Saturday, 13 June 2020

गाजर की खेती




जड़ वाली फसलों में गाजर एक महत्वपूर्ण फसल है यह लगभग भारतवर्ष के सभी क्षेत्रों में उगाई जाती है अधिकतर इसका उपयोग सब्जी के रूप में होता है और गाजर के अनेक व्यंजन बनते हैं जैसे--- मिठाइयां ,हलवा ,अचार।

पोषक मूल्य----गाजर विटामिन ए का मुख्य स्रोत है इसमें कैरोटीन अधिक मात्रा में पाई जाती है जिसे खाने पर हमारे यकृत में विटामिन ए का निर्माण होता है गाजर पित्त कफ और  बवासीर का नाश करती है। बढ़ती हुई तिल्ली और दस्तो में इसका प्रयोग किया जाता है। 

जलवायु----गाजर शरद ऋतु की फसल है लेकिन इसकी कुछ किस्में गर्मी भी सहन कर लेती हैं। गाजर की जड़ों का रंग तथा विकास तापक्रम से अधिक प्रभावित होता है। 10 से 15 सेंटीग्रेड तापक्रम पर हल्का रंग, 12 से 20 सेंटीग्रेड तापक्रम पर उत्तम रंग, तथा 20से 25 सेंटीग्रेड तापक्रम होने पर रंग कम चमकीला हो जाता है ।अधिक तापक्रम पर जड़ों की लंबाई कम हो जाती है अंकुरण के लिए मिट्टी का तापक्रम 20 से 22 सेंटीग्रेड होना चाहिए।

भूमि----गाजर की फसल सभी प्रकार की मिट्टियों में उगाई जा सकती है परंतु उचित जल निकास वाली गहरी बलुई दोमट भूमि इसके लिए उपयुक्त होती है।

उन्नतशील किस्में---'गाजर की किस्मों को दो भागों में विभक्त किया जाता है--
(1) ट्रॉपिकल किस्म-----
ट्रॉपिकल किस्में वार्षिकी होती है।  इनका ऊपरी भाग चौड़ा और नीचे की ओर पतला होता है वह लाल पीले नारंगी और बैंगनी रंग की होती हैं। यह किस्में उच्च तापमान को सहन करने वाली होती हैं जैसे----
पूसा केसर ,पूसा मेघाली ,सलेक्शन - 233, हाइब्रिड -1

(2) टेम्परेट किस्म---
यूरोपीय किस्म आकार में छोटी , चिकनी और समान रूप से मोटी होती हैं इनका रंग नारंगी होता है । इनकी बुवाई एशियाई किस्मों की अपेक्षा देर से की जाती है जैसे------
इंपरेटर ,नैनटिस, कोरलैस चैनटेनी, गोल्डन हार्ड इंडियन लांग रेड। 
कुछ प्रमुख किस्मों की विशेषताएं------
पूसा मेघाली---यह किस्म 100 से 110 दिन बाद तैयार हो जाती है इसकी जड़ें नारंगी रंग की होती हैं यह किस्म अगस्त से सितंबर में भूलने के लिए उपयुक्त होती है इस किस्म का औसत उत्पादन 250 से 300 कुंतल प्रति हेक्टेयर है। 

पूसा केसर----'यह एक संकर किसमें है । इसकी जड़ें गहरे लाल रंग की और शंक्वाकार होती हैं ,इसका मध्य भाग छोटा और हल्के लाल रंग का होता है । इसे अगस्त से अक्टूबर तक बोया जा सकता है जो लगभग 110 दिन में तैयार हो जाती है। 

नैनटिस-----इस किस्म का ऊपरी भाग छोटा और हरी पत्तियों वाला होता है। इसकी जड़ें 12 से 15 सेमी लंबी बेलनाकार और नारंगी रंग की होती हैं। फसल 90 से 110 दिन में तैयार हो जाती है, यह खाने में अत्यंत स्वादिष्ट होती है । इसकी बुवाई मध्य अक्टूबर से दिसंबर तक की जाती है। 

खेत की तैयारी---'इसके लिए गहरी जुताई की आवश्यकता होती है पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करके 2-3 जुताई कल्टीवेटर से करा कर मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए। 

खाद तथा उर्वरक---गाजर की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए 200 से 250 कुंतल गोबर की सड़ी हुई खाद बीज बोने  के लगभग एक महीना पहले खेत में अच्छी तरह से मिला दें । इसके अतिरिक्त 60 किलोग्राम नाइट्रोजन 50 किलोग्राम फास्फोरस तथा 80 प्रोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से देनी चाहिए । नाइट्रोजन की आधी मात्रा फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा बीज बोने के समय खेत में मिला दिया जाता है। जिससे खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है।

