Sunday, 21 June 2020

गन्ना की खेती




गन्ना की खेती

गन्ना चीनी का प्रमुख स्रोत है भारत में कपड़ा उद्योग के बाद चीनी उद्योग का दूसरा स्थान है। चीनी उद्योग से देश के कुल राष्ट्रीय आय में महत्वपूर्ण योगदान है। इसमें लाखों लोगों को रोजगार प्राप्त होता है तथा हमारे भोजन में ऊर्जा का मुख्य स्रोत भी  है। गन्ने का मुख्य उपयोग शक्कर या चीनी बनाने के लिए 35 से 55% तथा गुड़ बनाने के लिए 40 से 42% और चूसने एवं बीज के लिए 18 से 20% के लिए किया जाता है।
इसके अतिरिक्त इससे शराब भी बनाई जाती है और गन्ने की खोई से कार्डबोर्ड या गत्ता तथा कागज आज बनाए जाते हैं इसे जलाने के रूप में भी प्रयोग किया जाता है।
गन्ने की हरी पत्तियां जानवरों के चारे के रूप में तथा सूखी पत्तियों को छप्पर तथा खाद बनाने में प्रयोग किया जाता है


क्षेत्रफल एवं उत्पादन

गन्ना विश्व के लगभग सभी क्षेत्रों में उगाया जाता है किंतु भारत मैं इसकी खेती लगभग 5 मिलियन हेक्टेयर में की जाती है जिससे कुल 350 मिलियन टन गन्ना पैदा होता है। इसकी औसत हो पाजी 690 कुंतल प्रति हेक्टेयर है। क्षेत्रफल और उत्पादन की दृष्टि से भारत में गन्ना उत्पादन का उत्तर प्रदेश का प्रथम स्थान है। इसकी औसत उपाय 593 कुंतल प्रति हेक्टेयर है। भारत में गन्ने की प्रति हेक्टेयर सर्वाधिक उत्पादन तमिलनाडु राज्य की 1070 कुंतल प्रति हेक्टेयर है उत्तर प्रदेश में इसकी खेती सहारनपुर मेरठ गोरखपुर तथा रोहिलखंड मंडलों में सर्वाधिक होती है।

गन्ना के लिए आवश्यक जलवायु
गन्ना उष्णकटिबंधीय जलवायु का पौधा है। इसके लिए अधिक तापमान तथा चमकीली धूप सामान आर्द्रता और पाला रहती जलवायु उपयुक्त होती है। इसके अंकुरण के लिए 25 से 30 सेंटीग्रेड तापमान अच्छा होता है जबकि इसकी वृद्धि और विकास के लिए 32 से 37 डिग्री तापमान उपयुक्त होता है इसकी खेती 50 सेमी से 250 सैनी वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में जहां सिंचाई के साधन है वहां पर आसानी से की जा सकती है।

गन्ने के लिए मिट्टी तथा खेत की तैयारी
गन्ने के लिए दोमट मिट्टी का खेत सबसे बढ़िया होता है किंतु भारी दोमट मिट्टी होने पर भी गन्ने की अच्छी फसल हो सकती है खेत को तैयार करने के लिए एक बार मिट्टी पलटने वाले हल से जोत कर तीन चार बार हैरो चलाना चाहिए । बुवाई के समय खेत में नमी होना आवश्यक है। खेत में उचित जल निकास का साधन होना चाहिए।




गन्ने के लिए  बीज का चुनाव

गन्ने का पूरा थाना कभी भी नहीं बोया जाता है इसे सदैव टुकड़ों में काटकर बोया जाता है क्योंकि गन्ने मैं शीर्ष सुषुप्त अवस्था में पाई जाती है। यदि पूरा गन्ना बिना कांटे बो दिया जाता है तो केवल ऊपरी भाग ही अंकुरित हो पाता है निचला नहीं। गन्ने में कुछ हार्मोन ऐसे होते हैं जो पौधों में ऊपर से नीचे की ओर प्रभावित होते हैं। टुकड़ों में काटकर बोलने से इनका प्रभाव रुक जाता है तथा कालिका आसानी से अंकुरित हो जाती हैं।
गन्ने के तने को टुकड़ों में काटकर बोया जाता है। काटते समय तेज धार वाले गड़ासी से इस प्रकार काटते हैं कि गन्ने की गांठ या कलिका को कोई हानि ना पहुंचे। प्रत्येक टुकड़े में दो या तीन कलिका होनी चाहिए। डीजे ऐसी फसल से लेना चाहिए जो निरोगी हो तथा उसमें की आदि का प्रकोप ना हुआ हो और बीज शुद्ध तथा स्वस्थ हो।


