Sunday, 21 June 2020

आडू की खेती



आडू की खेती
आडू समशीतोष्ण जलवायु का फल है। इसे उन्हीं क्षेत्रों में अधिक प्रयोग में लाया जाता है जहां इसकी खेती होती है। यह मध्यम स्वाद वाला पौष्टिक फल है जिसे ताजे रूप में खाया जाता है इससे जेली तथा जैम भी बनाया जाता है।
आडू की उत्पत्ति
आडू का जन्म स्थान चीन है। यहीं से इसका प्रसार ईरान, इटली होते हुए यूरोप तथा अमेरिका में हुआ।
व्यवसायिक रूप से यह संसार में समशीतोष्ण भागों में पैदा किया जाता है। भारतवर्ष में यह पहाड़ी एवं पर्वतीय भागों में उत्पन्न किया जाता है। इसकी बागवानी उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में जैसे देहरादून नैनीताल अल्मोड़ा गढ़वाल इत्यादि में की जाती है। इसकी कुछ किस्में ऐसी है जिनको उत्तर प्रदेश के मैदानी जिलों में जैसे मेरठ मुजफ्फरनगर सहारनपुर इत्यादि में सफलतापूर्वक पैदा किया जाता है।
आडू के लिए जलवायु--- 
आडू समशीतोष्ण जलवायु का पौधा है। इसके लिए नमवा सर्द जलवायु की आवश्यकता होती है। बहुत अधिक ठंड में इसके फूल प्रभावित हो जाते हैं। अन्य फलों की अपेक्षा आडू कुछ गर्म जलवायु भी सहन कर सकता है इसी कारण मैदानी क्षेत्रों में कुछ किस्में जैसे -- शरबती सहारनपुर आदि की बागवानी की जाती है।

आडू के लिए उपयुक्त भूमि---
          आडू की बागवानी सभी प्रकार की मिट्टियों में की जा सकती है। परंतु आडू के लिए गहरे बलुई दोमट भूमि सर्वोत्तम होती है जिसमें उचित जल निकास की व्यवस्था हो। जहां भी आडू के बाग में पानी रुकता है वहां पौधे जड़ सड़न रोग से सूख जाते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों की भूमि कम गहरी होने के कारण पौधों की वृद्धि अधिक नहीं हो पाती। ऐसे स्थान पर बाग लगाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि भूमि लगभग 1 मीटर गहरी हो।
उन्नत किस्में-
(1)- शीघ्र तैयार होने वाली किस्में--- एलेक्जेंडर, काफोर्ड अर्लीरिवर्स ,अर्लीबीर्ट्रेस।
(2)- मध्यम अवधि की किस्में-- पेरी ग्रान, अर्ली रिवर्स, हेल्स अर्ली, अल्बर्टा, ड्यूक ऑफ़ याक॔ ।
(3)- देर से होने वाली किस्में-- चौबटिया  रेड, रेड विंग, प्रिंसेज ऑफ विंटर, फोस्टर, गोल्डन बुश, नोबलेस, हेल बर्टी ।
मैदानी क्षेत्रों के लिए
शरबती ,सफेदा ,फ्लोर डॉसन ,सनरेड, शान-ए-पंजाब, प्रभात, चकिया, सफेद अर्ली क्रीम, चाइना फ्लैट, सहारनपुर नंबर 6, सहारनपुर नंबर 3, नेकटिरिन ।

