Sunday, 21 June 2020

मूली की खेती



भारतवर्ष में उगाई जाने वाली जड़ वाली सब्जियों में मूली का प्रमुख स्थान है इसकी जड़ पत्तियां एवं फलियां सभी का उपयोग किया जाता है मूली कब्ज को दूर करती है यह मूत्र को खोल कर लाती है और भूख भी बढ़ाती है सभी रोगों में मूली नित्य सेवन करने योग्य शाक  है। मूली में पाई जाने वाली चरपराहट मिथाइल आइसो थायो सायनाइड की उपस्थिति के कारण होती है।

पोषक मूल्य----
स्वास्थ्य की दृष्टि से मूली को मानव भोजन में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है मूली के संपूर्ण पौधे का किसी न किसी रूप में प्रयोग किया जाता है इसका उपयोग सब्जी सलाद पराठा आदि के रूप में किया जाता है।

जलवायु----मूली को सभी प्रकार के मौसम में उगाया जा सकता है इसकी यूरोपियन किस्मों को कम तापमान की आवश्यकता होती है जबकि एशियाई किस्मों को ऊंचे तापमान की आवश्यकता होती है मूली की अच्छी जुड़े बनने तथा अच्छे स्वाद के लिए 10 से 15 सेंटीग्रेड तापमान अच्छा रहता है।

भूमि----इसके लिए बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है बलुआ दोमट मिट्टी जिसमें जीवांश की मात्रा अधिक हो ऐसी मिट्टी में मूली की अच्छी पैदावार की जाती है।

उन्नत किस्में----
(1) एशियाई या उष्णकटिबंधीय समूह---'
इस वर्ग की किस्में मध्यम से लंबे आकार की चिकनी ठोस और चटपटी होती हैं ।यह गर्म स्थानों में वह उगाने के लिए उपयुक्त होती है । जैसे-- पूसा देसी ,पूसा चेतकी, जापानी सफेद ,कल्याणपुर ,पंजाब सफेद ,हिसार मूली ,मेघालय सिलेक्शन।

(2) यूरोपियन या शीतोष्ण समूह ----
यूरोपियन किस्मों की जड़ों का आकार छोटा, खाने में स्वादिष्ट और कम चटपटी होती हैं । यह ठंडे स्थानों पर उगाने के लिए बहुत ही उपयुक्त रहती है जैसे-- रैपिडरेड सफेद टिंण्ड, सफेद आईसीकिल ,पूसा हिमानी।

कुछ उन्नत किस्मों की विशेषताएं-----

पूसा चेतकी--:
इसकी जड़ें 15 से 20 सेमी लंबी ,पत्तियां हरी मध्यम आकार की और कटाव दार होती हैं । जड़ें बिल्कुल सफेद, चिकनी कोमल व कम तीखी होती हैं ,। मैदानी क्षेत्रों में इसे अप्रैल के अंत से अगस्त के शुरू तक उगाया जा सकता है।

कल्याणपुर-1--::इस किस्म की मूली सफेद रंग की होती है जो 22 सेमी लंबी बढ़ती है। इसे वर्षा व शरद ऋतु में उगाया जा सकता है। यह किस्म चेपा सरसों की आरा मक्खी और श्वेत रतुआ की मध्यम प्रतिरोधी किस्म है।

हिसार मूली-1 ----:
इसमें किस्म की बुवाई सितंबर से अक्टूबर तक की जाती है इसकी जड़ें सीधी लंबी और सफेद रंग की होती हैं यह किस्म बुवाई के 50 से 55 दिन बाद तैयार हो जाती है।

पूसा हिमानी---: 
यह किस्म पहाड़ी तथा मैदानी क्षेत्रों में बोई जा सकती है मैदानी क्षेत्रों में इसकी बुवाई दिसंबर से फरवरी तक तथा पहाड़ी इलाकों में पूरे वर्ष उगाया जा सकता है इसकी जड़ें 25 से 30 सेमी लंबी होती है बुवाई की 60 दिन बाद हे फसल तैयार हो जाती है।