गन्ना बोने की विधियां---

समतल खेत में गन्ना बोना --- चंचल खेतों में गन्ना की बुवाई हल्के पीछे पंक्तियों में करते हैं। इस विधि में गन्ने के लिए 75 से 90 सेमी की दूरी पर देशी हल द्वारा 8 से 10 सेमी गहरे कोड बनाए जाते हैं जिनमें गन्ने के टुकड़ों को सिरा से सिरा मिलाकर बो दिया जाता है। आटा चलाकर टुकड़ों को ढक दिया जाता है उत्तर भारत में इसी विधि का ज्यादा से ज्यादा प्रचलन है।

रिजर द्वारा बनाए गए कूँड में गन्ना बोना

इस विधि में गन्ना रिजर द्वारा 10 से 15 सेमी गहरे कूड  बनाए जाते हैं। गन्ने के टुकड़ों को इन कुंडों में बोकर ऊपर से 5 से 7 सेमी मिट्टी डाल देते हैं। इसमें बुवाई के तुरंत बाद पानी दे दिया जाता है। पाटा नहीं लगाया जाता। यह विधि पूर्वी उत्तर प्रदेश और दक्षिणी भारत में भारी भूमि के लिए प्रचलित है।

नालियों में गन्ना बोना

यह विधि गन्ने की अधिकतम पैदावार लेने के लिए उपयुक्त है। इस विधि द्वारा खाद व पानी की बचत होती है क्योंकि उस का अधिकतम उपयोग होता है गन्ना गिरता नहीं है। इस विधि में 90 से मी की दूरी पर मजदूरों द्वारा 20 सेमी गहरी नालियां बनाई जाती हैं। इन नालियों का निर्माण करने से 45 सेमी चौड़ी नाली व 45 सेमी चौड़ी और 15 सेमी ऊंची मैंने बन जाती हैं। नालियों में उर्वरक बिखेर कर मिला दिया जाता है। इसके बाद उपचारित टुकड़ों को नालियों में एक-एक करके वह दिया जाता है और मिट्टी से ढक देते हैं।


गन्ना बोने की दोहरी पंक्ति विधि

अच्छी उपज आयु एवं खाद तथा सिंचाई सुविधा वाले स्थानों के लिए भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान लखनऊ द्वारा विकसित गन्ना बोने की दोहरी पंक्ति विधि अधिक उपयोगी पाई गई है। दोहरी पंक्ति विधि में गन्ने के दो टुकड़ों को अगल-बगल बोलते हैं जिससे पौधे भरत तो बढ़ने से पैदावार में 25 से 60% तक वृद्धि होती है।

अंकुरित गन्ने के टुकड़ों का या रेग्यून्गन बुवाई हेतु प्रयोग

रेग्यून्गन शब्द जापानी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है एक आंख वाले अंकुरित गन्ने के टुकड़े की बुवाई। भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान लखनऊ ने शोध में पाया है कि यदि बुवाई से एक या दो माह पहले गन्ने के अंगोलो को काट दिया जाए तो ऊपर ही भाग से कल खाएं सक्रिय होकर तीन से चार पंक्तियों की हो जाती हैं फिर इन्हें 40 सेमी के लंबाई की तीन आंख के टुकड़ों को काट कर बोया जाए तो उपज अच्छी होती है।


बीज की दर--  

तीन आंख के लगभग 35000 से 40000 टुकड़े जिनका वजन गन्ने की मोटाई के अनुसार 60 से 70 कुंतल हो सकता है प्रति हेक्टेयर बुवाई के लिए पर्याप्त होते हैं। देर से बुवाई करने पर बीज की मात्रा को 25 से 50% तक बढ़ा देना चाहिए।

