Thursday, 18 June 2020

अमरूद की खेती



अमरुद बहुत ही सामान्य फल है जो भारत में लगभग प्रत्येक स्थान पर पैदा किया जाता है इसका पौधा अधिक सहिष्णु स्वभाव का होता है कम देखरेख में इसकी खेती की जा सकती है इसका फल मीठा मधुर सुगंध एवं स्वाद वाला होता है। विटामिन सी का यह एक अच्छा स्रोत है अमरूद को गरीबों का सेब कहा जाता है।



अमरूद के लिए उपयुक्त जलवायु------अमरूद उष्ण और उपोष्ण  जलवायु का पौधा है। अमरूद का पेड़ प्रतिकूल परिस्थितियों के प्रति काफी सहिष्णु है इसे भूमि व जलवायु की विभिन्न दशाओं में सुगमता से उगाया जा सकता है शुष्क तथा पाले से रहित जलवायु इसकी खेती के लिए उपयुक्त है।

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अमरूद की खेती के लिए उपयुक्त भूमि-----अमरुद सभी प्रकार की भूमियों में उगाया जा सकता है इसकी बागवानी हल्की भूमि से लेकर भारी भूमि जिसमें उचित जल निकास की व्यवस्था हो तथा अम्लीय भूमि से लेकर क्षारीय भूमि में भी इसकी खेती की जा सकती है मृदा की क्षारीयता बढ़ने के साथ-साथ उकठा रोग लगने की संभावना बढ़ती जाती है।



अमरूद की उन्नत सील किस्में-----

चित्तीदार अमरुद----यह इलाहाबादी सफेदा से मिलती-जुलती होती है लेकिन इसके ऊपर लाल चित्तियाॅ पाई जाती हैं तथा गुदा सफेद रंग का होता है।


इलाहाबादी सफेदा-----यह उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक क्षेत्रों में उगाई जाने वाली प्रसिद्ध किस्म है। इसकी पैदावार 450 से 600 फल प्रतिपदा है यह किस्म बागवानी के लिए उत्तम है इस किस्म की भंडारण क्षमता अच्छी होती है।


सरदार (लखनऊ-49)----इस जाति के पौधे गुआवा बिल्ट के लिए सहिष्णु होते हैं। व्यवसायिक दृष्टि से यह जाति उत्तम प्रमाणित हो रही है इसके पौधे छोटे होते हैं यह जाति इलाहाबादी सफेदा के बीजू पौधों से चयन करके निकाली गई है । यह किस्म तना कैंकर व म्लानि रोगों के प्रति सहनशील है।


सेब नुमा अमरूद( एप्पल कलर ग्वावा)----- इस अमरूद का रंग सिंदूरी खुरदुरा गूदा पीलापन लिए सफेद मीठा और हल्की सुगंध वाला होता है जिसकी औसत पैदावार 150 से 200 फल प्रति पौधा होती है इसका रंग केवल जाड़ों की फसल पर ही आता है।




थाईलैंड अमरूद -

 यह अमरूद की नई किस्म है।इसके फल साइज़ में बड़े और स्वाद में काफी अच्छे होते है। बाजार में आजकल थाई अमरूद की अच्छी डिमांड है।इसके पौधे काफी तेजी से विकसित होते हैं पौधे लगाने के दो से तीन साल में ही अच्छा उत्पादन होने लगता है। आजकल सभी अच्छी नर्सरी पर थाई अमरूद के पौधे आसानी से मिल जाते है।


अमरूद में प्रवर्धन की व्यवसायिक विधि

(1) बीज द्वारा---अमरुद के अच्छे स्वास्थ्य मीठे और पेड़ पर पके फलों को तोड़कर गूदे से बीज निकालकर साफ करके पहले सुखाया जाता है। बीज को तेज धूप में नहीं सूख आना चाहिए अधिक पुराने बीजों में अंकुरण क्षमता कम होती है। डीजे को नर्सरी में 2.5 सेमी दूरी पर और 2.5 सेमी गहराई पर बोलते हैं बोते समय भूमि में उचित नमी होनी चाहिए। बीज बोने के बाद बीजों को मिट्टी से ढक देना चाहिए जिससे बीजों के ऊपर कठोर परत नहीं बन पाती है। बौद्ध बिग्लन कवक का फैलाब भी कम हो जाता है। नर्सरी को पौध बिग्लन से बचाने के लिए भूमि तथा बीज को 0.3% थायराम से उपचारित करते हैं 4 से 6 सप्ताह में अंकुरण हो जाता है। जब पौधे 60 सेमी ऊंचे हो जाएं तो उन्हें दूसरी जगह खोदकर लगा देना चाहिए। इन पौधों को कलम बांधने के लिए भी प्रयोग किया जाता है।


