Sunday, 21 June 2020

केला की खेती


केला की खेती
केला एक  बहुत प्राचीनतम पौधा है। जो प्राचीनकाल समय से ही भारतवर्ष मे उगाया जा रहा है। इसमे खनिज पदार्थ तथा विटामिन प्रचुर मात्रा मे पाये जाते है। हमारे देश मे हिंदुओं के सभी धार्मिक  तथा शुभ कार्यों मे केले को प्रमुख स्थान मिल है। कोई भी धार्मिक उत्सव या शादी विवाह ऐसा नहीं है जिसमे केले के पौधे अथवा पत्तों का प्रयोग न किया जाता हो।  केले के फलों का प्रयोग फल की तरह खाने मे,सब्जी के रूप मे,आटा,चॉकलेट ,फिग,चिप्स इत्यादि के रूप मे किया जाता है।
केले के लिए जलवायु 



केला उष्ण जलवायु का पौधा है। जो भू मध्य रेखा के दोनों तरफ गर्म तथा ठंडी जलवायु के क्षेत्रों मे अधिक मात्रा मे पैदा किया जाता है। जहां पर वर्ष अधिक होती है। यह मध्य तथा उत्तरी भारत मे ऐसे क्षेत्रों मे पैदा किया जाता है जहां पर गर्मियों मे गर्म व तेज हवाये चलती है। तथा जाड़ों मे पाला पड़ता है। 175 से 200 सेमी वर्षा वाले क्षेत्र इसके लिए उपयुक्त होते है। इसकी उचित वृद्धि व विकास के लिए औसत 25-27 सेन्टीग्रेट तापक्रम तथा 77 प्रतिशत आपेक्षिक आर्द्रता की आवश्यकता होती है। भारतवर्ष मे केले के लिए उत्तम जलवायु केरल,तमिलनाडू ,महाराष्ट्र तथा बंगाल मे उपलब्ध है। 


केले के लिए  मिट्टी 
केले की खेती सभी प्रकार की मिट्टी मे की जा सकती है। इसके लिए उर्वर,गहरी,बलुई तथा दोमट मिट्टी सर्वोत्तम होती है। नदियों के किनारे की भारी व जलोढ़  मिट्टी मे भी केले को सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। इसे हम अपने घर पर गमलों मे भी लगा सकते है।
केले की किस्म ---- उपयोग के आधार पर केले की जातियों को निम्नलिखित पाँच भागों मे विभाजित किया गया है--
[1] पकी हुई ताजी खाई जाने वाली ---अल्पना,हरीछाल,रथाली,रजेली,सफ़ेदबेलची,चम्पा,पुवन, अमृतसागर ,बसराई,मर्तमान,आदि।
[2] सब्जी के रूप मे खाई जाने वाली ------ हजारा मंथन,पचमोभ, माइण्डोली मंथन नेंद्रन चिनिया, अमृत भान काबुली, कोलंबो ,मुथेली ,मुंबई मुठिया, केपियर गंज आदि।
(3) चिप्स में प्रयुक्त किस्में।
(4) जैम बनाने के लिए किस्में।
(5) पाउडर बनाने में प्रयुक्त किस्मे।
केले की प्रमुख जातियों के गुण
●    पुवन----
इसे लालबेल्ची, चंपा ,चीनी चंपा आदि भी कहते हैं यह दक्षिण भारत, पश्चिम बंगाल तथा आसाम में उगाई जाती है। इसके पौधे लंबे होते हैं फल पतला तथा फल का छिलका पतला पीले रंग का होता है। फलों मैं अविकसित बीज भी पाए जाते हैं इसके फल गुच्छे में 200 से 220 फल आते हैं। यह पर्ण- चित्ती रोग के लिए प्रतिरोधी तथा टिकाऊ किस्मे है। यह दक्षिण भारत की सबसे लोकप्रिय किस्म है।