  गन्ने का बीज उपचार

बीज जनित्र बीमारियों से बचाव के लिए कटे हुए टुकड़ों को पारा युक्त रसायन जैसे -एरीटान 6% की 280 ग्राम, या एग लाल 3% की 360 ग्राम मात्रा को 112 लीटर पानी में घोलकर बीज को उपचारित करते हैं। इससे पहले टुकड़ों को 4 से 5 घंटे पानी में डुबोकर रखने से अंकुरण अच्छा हो जाता है।


 गन्ने के लिए खाद तथा उर्वरक

पोषक तत्वों की मात्रा का निर्धारण करने से पहले खेत का परीक्षण कराना आवश्यक होता है। अधिक लंबी अवधि की फसल होने के कारण गन्ना में कार्बनिक खाद्य जैसे हरी खाद या गोबर की खाद अथवा कंपोस्ट खाद ओं का उपयोग आवश्यक होता है हरी खाद या गोबर खाद द्वारा खेत में कम से कम एक तिहाई नाइट्रोजन की मात्रा की पूर्ति करनी चाहिए शेष पोषक तत्वों की पूर्ति उर्वरकों द्वारा करनी चाहिए। यदि मृदा का परीक्षण किसी कारणवश ना हो सके तो गन्ने की फसल को निम्न पोषक तत्व प्रदान करने चाहिए जैसे
150 से 180 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 से 80 किलोग्राम फास्फोरस, 20 से 40 किलोग्राम पोटाश और लगभग 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट की आवश्यकता पड़ती है।
खाद को फसल बोने के एक महीना पहले खेत में डालकर अच्छी तरह मिला देना चाहिए। उर्वरकों द्वारा नाइट्रोजन की एक तिहाई मात्रा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय तथा नाइट्रोजन की शेष मात्रा को कल्ले फूटते समय तथा अधिकतम वृद्धि की अवस्था में देना चाहिए।

गन्ने की सिंचाई---- उत्तर प्रदेश में गन्ने में सिंचाई के अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न मात्रा में आवश्यकता होती है प्रदेश के पूर्वी भाग में चार से पांच सिंचाई मध्य क्षेत्र में 5 से 6 सिंचाई पश्चिमी क्षेत्र में 7 से 8 सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है।


गन्ने की  निराई गुड़ाई--  

 अंकुरण बढ़ाने के उद्देश्य से गन्ने में अंकुरण से पहले ही खेत की गुड़ाई करनी पड़ती है जिससे खेत में वायु संचार तथा मृदा में नमी संरक्षण भी होता है। गन्ने में बरसात शुरू होने से पहले तक निराई गुड़ाई चार पांच बार करनी पड़ती है जिसे खुरपी या फावड़े की सहायता से कर सकते हैं।

खरपतवार नियंत्रण

फसल की प्रारंभिक अवस्था में है खरपतवारो का नियंत्रण आवश्यक होता है। इसके लिए ग्रीष्मकालीन फसल में दो से तीन तथा वर्षा कालीन फसल में तीन से चार निकाय गुड़ाई की आवश्यकता होती है। निकाय गुड़ाई का कार्य खुरपी फावड़ा आदि के द्वारा किया जा सकता है। निकाई गुड़ाई करने से खरपतवार नष्ट होने के साथ-साथ मृदा मैं वायु संचार बढ़ जाता है तथा मृदा नमी संरक्षण में भी लाभ होता है। 

रासायनिक विधि से खरपतवारो को नष्ट करने के लिए वैशालीन दवा का एक किलोग्राम सक्रिय अवयव को 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से बीज बोने से पूर्व खेत में छिड़क करें मिट्टी में मिला देने से प्रारंभ में खरपतवार अंकुरित नहीं होते हैं।

मेडी चढ़ाना एवं बांधना

वर्षा शुरू होने तक खेत में फसल पर एक बार मिट्टी चढ़ाने का कार्य पूरा कर देना चाहिए। दो पंक्तियों के बीच से मिट्टी उठाकर दोनों तरफ फसल पर 15 से 20 सेमी ऊंची मिट्टी चढ़ाने से फसल गिरने से बच जाती है। और वृद्धि एवं विकास अच्छा होता है जिससे उपज बढ़ जाती है।



