ लगाते समय पंक्तियों की अपेक्षा पंक्तियों में पौधों की आपस की दूरी कम कर देते हैं। ऐसा करने से पौधे वर्गाकार रूप में ना रहकर समकोण त्रिभुज के रूप में दिखाई देते हैं इस प्रकार करने से प्रति हेक्टेयर पेड़ों की संख्या बढ़ जाती है।

(2) आयताकार विधि---  यह विधि वर्गाकार विधि से समान ही है। अंतर बस इतना है कि पंक्ति से पक्षी की दूरी वृक्ष से वृक्ष की दूरी से अधिक रहती है जिसके कारण वर्गाकार विधि की अपेक्षा इसमें पौधे कुछ कम लगते हैं। चार पौधों को मिलाकर देखने से आयत के समान आकृति दिखाई देती है। इसमें पौधो को फैलने तथा वृद्धि के लिए पर्याप्त स्थान मिल जाता है।

(3) त्रिभुजाकार विधि---- इस विधि में पौधे वर्गाकार के समान ही लगाए जाते हैं अंतर इतना है कि पौधों की दूसरी पंक्ति में पौधों को पहली पंक्ति के सामने ना लगा कर उनके बीच में लगाते हैं। दो पंक्तियों के 3 पौधे एक त्रिभुज का निर्माण करते हैं। इस पद्धति से आयताकार विधि की अपेक्षा कुछ पौधे अधिक लग जाते हैं ।

(4) पंच कोण विधि----- वर्गाकार विधि के समान ही यह विधि है अंतर यह है कि वर्ग के बीचो बीच एक पौधा और लगा दिया जाता है। यह पौधा स्थाई ना होकर अस्थाई होता है जिसे बीच से निकाल दिया जाता है इसलिए इस विधि को पूरक विधि भी कहते हैं।

(5) कंटूर विधि----- यह विधि पहाड़ी असमतल, ढाल अथवा टेढ़ी-मेढ़ी भूमि पर अपनाई जाती है। खेत के ढाल को देखकर मैंड बनाते हैं। गड्ढों को खोदते समय यह ध्यान रखते हैं कि गड्ढा खोदते समय मिट्टी गड्ढे के ऊपरी सतह की ओर लगानी चाहिए। अन्यथा वर्षा होने पर मिट्टी नीचे की ओर कट कर बह जाती है। इसमें पौधों को सही रेखाओं पर ना लगा कर कंटूर( मेंड) बनाकर वहां गड्ढे खोदकर लगा देते हैं।
पेड़ लगाने में इन विभिन्न विधियों में से किसी एक विधि से पेड़ लगाए जाते हैं।



पौधों का पालन पोषण तथा रक्षा

खेत में पौधे रोपने के बाद उनकी उचित देख-रेख करनी चाहिए। उचित देखरेख ना होने पर काफी पौधे मर जाते हैं इसलिए बाग लगाने वालों को काफी हानि होती है। पौधे लगाने के बाद उनकी देखरेख कई वर्षों तक करना बहुत ही आवश्यक है।
इस संबंध में निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए--

(1) निकाई गुड़ाई-- 
थालो के चारों तरफ वर्ष में दो से तीन बार निराई गुड़ाई करनी चाहिए। निराई गुड़ाई करके खरपतवार हटाते रहना चाहिए। जिससे पौधों में सिंचाई करने में आसानी होती है और वायु का संचार भी बढ़ता है।

(2) खाद देना--
सिंचाई व निराई गुड़ाई के साथ-साथ पौधों को 1 वर्ष में खाद देना भी आवश्यक होता है। गोवर की साड़ी खाद के अतिरिक्त रासायनिक उर्वरक भी दिए जाते हैं फरवरी-मार्च में खाद देना बहुत लाभकारी होता है प्रति पौधा 10 किलोग्राम गोबर की खाद सौ ग्राम डीएपी 50 ग्राम यूरिया सौ ग्राम म्यूरेट आफ पोटाश, तथा दिमाग से बचाने के लिए 10% एल्डरिन 25 से 50 ग्राम  भूमि में देते हैं। यह खाद तने से थोड़ी दूर दी जाती है।

(3) सिंचाई---- एक माह तक यदि वर्षा ना हो तो पौधे रोपने के बाद प्रति सप्ताह सिंचाई करते हैं 1 वर्ष तक सिंचाई प्रति सप्ताह ही करते हैं। 1 वर्ष के बाद गर्मियों में 10 से 15 दिन के अंतर पर तथा सर्दियों में 20 से 25 दिन के अंतर पर सिंचाई करते रहें।

(4) कटाई छटाई---- पौधों को सही आकार इच्छा अनुसार देने के लिए भूमि से लगभग 7 से मी ऊंचाई तक तने को छोड़कर सभी शाखाएं काट देनी चाहिए। इसके बाद 30 से 35 सेमी की दूरी पर दो या तीन शाखा ही छोड़ते हैं। रोगी तथा कमजोर शाखाओं को काट देना चाहिए। आडू सेव नाशपाती तथा अंगूर में प्रारंभ से ही छटाई करते हैं। जिन पौधों में कलम लगी हो उससे नीचे शाखा नहीं छोड़नी चाहिए। पतझड़ वाली पौधों में नवंबर महीने में छटाई का कार्य करते हैं।




(5) कीट एवं बीमारियों से सुरक्षा

पौधे छोटी अवस्था में ही कभी-कभी बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। उन पर ब्लाइटॉक्स या कॉपर ऑक्सिक्लोराइड का 0.2 प्रतिशत का घोल छिड़कते हैं। नींबू में सिट्रस कैंकर रोग के लिए भी इसी का प्रयोग करें। दीमक से बचाने के लिए नीम की खली या एल्ड्रिन का प्रयोग करें।

(6) पाले व लू से बचाएं--- पाले व तेज धूप से पौधों का बचाव करना अति आवश्यक है। तेज धूप से छोटे पौधे झुलस जाते हैं इसके लिए पौधों को पाले व लू से बचाव के लिए तीन तरफ से लकड़ी की छायादार झोपड़ी से ढक देते हैं। कुछ स्थान पर जैसे नदियों के किनारे या अन्य स्थानों पर लोग मुझे आकाश के आवरण पौधों के ऊपर बना देते हैं। पाले से बचाव के लिए सिंचाई भी की जा सकती है।


(7) अन्तः सस्य उत्पादन---

नहीं लगाए गए बागों में फल आने तक फसलों का उत्पादन भी कर सकते हैं। कम बढ़ने वाली फसलें जैसे---
बरसीम, आलू, गेहूं जो मटर मसूर मूंग तथा फूलगोभी आदि फसलें उगा कर कुछ उत्पादन लिया जा सकता है।

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