सफेद आईसीकील---;यह किस्म ठंडी जलवायु के लिए उपयुक्त है इसकी जड़ें पतली और सफेद होती है जो ऊपर से नीचे की तरफ पतली होती जाती है इस किस्म की मूली बुवाई के 30 दिन बाद तैयार हो जाती है इसे बोने का उचित समय अक्टूबर से फरवरी तक होता है।

 भूमि की तैयारी---मूली की फसल भूमि के अंदर होती है इसलिए खेत की तैयारी अच्छी प्रकार से करनी चाहिए । पहली जुताई मिट्टी पलट हल से करके 3-4 जुताई कल्टीवेटर से करके मृदा भुर भुरी कर लेनी चाहिए।

खाद तथा  उर्वरक--- 250 मूली प्रति हेक्टेयर पैदावार बढ़ाने के लिए खेत में मृदा की जांच करना बहुत ही आवश्यक है । यदि भूमि की जांच ना हो सके तो उसमें 200 से 250 कुंतल गोबर की खाद 50 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन 40 से 50 किलोग्राम फास्फोरस और 40 से 50 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से देनी चाहिए गोबर की खाद  बीज बोने के  1 माह पूर्व  खेत में  अच्छी तरह से  मिला दे ।

बुवाई का समय---
मूली को साल भर उगाया जा सकता है। व्यावसायिक स्तर पर इसे मैदानी क्षेत्रों में सितंबर से जनवरी तक और पर्वतीय क्षेत्रों में मार्च से अगस्त तक बोया जाता है इस अवधि में मूली की बुवाई करने पर मूली अच्छी मुलायम और लंबी होती है जिसका बाजार में मूल्य अधिक होता है।

बीज बोने की विधि--मूली की बुवाई दो विधियों से की जाती है।
(1) मेड़ों पर बीज बोना--:
इस विधि में 30 से 40 सेमी की दूरी पर 25 सेमी ऊंची मेंडें बना ली जाती हैं मेडो के दोनो तरफ 2 से 3 सेमी की गहराई पर बुवाई की जाती है। बीज अंकुरण के बाद जब पौधों में दो पत्तियां आ जाएं तो पौधों को 8 से 10 सेमी की दूरी छोड़कर बाकी पौधों को निकाल दिया जाता है।

(2) कतारों में वुवाई करना--- 
खेत अच्छी प्रकार से तैयार करने के बाद उसमें क्यारियाॅ बना ली जाती हैं इन क्यारियो में 30 सेमी की दूरी पर कतारे बना ली जाती है इन  कतारों में बीज को लगभग 3 सेमी की गहराई पर बो देते हैं। जब पौधों पर दो से तीन पत्तियां आ जाएं उस समय 8 से 10 सेमी की दूरी पर एक स्वस्थ पौधे को छोड़कर शेष पौधों को निकाल देते हैं।

सिंचाई तथा जल निकास---बीज की बुआई के बाद खेत की सिंचाई करना आवश्यक है  अंकुरण के15-20 दिनों बाद पौधे जल का सर्वाधिक उपयोग करते हैं इस समय सिंचाई का विशेष रुप से ध्यान रखें । बरसात ना होने पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करेंं। और गर्मियों में एक सप्ताह के अंतर पर और सदियों में 10 से 15 दिन केेेे अंतराल पर सिंचाई करते रहनाा चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण-----
खरपतवार की मात्रा के अनुसार दो या तीन बार निकाई गुडाई मूली के लिए आवश्यक होती है बड़ी मूली वाली जातियों में मिट्टी चढ़ाई जाती है निराई गुड़ाई करते समय यदि पौधों की संख्या अधिक हो तो फालतू पौधों को निकाल देना चाहिए।
रसायन विधि से खरपतवार नियंत्रण हेतु  टोंक-ई-25 नामक खरपतवार नाशी का वुवाई के पूर्व छिड़काव किया जा सकता है   