गन्ने की कटाई 

गन्ने की फसल की कटाई उस समय करनी चाहिए जब उसमें मिठास की अधिकतम प्रतिशत हो। यह फसल की आयु बुवाई के समय आदि पर निर्भर करती है। कटाई हेतु गन्ना पकने की जानकारी प्राय रिफ्रैक्टोमीटर की रीडिंग से ज्ञात की जाती है। जब गन्ने में ब्रिक्स 17% से अधिक हो तो गन्ना कटाई योग्य माना जाता है।

गन्ने की पैड़ी का प्रबंध 

गन्ने की मुख्य फसल को कटाई के बाद तने के भूमिगत भाग पर स्थित कालियाँ अंकुरित होकर जब पुनः नई फसल उत्पन्न करती हैं तो उस फसल को पेडी कहते हैं। भारत में गन्ने का 30% से अधिक भाग पेडी से प्राप्त होता है जबकि उत्तर प्रदेश में यह लगभग 50% है। गन्ने में पैड़ी लेने के मुख्य भाग निम्नलिखित है--
(1)- पेडी रखने से खेत की तैयारी बीज एवं बुवाई का खर्च तथा समय बच जाता है।
(2)- पैड़ी की फसल में उत्पादन व्यय कम आता है।
(3)- पेडी की फसल में चीनी प्रतिशत अधिक पाया जाता है।
(4)- पेड़ी कम समय में पक कर तैयार हो जाती है ।
(5)- शीघ्र पकने के कारण चीनी मिलें पेराई शीघ्र शुरू कर देती है।
(6)- पेडी की फसल लेने से मुख्य फसल में दी गई खाद की मात्रा के अवशेष का उपयोग हो जाता है।



पैड़ी से हानियां--

● एक खेत में लगातार गन्ने की फसल वर्षों तक खड़ी रहने के कारण फसल पर कीटों तथा बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है 
● भूमि कमजोर या खराब हो जाती है।
● कभी-कभी फसल कमजोर होने से उपज कम प्राप्त होती है जिससे किसान को आर्थिक हानि का सामना करना पड़ता है

गन्ने की पेड़ी से अधिक उपज प्राप्त करने के लिए कृषि क्रियाएं

फसल का चुनाव---- बुवाई के लिए गन्ने की अच्छी निरोग शुद्ध तथा कीट व रोग रहित फसल का चुनाव करना चाहिए। बसंत काल में बोई गई फसल पैड़ी के लिए सर्वाधिक उपयुक्त होती है।

फसल की कटाई----- फसल की कटाई फरवरी से मार्च के महीने तक तेजधार हथियार से जमीन से सटाकर करनी चाहिए जिससे खेत में अधिक डंठल ना हो।

खेत की सफाई---- खेत में अनावश्यक ठूॅठो की छटाई, पत्तियों को इकट्ठा करके जलाना, खरपतवार को नष्ट करना खेत में बनी  मेड़ों को तोड़ना, फावड़े की सहायता से खेत में पड़े कूड़े करकट को इकट्ठा करके जलाना, आदि।


गन्ने के प्रमुख कीट एवं रोग तथा नियंत्रण

दीमक-- यह कीट बुवाई से कटाई तक कभी भी लग सकता है। यह गन्ने के बोए हुए टुकड़ों, जड़ तथा तने को काटकर वहां पर मिट्टी भर देता है।

नियंत्रण विधि--  इस कीट के नियंत्रण के लिए 4% फेनवैलेरेट की धूल का 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बोरगांव करना चाहिए अथवा एमेड़ा क्लोप्रेड 200 एसएल की 400 मिलीमीटर मात्रा को 2000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।

तना बेधक कीट----  यह कीट गन्ने के तने में छेद करके प्रवेश कर जाता है तथा उसे अंदर ही अंदर खाता रहता है गन्ना फाड़ने चीरने पर लाल रंग का दिखाई देता है यह कीट गन्ने को अधिक नुकसान पहुंचाते हैं।

नियंत्रण विधि--- जुलाई से अक्टूबर तक 15 दिन के अंतर पर ट्राइकोकार्ड का प्रयोग करें। अगस्त से सितंबर माह में मोनोक्रोटोफॉस की 2 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 1000 लीटर पानी में घोलकर 15 दिन में दो बार छिड़काव करें