प्रमुख किस्मों की विशेषताएं
पहाड़ी क्षेत्रों के लिए--
● अल्बटी-- --- यह फल बड़ा, आकर्षक बीज रहित तथा मध्यम किस्म का होता है। पकने के बाद भी इसका स्वाद अलका कड़वा होता है। यह विभिन्न प्रकार की जलवायु में उत्पन्न की जा सकती है।
पैरी ग्रीन---- यह फल बड़ा तथा छिलका चमकता हुआ लाल, गोदा रसदार मीठा तथा अच्छी सुगंध वाला होता है इस किस्म के फल जून के दूसरे सप्ताह में पक जाते हैं।
ड्यूक ऑफ़ Yark--- इस फल का आकार औसतन, बक्कल लाल, गोदारा संयुक्त मीठा एवं अच्छी खुशबू वाला होता है। यह पौधे नियमित फल देते रहते हैं। फल जुलाई के प्रारंभ में पकना शुरू हो जाते हैं।
अर्ली बी ट्रीस---- यह फल छोटा छिलका चमकीले रंग वाला होता है । जिस पर लाल धारियां होती हैं। इसका गूदा स्वादिष्ट एवं रसदार होता है यह किस्म सभी किस्मों से जल्दी पक जाती है।
एलेक्जेंन्डर------  इस फल का आकार बड़ा होता है इसका छिलका हरा सफेद जो चमकते लाल रंग से ढका होता है। इस फल का गूदा हरा सफेद रसदार तथा मीठा होता है यह शीघ्र पकने वाली किसमें है।
मैदानी क्षेत्रों के लिए--
शरबती------ यह मैदानी क्षेत्र की सबसे प्रमुख किस्में है। इसके फल बड़े ,आधार पर लाल ,व  हरे - पीले रंग के होते हैं। इसमें गूदा गुठली से चिपका रहता है तथा अत्यंत रसीला, मीठा एवं मुलायम होता है। पके हुए फल जून के मध्य से मेरे नहीं लगते हैं  और इनकी की उपज अच्छी होती है । फल ताजे रूप में खाने पर अच्छे लगते हैं।
● सफेदा------ फल गोल ,औसतन आकार वाले ताजे रूप में खाने पर उत्तम रहते हैं। इनका छिलका पीले रंग का लालिमा लिए हुए होता है। इनका गोदा हल्का पीला रसीला तथा मीठा होता है। इनकी गुठली गोरे से चिपकी रहती है। यह उपाधि अच्छी व जुलाई के मध्य में पकने वाली किस्म है।
फ्लोरिडासन------ यह बहुत ही शीघ्र अप्रैल के अंतिम दिनों में पक कर तैयार हो जाती है। इसके फल औसतन आकार वाले गोल होते हैं इनका छिलका लाल होता है। गूदा, पीला ,मीठा तथा गुठली से अलग रहता है। इन की उपज अच्छी होती है।
● शान-ए-पंजाब -------  इस किस्म के फल फ्लोरिडा सन से बड़े होते हैं। इनका गूदा पीले रंग वाला गुठली से अलग रहता है यह फल अधिक समय तक रखे जा सकते हैं। डिब्बा बंदी के लिए यह अच्छी किस्में है । इसके फल मई के मध्य में पक जाते हैं।
● सहारनपुर प्रभात-----  यह किस्म शरबती तथा फ्लोरिडा सन की संकरण से तैयार पौधों के चयन से निकाली गई है। यह अगेती किस्म फल अनुसंधान संस्थान केंद्र सहारनपुर से निकाली गई है। इसके फल रसीले, मीठे व अच्छे गुणों वाले होते हैं । यह फल मई के दूसरे सप्ताह में पक जाते हैं।
फ्लोरिडा रेड------ इन फलों का आकार काफी बड़ा व रंग सुर्ख लाल होता है। इसका गूदा सफेद, मीठा व मुलायम होता है। यह फल जून के प्रथम सप्ताह में पकने आरंभ होते हैं।