● रॉबस्टा--- इसके पौधे मध्यम ऊंचाई के होते हैं। इसकी खेती मुख्य रूप से महाराष्ट्र ,आंध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु में की जाती है। इसके पहले लंबे, गुच्छे सघन तथा गोदा मुलायम क्रीम रंग का होता है। यह  पर्ण चित्ती रोग से अधिक तथा पनामा रोग से कम ग्रसित होता है।
मंथन----- इसे बंकेश, कसादिया, कनचर केला आदि भी कहते हैं। इसकी खेती सब्जी के लिए केरल मदुरई तंजौर कोयंबटूर सूरत तथा बड़ौदा में की जाती है। इसके पौधे लंबे होते हैं। प्रतिफल गुच्छे इसमें 100 से 110 फल लगते हैं। इस की भंडारण क्षमता अधिक होती है।
हरी छाल------ ऐसे ही मुंबई ,मालभोग ,बनान व राजपुरी भी कहते हैं। इसकी खेती मुंबई तथा आंध्र प्रदेश के क्षेत्रों में की जाती है। इसके फल लंबे, सीधे तथा गहरे रंग के होते हैं। यह किस्म पर्ण चिट्टी रोग से अधिक ग्रसित होती है।
अल्पान----- इसका पौधा 3 से 4 मीटर तथा सफेद हरा, भारी लंबा कसा हुआ, फलियां मध्यम पकने पर पीली स्वादिष्ट खटास लिए हुए मीठी तथा टिकाऊ होती हैं।
नेंद्रन--- इसे बाना नेंद्रन, ऑटू नेंद्रन, राजेली आदि नामों से जाना जाता है। इसके पौधे लंबे ,फल बड़े व मोटे होते हैं। यह किस्म मालाबार कर्नाटक तथा कोचिन में अधिक होती है।


प्रवर्धन या प्रसारण----- केले का प्रसारण अधो भुस्तारी द्वारा वानस्पतिक तरीके से किया जाता है आधो- भूस्तारी  दो तरह के पाए जाते हैं-
(1) नुकीली वा पतली पत्तियों वाले----- यह अधो-भूस्तारी पतली नुकीली पत्तियों वाले तलवार की तरह होते हैं। देखने में कमजोर मालूम होते हैं लेकिन इनके आंतरिक रूप से यह अधिक ताकतवर होते हैं। प्रसारण के लिए इनका ही प्रयोग किया जाता है।
(2) चौड़ी पत्तियों वाले------- यह अधो- भूस्तारी चौड़ी पत्तियों वाले होते हैं। देखने में यह अधिक मजबूत एवं ताकतवर दिखाई देते हैं लेकिन ये आंतरिक रूप से कमजोर होते हैं। यह अधो भुस्तारी प्रसारण के लिए प्रयोग नहीं करने चाहिए।
रोपण---
पश्चिमी तथा उत्तरी भारत में केला लगाने का सबसे अच्छा समय जून-जुलाई है। दक्षिणी भारत केरल मालाबार मैं सितंबर से अक्टूबर तक तथा कर्नाटक और आंध्र प्रदेश तथा उड़ीसा में केला लगाने का सबसे उपयुक्त समय जून है।
रोपड़ का कार्य दो विधियों द्वारा किया जा सकता है-
(1) नालियों में रोपाई---- खेत की अच्छी तरह तैयारी करें 50 सेमी चौड़ी तथा 50 सेमी गहरी और 3 मीटर की दूरी पर नालियां बनाई जाती हैं। इन नालियों में किस्म के अनुसार एक या 2 मीटर की दूरी पर केले की रोपाई की जाती है।
(2) गड्ढों में रोपाई----- गड्ढों को 2 से 3 मीटर की दूरी पर पंक्तियां बनाकर 45×45×45 सेमी आकार के गड्ढे खोद लिए जाते हैं। इसमें ढाई सौ से 300 कुंतल प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर की खाद का भराव कर दिया जाता है प्रति गड्ढे 10 किलोग्राम गोबर की खाद तथा 100 ग्राम नाइट्रोजन, 80 ग्राम फास्फोरस, तथा 100 ग्राम पोटाश का भराव उपयुक्त होता है।