(2) अमरूद की स्टूलिंग विधि-----अमरूद कोशी के प्रसारित करने का यह तरीका भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली से निकाला गया है इस विधि में गूटी द्वारा तैयार किए गए पौधों को स्टूल बैंड में लगाया जाता है। यह पौधे पत्रक पौधे का काम करते हैं इन पौधों को क्यारी में 2 से 3 वर्ष तक बढ़ने दिया जाता है फिर मार्च के माह में जमीन से थोड़ा ऊपर से इनके शीर्ष भाग काट दे। इस कटे हुए भाग के नीचे से कई शाखाएं निकलती हैं जुलाई में नई निकली शाखाओं में 2 सेमी चौड़ा छल्ला बनाकर मिट्टी में दबा देते हैं। दबे भाग से जड़े सितंबर के महीने में निकल कर आती है। इन पौधों को अलग करके उचित स्थान पर लगा देना चाहिए।




अमरूद की रोपण विधि- तथा समय

अमरुद के पौधे लगाने का मुख्य समय जुलाई से अगस्त तक है जिस स्थान पर सिंचाई की सुविधाएं हो वहां पर पौधे मार्च में भी लगाए जा सकते हैं। जिन क्षेत्रों में बरसात अधिक होती है वहां रोपण कार्य वरसात के अंत में करते हैं बाघ को लगाने के लिए खेत को जोत कर समतल कर लेना चाहिए ।

अमरूद में खाद तथा उर्वरक डालना

अमरूद की खेती के लिए खाद तथा उर्वरक डालना बहुत आवश्यक है इसके लिए सड़ी गोबर की खाद 20 से 25 किलोग्राम 250 किलोग्राम सुपर फास्फेट तथा 40 से 50 ग्राम फालीडाल धूल ऊपरी मिट्टी में मिला कर गड्ढे को अच्छी तरह से भर देते हैं इसके पश्चात खेत की सिंचाई कर देते हैं जिससे गड्ढे की मिट्टी बैठ जाए इस प्रकार गड्ढा पौधा लगाने के लिए तैयार हो जाता है
नाइट्रोजन की मात्रा में आधी-आधी दो बार नवंबर तथा जून जुलाई के महीनों में तथा फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा एक बार विशेष रूप से नवंबर में देना अच्छा रहता है।


अमरूद की सिंचाई----अमरूद के छोटे पौधों में सिंचाई शरद ऋतु में 15 से 20 दिन के अंतर पर तथा गर्मियों में 8 से 10 दिन के अंतर पर करते रहना चाहिए। इसके अतिरिक्त आवश्यकता अनुसार समय-समय पर सिंचाई करते रहें नहीं तो पौधे सूख जाएंगे और नष्ट हो जाएंगे।



अमरूद के पेड़ पर फूल आना तथा फल लगना----

उत्तरी भारत में अमरूद के पेड़ पर वर्ष में दो बार फूल आता है-
(1) फरवरी-मार्च में फूल आने को अंबे बहार कहते हैं । इसके फल जुलाई से अक्टूबर तक मिलते हैं इनमें कीड़ों व बीमारियों का प्रकोप अधिक रहता है।

(2) दूसरी बार फूल जून और जुलाई में आता है। इसे मृग बहार कहते हैं। इनसे  नवंबर से मार्च तक फल मिलता है।