प्रवर्धन-----आडू का पौधा बीज तथा वनस्पतिक प्रवर्धन दोनों विधियों से तैयार किया जाता है। बीज से उत्पन्न पौधे वानस्पतिक परिवर्धित पौधों की अपेक्षा कमजोर तथा उनकी उपज क्षमता कम होती है। वानस्पतिक प्रवर्धन में आडू प्रसारण की सबसे लोकप्रिय विधि वलय कलिकायन है। आलू और आलू चा के बीजू पौधों पर चश्मा चढ़ा कर अथवा कलम लगाकर आलू के पौधे तैयार किए जाते हैं। कलम लगाने का सही समय मई जून और अगस्त सितंबर माह है जबकि कलम लगाने के लिए फरवरी का महीना ठीक रहता है। आडू का बाग हल्की भूमि में लगाना हो तो आलू के ही बीजू पौधे मूल वृंत के रूप में प्रयोग करें तथा भारी भूमि के लिए आलूचा के पौधों पर कलम लगाये।
मूल वृन्त के लिए बीज नवंबर से दिसंबर में अच्छी तरह तैयार की हुई क्यारियों में 43 सेमी की दूरी पर कतारों में 10 से 15 सेमी के फासले पर 3 से 4 सेमी की गहराई पर बोए जाते हैं
संतुलित खाद तथा उर्वरक का प्रयोग एवं उचित प्रबंधन से जून माह में कलम लगाने के लिए पौधे तैयार किए जाते हैं। अन्यथा 1 वर्ष बाद पौधे कलम के लिए तैयार होते हैं। मैदानी क्षेत्र में विनियर कलम से अप्रैल-मई माह में पौधे तैयार किए जा सकते हैं।

आडू की पौध रोपण-------मैदानी क्षेत्र में आडू के बाग वर्षा और शीत ऋतु दोनों मौसमों में लगाई जा सकते हैं। जबकि पर्वतीय क्षेत्र में आडू के बाग शीत ऋतु में लगाने चाहिए बाल लगाने से 1 माह पूर्व5×5 मीटर की दूरी पर 1×1×1 मीटर के आकार के गड्ढे खोद लें। इन गड्ढों में 40 से 50 किलोग्राम गोबर की सड़ी हुई खाद, 500 ग्राम सुपर फास्फेट सिंगल और 150 ग्राम हेप्टाक्लोर मिट्टी के साथ मिलाकर भूमि की सतह से 15 से 20 सेमी गहराई तक भर देते हैं। गड्ढे की मिट्टी को अच्छी तरह दवा दें। यदि पानी की सुविधा हो तो सिंचाई करें अन्यथा वर्षा हो जाने के बाद ही पौधे लगाएं जिससे गड्ढे की मिट्टी अच्छी तरह से बैठ जाए और गड्ढे के मध्य में 1 वर्ष के पौधे की रोपाई करें। कलम किया हुआ भाग हमेशा भूमि की सतह से ऊपर रहे तथा जहां तक पौधे का भाग नर्सरी में था इतना भाव गड्ढे में अवश्य रहे। पहाड़ी क्षेत्र में जहां पानी का अभाव है वहां पौधे लगाने के बाद साले को घास फूस से ढक देना चाहिए

खाद तथा उर्वरक-----आडू की फलत के लिए प्रतिवर्ष बड़वार की आवश्यकता पड़ती है। इसी कारण आडू के लिए नाइट्रोजन पोषक तत्व की विशेष आवश्यकता पड़ती है।
भूमि की उर्वरता के अनुसार प्रति पौधा 18 से 20 किलोग्राम गोबर की खाद, 300 ग्राम नाइट्रोजन, 100 ग्राम फास्फोरस तथा 300 ग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है। गोवर की साड़ी खाद गड्ढे को भरते समय प्रयोग करें। फास्फोरस की आधी मात्रा रोपाई के समय तथा शेष आधी मात्रा रोपाई के बाद देनी चाहिए। नत्रजन की पूरी मात्रा पांच भागों में विभाजित कर अगस्त ,सितंबर ,अक्टूबर ,फरवरी तथा अप्रैल माह में देनी चाहिए। पोटाश तीन भागों में विभाजित कर सितंबर ,अक्टूबर तथा अप्रैल माह में देनी चाहिए।
आडू  की  सिंचाई-----
यदि पर्याप्त वर्षा हुई हो तथा उसका वितरण उपयुक्त रहा हो तो आडू मैं आमतौर पर सिंचाई नहीं की जाती। वैसे प्रारंभिक अवस्था 5 वर्ष तक एक सिंचाई प्रतिवर्ष अवश्य करनी चाहिए मुख्य रूप से फूल तथा फल लगते समय यदि भूमि में नमी की कमी हो तो सिंचाई अवश्य करनी चाहिए।
फल लगने के पश्चात छिड़काव द्वारा सिंचाई करने पर फल बड़े आकार के तथा अधिक रसदार हो जाते हैं।