इन्हीं गड्ढों में केलो की रोपाई की जाती है।
खाद तथा तथा उर्वरक----
भूमि की उर्वरता के अनुसार प्रति पौधा 18 से 20 किलोग्राम गोबर की साड़ी खाद, 300 ग्राम नाइट्रोजन, 100 ग्राम फास्फोरस तथा 300 ग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है। गोवर की साड़ी खाद गड्ढे को भरते समय प्रयोग करें। फास्फोरस की आधी मात्रा रोपाई के समय सतह से आधी मात्रा रोपाई के बाद देनी चाहिए। नत्रजन की पूरी मात्रा पांच भागों में विभाजित कर अगस्त, सितंबर ,अक्टूबर ,फरवरी तथा अप्रैल महीने में देनी चाहिए। और पोटाश को तीन भागों में विभाजित कर सितंबर ,अक्टूबर तथा अप्रैल महीने में देनी चाहिए।
सिंचाई---- रोपाई के तुरंत बाद एक सिंचाई अवश्य कर देनी चाहिए, इसके बाद वर्षा ऋतु में वर्षा ना होने पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहें। जाड़ों में आवश्यकतानुसार 15 से 20 दिन के अंतर पर तथा ग्रीष्म ऋतु में हर 7 से 8 दिन के अंतर पर सिंचाई करते रहना चाहिए।
निकाई गुड़ाई व देखभाल---
केले के प्रारंभिक अवस्था में आवश्यकतानुसार निराई गुड़ाई कर खरपतवार को खेत से निकाल देना चाहिए। वर्षा  समाप्त होने के बाद पौधों पर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए जब तक पौधों में फूल बनाना प्रारंभ ना हो जाए तब तक पुतियों को नहीं बढ़ने देना चाहिए। कभी-कभी यह पौधे गिर भी जाते हैं। इन्हें गिरने से बचाने के लिए बांस या लकड़ी के सहारे का प्रयोग आवश्यक होता है ।
अंतरासस्य-----
पौधों को लगाने के पश्चात उद्यान में सनई को हरी खाद के रूप में बोया जा सकता है। ऐसा करने से भूमि कटाव से सुरक्षित रहती है एवं उसको जमीन में जोत कर खाद्य नत्रजन की मात्रा को भी बढ़ाया जा सकता है।
केले के पौधे की निचली पत्तियां आधी सूख जाती हैं जो सूर्य की रोशनी से इनकी रक्षा करती हैं। पत्तियों के  सूख जाने पर इसे तेज चाकू से काटा जा सकता है।


बहु वर्षीय फसल की वृद्धि के नियमानुसार करना----
फल वृक्ष को बहु वर्षीय बनाने के लिए जब पौधे पर फल आने लगे उस समय केवल एक स्वस्थ अधो-भूस्तारी को आगे वृद्धि के लिए छोड़ देना चाहिए। शेष अधो-भूस्तारी को तेज चाकू से काटकर अलग कर दें जब पैतृक वृक्ष के फल पक जावे उस समय दूसरे अधो-भूस्तारी के आगे वृद्धि करने देना चाहिए।
पैतृक वृक्ष के फल तोड़ने के बाद, काट देना चाहिए। उस समय पहला अधोभूस्तारी जो 5 से 6 महीने का होता है। पैतृक वृक्ष का स्थान ले लेता है। इस प्रकार से 6-6 महीने बाद एक-एक अधोभूस्तारी की वृद्धि करके इसकी बहु वर्षीय फसल को नियमानुसार किया जा सकता है।
मिट्टी चढ़ाना अथवा सहारा देना