कीट नियंत्रण------

माहू-- माहू पौधों के सभी कोमल भागो का रस चूसता है। यह पीले हरे रंग के छोटे-छोटेे कीट होतेे हैं जब आकाश में बादल छाए होते है और मौसम ठंडा होता हैै तो इस कीट का प्रकोप बढ़ जाता है।
रोकथाम---इस कीट की रोकथाम के लिए 1 लीटर मेलाथियान-50ई सी को 600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से फसल पर छिड़काव करें।

डायमंड बैकमोथा--
इस कीट की सुड़ियां पौधों की पत्तियां को खाई खाती हैं। इसे कीट का आक्रमण अगस्त से दिसंबर तक होता है यह सुडिंयां सिलेटी रंग की होती हैं ।
रोकथाम--
 इस कीट की रोकथाम के लिए साइपरमैथरीन घोल का छिडकाव करना चाहिए।

रोग नियंत्रण---

सफेद रतुआ--यह रोग फफूंदी के कारण होता है इस रोग से प्रभावित पौधों की पत्तियों पर सफेद या पीले से फफोले दार धब्बे बन जाते हैं जो बाद में मिलकर अनियंत्रित आकार के धब्बों का निर्माण करते हैं।
रोकथाम--
इसकी रोकथाम के लिए डाइथेन जेड-78 के 0.2% घोल का छिड़काव करें तथा रोग प्रतिरोधी जातियों को  उगाएं।

मोजेक रोग--यह रोग विषाणु के द्वारा होता है इस रोग से प्रभावित पौधों की पत्तियां धब्बे युक्त पीले रंग की हो जाती हैं तथा इसका आकार सामान्य से छोटा हो जाता है और पत्तियों की मोटाई भी बढ़ जाती है इस रोग के विषाणु कीटो द्वारा स्वस्थ पौधों पर पहुंचते हैं।

खुदाई---मूली की खुदाई उसकी उगाई जाने वाली किस्मों पर निर्भर करती है ।मूली की एशियाई किस्स में 40 दिन बाद खाने योग्य हो जाती हैं जबकि यूरोपियन किस्म 20 दिन बाद खाने योग्य हो जाती हैं मूली की खुदाई जड़ों की मुलायम अवस्था पर करनी चाहिए।



उपज----: मूली की उपज भूमि की किस्म भूमि की उर्वरता ,उन्नतसील किस्म, जलवायु आदि बातों पर निर्भर करती है। एशियाई किस्मों का औसतन उत्पादन 200 से 250 कुंतल प्रति हेक्टेयर तथा यूरोपियन किसानों का औसत उत्पादन 100 से 125 कुंतल प्रति हेक्टेयर है।

    बीज उत्पादन 

मूली का भारतीय एवं एशियाई जातियों का बीज मैदानी क्षेत्रों मे तथा यूरोपीय जातियों का बीज पहाड़ी क्षेत्रों मे तैयार किया जाता है। बीज तैयार करने की दो विधियाँ है-

[1] खेत मे ही पौधे को छोड़कर खेत मे ही कटाई करते समय उपयुक्त स्वस्थ पौधों की कटाई नहीं की जाती। उन्हे वही पड़ी रहने देना चाहिए। अन्य पौधे को निकाल दिया जाता है। तथा शेष पौधे मे सिचाई कर दी जाती है। कुछ समय बाद उनमे तने निकल आते है, जिन पर फूल तथा फलियाँ बनती है।

[2]  पुनः रोपाई ----

 चुने हुए पौधों को खेत से निकालकर किसी दूसरे स्थान पर पुनः रोपित कर देते है।यह रोपाई मध्य नवंबर से दिसम्बर के प्रथम सप्ताह तक करते है।  रोपाई के तुरंत बाद इनकी सिचाई कर दी जाती है। तथा आवश्यकतानुसार नत्रजन की कुछ मात्रा भी डाल दी जाती है। कुछ समय बाद इसमे तने तथा शाखाये निकल आती है। जिन पर फूल तथा फलियाँ बनती है। फलियाँ जब पककर सूख जाती है तब उनकी कटाई करके बीज प्राप्त कर लिया जाता है ।





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