मानसून के फल घटिया तथा फल कम मीठे होते हैं। इन फलों में रोग तथा कीड़ों का प्रकोप अधिक रहता है। दोनों मौसम में फूलने पर कोई भी फसल अच्छी नहीं होती इस बात को देखते हुए मानसून फसल को नष्ट करके जाड़े की फसल लेते हैं। इसे रोकने के लिए अप्रैल-मई महीनों में पेड़ को पानी नहीं देते हैं जिससे पौधों की पत्तियां पानी की कमी के कारण झड़ जाती हैं तथा जो फूल आएंगे वह भी शीघ्र झड़ जाएंगे। भूलने की समय 100 मिलीग्राम नेप्थलीन एसिटिक अम्ल को प्रति लीटर पानी में घोलकर 20 दिन के अंतर पर दो बार छिड़कने से फूल गिर जाते हैं इस प्रकार अंबे बाहर की फसल नष्ट हो जाती है जून में आवश्यक खाद व पानी देने से पर्याप्त मात्रा में फूल निकलते हैं जिससे जाड़े की अच्छी फसल मिल जाती है।

अमरूद के फलों को तोड़ना---अमरूद का फल पुष्प के लगभग 4 या 5 महीने में पक कर तैयार हो जाता है। यह समय किस्म विशेष व तापमान पर निर्भर करता है। लाल गूदा वाला अमरूद सबसे जल्दी इसके बाद सरदार और सबसे देर में इलाहाबादी सफेदा व चित्तीदार तैयार होते हैं। अमरूद के फल पेड़ पर पकाए जाते हैं। फलों का रंग जब कुछ बदलने लगता है तथा मुलायम पड़ने लगते हैं  तो इनको पेड़ों से सावधानीपूर्वक तोड़ लेना चाहिए। 3 से 4 वर्ष में पेड़ पर फल आने लगते हैं 12 से 18 वर्ष की आयु तक अच्छे फल मिलते रहते हैं।



अमरूद पर लगने वाले रोग तथा कीट

फल मक्खी--यह मक्खी बरसात के फलों को विशेष हानि पहुंचाती है यह फल की अंदर अंडे देती है जिनसे मेगट पैदा होकर गूदे को हानि पहुंचाते हैं यह फल इनसे से प्रभावित होकर गिरने लगते हैं।
रोकथाम--रोगी पलों को तोड़कर नष्ट कर दें । रासायनिक पदार्थ का छिड़काव करना चाहिए।

स्केल कीट----इस कीट का प्रकोप गर्मियों में अधिक होता है यह किट कोमल पत्तियां तथा मुलायम भागो से रस चूसते है। जिससे प्रभावित भाग  सूख  जाता है। यह कीट एक प्रकार का  मधुस्त्राव भी छोड़ता है जिस पर बाद मे शैवाल उग जाती है। इससे पुष्प एवं फल कम लगते हैं।
रोकथाम---घनी व प्रभाव डालियों को छांट देना चाहिए। 1 .5ml साइपर मेथिल25 ईसी एक लीटर पानी में घोलकर 15 दिन के अंतर पर छिड़कना चाहिए।


फल चित्ति  रोग-----यह रोग सेफैल्यूरोज विरिसेन्स नामक शैवाल  द्वारा होता है इस रोग की रक्षण सर्वप्रथम पतियों पर बादामी से गुलाबी लाल धब्बो के रूप में दिखाई पढ़ते हैं। इस रोग के बढ़ने के साथ साथ धब्बो का आकार व संख्या भी बढ जाती है।
रोकथाम----'रोकथाम के लिए 0.3 % फाइटोलान-50 घोल के 10 दिन के अंतराल पर 3 से 4 छिड़काव करने चाहिए।

पौधे अंग मारी रोग-----यह रोग राइजोक्टोनिया नामक  कवक द्वारा फैलता है नर्सरी के प्रारंभ के कुछ महीनों में इस रोग का प्रकोप  होता है सबसे पहले पत्तियो  पर छोटे गोल धब्बे बनते हैं नम वातावरण में धब्बे पूरी पत्ती पर फैल जाते हैं। इस प्रकार पत्तियां मुरझा कर गिर जाती हैं इस रोग का प्रकोप अधिक होने पर तनाव भी प्रभावित हो जाता है ।
रोकथाम-----
इसकी रोकथाम के लिए 0.3% बलाई टॉक्स-50का 10 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।

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