बागवानी की निकाई कुड़ाई के बाद पौधों के चारों ओर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए जिससे पानी पौधों के तने से सीधे संपर्क में नहीं आते तथा पौधे को सहारा भी मिल जाता है। केले के फलों का गुच्छा भारी होने के कारण पौधे नीचे को झुक जाते हैं उन्हें सहारा ना देने पर गिर भी जाते हैं। पौधों को सहारा देने के लिए दो बांसों को आपस में बांधकर कैंची की तरह बना लेते हैं तथा फलों के गुच्छे में लगाकर सहारा देते हैं।
फूल और फल लगना----
केले के पौधे पर फूल एवं फल अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न भिन्न समय पर लगते हैं। दक्षिण तथा पश्चिम भारत में केले की अगेती किस्में रोपाई के लगभग 7 महीने बाद फूलने लगती हैं। केला फूलने के अगले 7 महीने के अंदर फलियां पक कर तैयार हो जाती हैं। इस प्रकार के लोगों की रोपाई के लगभग 14 महीने पश्चात फल उपलब्ध हो जाते हैं और दूसरी फसल 20 से 25 महीने के बीच तैयार हो जाती है। पौधे से फल के घेर को अलग कर लेने के बाद पौधे को भूमि की सतत से काट दिया जाता है। क्योंकि केले के पेड़ पर पूरे जीवन काल में सिर्फ एक बार फल लगते हैं। तने को एक बार में ना काट कर उसे दो या तीन बार में काटना चाहिए जिससे पुत्ती पर हानिकारक प्रभाव ना हो। ठेले पर लगने वाले पुष्प का रंग लाल होता है। स्कूल में नर और मादा दोनों ही पाए जाते हैं। किंतु इसमें निषेचन की क्रिया नहीं हो पाती जिससे फल में बीज नहीं बनता है।
कटाई----- जब फल पूर्णत  परिपक्व हो जाए  तो उसको हरी दशा में ही फलों के गुच्छे को तेज चाकू से काट लेना चाहिए। और बाजार में बिक्री के लिए भेज दिया जाता है।
फलों को पकाने----
                          केले को पकाने के लिए धार को किसी बंद कमरे में रखकर केले की पत्तियों से ढक देते हैं। एक कोने में उपले तथा अंगीठी जलाकर कमरे को गीली मिट्टी से सील कर देते हैं। रघुवर 48 से 72 घंटे में केला पक कर खाने योग्य हो जाता है। इस तरह केला पकाने से चित्तियां पड़ जाती हैं तथा उनमे मिठास अधिक हो जाती है। केले के ढेर पर 500 पीपीएम एथिल का छिड़काव करके ढेर को बोरे से ढक देने से केला अच्छी तरह पक जाता है।
उपाज------ केले की उपज जलवायु तथा जातियों पर अधिकतर निर्भर करती है। केले का औसत उत्पादन 300 से 400 कुंतल प्रति हेक्टेयर हो जाता है।
केले में लगने वाले कीट
तना छेदक---- इस कीट के ग्रब्स पौधे के तने में छेद करते हैं जिसके कारण सड़न पैदा हो जाती है।
इसके नियंत्रण के लिए फोरेट   या थीमेट 10 जी दानेदार कीटनाशी को प्रतिपदा 25 ग्राम प्रयोग करना चाहिए।
केले पर पत्ती बिटल----- यह कीट केले की पत्तियों को खाकर नुकसान पहुंचाते हैं। इसके नियंत्रण के लिए मिथाइल लो डीमेटऑन 25 ई० सी० को 1 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।
फल छेदक कीट-----  इस कीट के कैटरपिलर फल में नीचे की तरफ से छेद करके अंदर सुरंग बना देते हैं जिसके कारण फली सड़ जाती है। इस कीट के नियंत्रण के लिए 0.25%  सुमिसीडीन का छिड़काव करना चाहिए।