निराई गुड़ाई--- आडू के बाग को प्रथम दो 3 वर्षों तक निराई गुड़ाई कर खरपतवारो से मुक्त रखना चाहिए। इसकी हल्की जुताई भी कर सकते हैं  जिससे खरपतवार नष्ट हो जाते हैं।

कटाई छटाई--'पौधों को अधिक मजबूत बनाने के लिए वृक्षों की काट छांट की जाती है जिससे फल वृक्ष की टहनियां मजबूत बनाकर फलों के भार को सहन कर सके अर्थात टूटे नहीं। अच्छे  कृन्तन करने से फलत अधिक होती है। इसके लिए पहले वर्ष आडू के पौधे को 70 सेमी की ऊंचाई तक कटाई छटाई करनी चाहिए। दूसरे वर्ष तीन से चार शाखाएं 15 से 20 सेमी की दूरी पर रखकर शेष शाखाओं को काट दें। पहली शाखा भूमि से 50 सेमी की ऊंचाई पर होनी चाहिए।
इस प्रकार 3 से 4 वर्ष में पौधा अपना आकार बना लेता है आडू मैं फलत जल्दी आती है तथा एक शाखा एक ही बार फल देती है। अता प्रत्येक वर्ष फल लेने के लिए पर्याप्त मात्रा में नई शाखाओं का आना आवश्यक है। फलतः हमेशा 1 वर्ष पुराने शाखा पर होती है। इसके लिए छटाई करते समय प्रत्येक शाखा के सरे को 20 से 30 सेमी नीचे तक काट दें जिससे निचले भाग से नई शाखाएं निकल सकें।
आडू में स्वपरागण से फल बनते हैं इसमें पर्याप्त फलत होती है आतः कुछ शाखाओं को निकाल लेना चाहिए ताकि अधिक फलत को रोका जा सके साथ ही रोगी और टूटी टहनियों को निकाल देना चाहिए। प्रत्येक वर्ष फूल उत्पन्न होने से पहले कृंन्तन की क्रिया दिसंबर महीने में करना उचित समझा जाता है।

अंतराशस्य एवं आवरणशस्य--बागवानी को प्रारंभिक अवस्था में जब पौधे छोटे होते हैं उस समय कुछ वर्षों तक अंतराशस्य  जैसे--  गाजर, शलजम टमाटर बैगन मूली आदि की फसलें उगा सकते हैं। फलों की तोड़ाई के बाद आडू की बागवानी से प्राय मूंग की फसल आवरण शस्य के रूप में बो दी जाती है। मूंग की फसल को मिट्टी में दवा देने से मृदा में जीवांश पदार्थ तथा नत्रजन की मात्रा बढ़ जाती है।

फूलना व  फलना---
पौधे लगाने की तीन चार वर्ष बाद फूल एवं फल आने आरंभ हो जाते हैं। फल पैदा करने वाली कलियां 1 वर्ष पुरानी शाखाओं के बीच से ऊपर की ओर आती है। एक गांठ पर एक पत्र कलिका तथा दो फूल कलिका पैदा होती है। पके फल किस्म के अनुसार अप्रैल से जून में मिलने लगते हैं।