कण्डुआ रोग--- इस रोग के कारण अगले की पत्तियां छोटी , पतली व नुकीली हो जाती है इसका अंगुली से लगाव एक समान दूरी पर इस प्रकार हो जाता है कि अंगोला पंखी नुमा लगता है। आगोले के सिरे से काले रंग का चाबुक जो कि एक सफेद पतली झिल्ली से ढका रहता है निकल आता है जिसकी लंबाई लगभग 1 मीटर तक हो जाती है।

नियंत्रण (1)- बीजोपचार करके टुकड़ों की बुवाई करना।
(2)- रोग रोधी प्रजातियों  को लगाना।
(3)- रोगी फसल से पेडी ना लेना।
(4)- रोग ग्रस्त पौधों को उखाड़ कर या जलाकर नष्ट कर देना

● उकठा रोग--- यह फफूंदी से फैलने वाला रोग है इससे प्रभावित गन्ने के अगोले शुरू में पीले पड़ने लगते हैं तथा धीरे धीरे पूरा अंगोला सूख जाता है और नीचे की ओर मुड़ जाता है। इन गन्नों की पोरियों का रंग हल्का पीला तथा अंदर से खोखला हो जाता है।

नियंत्रण--  इस कीट के नियंत्रण के लिए एगलाल या एरीटान से बीजोपचार करना।उचित फसल चक्र अपनाना। रोग रोधी किस्मों का प्रयोग करना।


पत्ती की लालधारी--- गन्ने की पत्तियों पर लाल अथवा भूरे रंग की समांतर धारियां निचली सतह पर पड़ जाती है। कभी-कभी धारियॉ इतनी अधिक हो जाती है कि पूरी लाल दिखने लगती है। पत्तियों का क्लोरोफिल समाप्त हो जाता है इस रोग से फसल की बढ़वार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

नियंत्रण--- (1) बीज उपचार करना।
(2)  रोग रोधी प्रजातियों की बुवाई करना।
(3) उचित फसल चक्र का प्रयोग करना।




   गन्ने का बीज उत्पादन----

(1)- गन्ने के आधार पर बीज उत्पादन के लिए प्रजनक बीज गन्ना नर्सरी से प्राप्त किया जा सकता है जो शुद्ध किस्म का हो, अर्थात रोग मुक्त होना चाहिए।
(2)- ऐसे खेत का चुनाव करना चाहिए जो उपजाऊ हो उचित जल निकास युक्त हो, तथा उसमें पिछले वर्ष से गन्ने की कोई फसल न की गई हो
(3)- बीज को 50 सेंटीग्रेड पर 2 घंटे तक फफूंदी नाशक दवा से उपचारित करने के बाद बुवाई करनी चाहिए।
(4)- गन्ने की अधिक उपज लेने के लिए 150 किलोग्राम नाइट्रोजन 100 किलोग्राम फास्फोरस तथा 75 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में प्रयोग करना चाहिए।
(5)- भूमि की किस्म तथा क्षेत्र की जलवायु के अनुसार सिंचाई की आवश्यकता होती है। खेत में उचित जल निकास की सुविधा होना अति आवश्यक है।
(6)- खरपतवार नियंत्रण के लिए रासायनिक दवाओं का प्रयोग करना चाहिए ।
(7)- उकठा व कंडुआ गन्ने के मुख्य रोग हैं। इनसे प्रभावित गन्ने के झुण्डों को कड़ाई से पूर्व निकाल कर नष्ट कर देना चाहिए।
(8)- कंसुआ, तनाबेदक ,दीमक गन्ने के प्रमुख कीट है। इनका नियंत्रण समय से रसायनों के प्रयोग से करना चाहिए।
(9)- आवाच्छनीय पौधों को समय-समय पर निकालते रहना चाहिए।
(10)- गन्ने की फसल 10 महीने की होने पर कटाई की जा सकती है। किंतु यह ध्यान रखना चाहिए कि कटाई ,छिलाई तथा ढुलाई के समय गन्ने की आंख को नुकसान ना होने पाए तथा कटा हुआ गन्ना अधिक समय तक धूप में ना रहने पाए। इसलिए बुवाई के समय ही गन्ने की कटाई करना अच्छा रहता है।



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