मूल छेदक सूत्रकृमि----ये सूक्ष्मजीव पतले धागे के समान होते हैं जो केले की जड़ों पर आक्रमण करते हैं और उन पर कांटे बना देते हैं जिससे पौधे की वृद्धि व विकास रुक जाता है।
रोकथाम---- पौधे के चारों तरफ गुड़ाई करके नीम की खली मिला दें या नेमागान का छिड़काव करें। उचित फसल चक्र अपनाएं।
केले में लगने वाले रोग तथा नियंत्रण
पनामा रोग--- यह केले का सबसे हानिकारक रोग है जो फ्यूजेरियम ऑक्सीपोरम स्पेक्ट्रम कुबेन्स नामक फफूंद के कारण होता है। इस रोग से प्रभावित पौधे में सर्वप्रथम नीचे की पुरानी पत्तियों पर हल्की पीली धारियां बनती है और वे टूट कर लटक जाती हैं। ऊपर की नई पत्तियों को छोड़कर सभी पत्तियां गिर जाती हैं। नई पत्तियों की सतह दागदार पीली तथा सिकुड़न दार होती है।
रोकथाम  (1)- रोग से प्रभावित पौधे को जड़ से उखाड़ कर नष्ट कर दें
(2)- नाइट्रोजन का उपयोग कम कर दें।
(3)- जिस खेत में यह रोक लगा हो उसमें 3 से 5 वर्ष तक केले की फसल ना करें।
(4)- बाविस्टिन  के 0.2 %  घोल को मिट्टी में मिलाना चाहिए।
(5)- खेत में पानी भर देने से इसका प्रभाव कम हो जाता है।
गुच्छा शीर्ष रोग ( बन्ची टॉप)--
        भारत में उन सभी क्षेत्रों में जहां पर केले की बागवानी की जाती है वहां पर इस रोग का प्रकोप देखा गया है ।यह वायरस से होने वाला एक भयानक रोग है। इस रोग से प्रभावित पौधे की पत्तियां छोटी एवं संकरी हो जाती है तथा उनके किनारे ऊपर की ओर मुड़ जाते हैं, पत्तियां छोटे डंठलो वाली हो जाती है एवं पौधे का ऊपरी सिरा एक गुच्छे में परिवर्तित हो जाता है। कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि यह रोग माइक्रो प्लाज्मा के द्वारा होता है।
रोकथाम-(1) रोग ग्रस्त पौधों को उखाड़ कर जला दें या मिट्टी में दबा दें।
(2) महू के कीट नियंत्रण के लिए मेलाथियान 50 ई सी के 0.1% घोल का छिड़काव करना चाहिए।
फल बिगलन या झुलसा रोग---
यह रोग एक फफूंदी द्वारा उत्पन्न होता है जिसे ग्यीयोस्पोरियम फ्यूजेरम कहते हैं। यह फफूंद नम मौसम मे मुख्य रूप से बरसात में काफी सक्रिय होता है। इस रोग से फलों के गुच्छे एवं डंठल काले हो जाते हैं तथा बाद में सड़ने लगते हैं।
रोकथाम---- इस रोग की रोकथाम के लिए कॉपर ऑक्सिक्लोराइड का 0.3% का छिड़काव करना चाहिए।
अंतः बिगलन----- 
यह रोग फफूंद द्वारा होता है। इस रोग से प्रभावित पौधों के अंदर की पत्तियां गल जाती है और नई पत्तियों के निकलने में रुकावट पैदा  करती है। इस प्रकार से पत्तियों का गलना अंदर की ओर बढ़ता चला जाता है और अंततोगत्वा फूल नहीं निकल पाता।
रोकथाम (1)- खेत में उचित जल निकास की व्यवस्था करें।
(2)-- पौधों को उचित दूरी पर लगाएं।
(3)-- डाईथिन m-45 के 0.25% घोल का छिड़काव करें।






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