फलों को तोड़ना तथा बेचना----
फलों को पकाने के समय से कुछ पहले तोड़ना चाहिए क्योंकि पकने के बाद फल शीघ्र खराब होने लगते हैं। फलों को सावधानीपूर्वक पौधों से तोड़ना चाहिए जिससे उनमें कोई चोट ना लग सके। मैदानी क्षेत्र में आडू के फल मई-जून मैं और पहाड़ी क्षेत्र में जून-जुलाई में तैयार होते हैं। फलों की छटाई करके लकड़ी की पेटीओं में भरकर बाहर बाजारों में बिक्री के लिए भेज दिया जाता है।
आडू की पैदावार---
आडू के पौधे तीसरी वर्ष से ही फल देने लगते हैं। जो 25 से 30 वर्ष तक फल देते रहते हैं। एक पौधे से लगभग 50 से 60 किलोग्राम फल मिल सकते हैं। इस प्रकार एक हेक्टेयर क्षेत्र से 200 से 250 कुंतल तक फल मिल सकते हैं।
आडू के बीज में  सुषुप्तावस्था पाई जाती है। बीज को बोलने से पहले उसे एक निश्चित ताप पर पकाते हैं। इस क्रिया को स्तरीयकरण कहते हैं।
आडू मे कीट तथा रोग नियंत्रण
आडू का माहू--- इस कीट का आडू की बागवानी में अधिक प्रकोप होता है। यह कीट पत्तियों और फूलों से रस को चूस कर नुकसान पहुंचाते हैं। जिससे पत्तियां सिकुड़ जाती हैं।इस कीट की रोकथाम के लिए मेटा स्टॉक्स के 0.1 प्रतिशत घोल का पहला छिड़काव  फूल आने से पहले  तथा दूसरा छिड़काव  फल लगने के तुरंत बाद करना चाहिए ।

तना छेदक कीट---- यह किट पेड़ के तने में छेद करते हैं जिससे पौधे कमजोर हो जाते हैं।
रोकथाम----(1) पेट के निचले भाग में पैराडाई क्लोरो बेंजीन का छिड़काव करें।
(2) रवि को क्लोरोफॉर्म क्रियोजोट घोल में भिगोकर छेद में भरकर मिट्टी से बंद कर दें।

फल मक्खी------- यह मक्खी फल के अंदर ही अंडे देती है जिससे मेगेट्स निकलते हैं । यह मेगेट्स फल को अंदर से खाकर नुकसान पहुंचाते हैं।
रोकथाम--- (1) प्रभावित फलों को मैगेट्स सहित नष्ट कर देना चाहिए।
(2) मेटासिस्टॉक्स के घोल का छिड़काव करें।

पर्ण कुंचन रोग---- यह वायरस से होने वाला रोग है जो एफिड्स के द्वारा फैलता है। इस रोग के प्रभाव से पौधे की पत्तियां मुड़ जाती है सामान्य से मोटी तथा खुरदरी हो जाती है जिससे पौधे कमजोर हो जाते हैं और फलों का आकार छोटा रह जाता है।
रोकथाम----(1) प्रभावित पौधों की पत्तियों को शाखा सहित तोड़कर नष्ट कर दें।
(2) एफिड्स के नियंत्रण के लिए मेटासिस्टॉक्स के 0.15% घोल का छिड़काव करें।

आडू अंगमारी-----  यह बीमारी एक कवक द्वारा उत्पन्न होती है जिससे शाखाओं पर छोटे छोटे लाल धब्बे पड़ जाते हैं जो बाद में किंग कर के रूप में बदल जाते हैं तथा संसगिर्त टहनियां सूखने लगती हैं।
रोकथाम---- संसगिर्त  भागों एवं शाखाओं को नष्ट कर देना चाहिए। और रासायनिक दवाओं का छिड़काव करना चाहिए।

शाखाओं का सूखना----- अच्छे जल निकासी की सुविधा ना होने से यह रोग लग जाता है जिसमें तने एवं शाखाओं से गोंद जैसी वस्तु निकलने लगती है तथा शाखाएं सूखने लगती हैं।
रोकथाम----- इसके नियंत्रण के लिए जल निकासी का उचित प्रबंध होने के साथ-साथ ही सिंचाईयॉ नियमित करनी चाहिए तथा मिट्टी की गुड़ाई करते रहना चाहिए।

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