सिंचाई तथा जल निकास-----बीज बोने के बाद क्यारियों को नम रखना तब तक आवश्यक है जब तक अंकुरण ना हो जाए। इसके उपरांत पत्तियों की मोरझान से पहले 8 से 10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए। गाजर की सिंचाई पत्तियों के मुरझाने से पहले करनी चाहिए
खेत में जल निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए जिससे खेत से फालतू पानी को निकाला जा सके। 

बुवाई का समय---
मैदानी भागों में गाजर की बुवाई मध्य अगस्त से सितंबर तक की जाती है। एशियाई किस्में मध्य अक्टूबर तक बोई जाती है जब तापक्रम अधिक होता है जबकि यूरोपियन किस्म अक्टूबर के बाद बोई जाती है। पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी बुवाई मार्च से जून तक की जाती है।

बोने की विधि----गाजर की बुवाई समतल क्यारियों तथा मेड़ों पर की जाती है ।अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए गाजर की बुवाई मेडो पर की जानी चाहिए। लाइन से लाइन की दूरी 45 सेमी तथा पौधे से पौधे की दूरी 8 से 10 सेमी रखी जाती है ,बीज को 1से 2 सेमी गहरा बोना चाहिए। गाजर का अंकुरण 10 से 15 दिन में होता है ।

खरपतवार नियंत्रण----पौधों की प्रारंभिक अवस्था में खेत खरपतवारो से मुक्त होना आवश्यक होता है। जब पौधे 10 से 12 सेमी ऊंचाई के हो जाएं तो निराई करें तथा इसी समय फालतू अधिक पौधों को निकाल देना चाहिए जिससे पौधों में आपस की दूरी 8 से 10 सेमी की हो जाए।
खरपतवार नियंत्रण के लिए स्टांप की 4 लीटर मात्रा को 1000 लीटर पानी में घोलकर अंकुरण से पहले छिड़काव करना चाहिए ऐसा करने पर खरपतवार नहीं उगते है।

खुदाई----जब गाजर के ऊपरी सिरे का व्यास 3 से 4 सेमी तक हो जाए तो गाजर की खुदाई प्रारंभ कर देनी चाहिये। देसी गाजर में ऊपरी शिरे का आकार जब 4 सेमी हो जाए तब खुदाई करें। खुदाई करने से पहले भूमि को थोड़ा सा नम कर ले, जिससे खुदाई में आसानी होती है।

कीट नियंत्रण
(1) कटवर्म---यह कीट रात्रि के समय निकलता है  तथा पौधों को आधार से काट देता है,। और गाजर की गूदे दार जड़ों में छेद कर देता है जिससे उनमें मिट्टी भर जाती है और बाजार में उनका मूल्य बहुत कम हो जाता है।
रोकथाम----
इस कीट के नियंत्रण के लिए 0.1% क्लोरपाइरिफॉस के घोल का छिड़काव करना चाहिए।

(2) पत्ती फुदका ---यह कीट पौधों की मुलायम भाग से रस चूसते हैं। जिसके कारण प्रकाश संश्लेषण की क्रिया कम हो जाती है।
इस कीट के नियंत्रण के लिए मोनो क्रोटोफोर्स का छिड़काव करना चाहिए।

रोग नियंत्रण------
आद्र बिगलन--
यह रोग पिथीयम नामक फफूंदी के कारण होता है। हेलो इस रोग का प्रभाव अंकुरण के समय प्रारंभ हो जाता है और अंकुरित होने वाला बीज अंकुरित होकर भूमि से बाहर नहीं आ पाता और पूरा बीज सड़ जाता है।
रोकथाम---इस रोग के नियंत्रण के लिए बीज बोने से पहले ब्रोसीकोल से 3 किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए।  और फसल में हल्की सिंचाई करें।

जीवाणु मृदु सड़न----
यह रोग जीवाणु कैरोटोवोरा के द्वारा होता है इसरो के प्रभाव से गाजर की जड़ सड़ने लगती है । जिन भूमियों में जल निकास की उचित व्यवस्था नहीं होती वहां पर इस रोग का प्रकोप अधिक देखा जाता है।
रोकथाम---'खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था रखें तथा रोग फैलने पर नाइट्रोजनधारी उर्वरकों का टॉपड्रेसिंग  करें।

बीज उत्पादन-----गाजर का बीज निम्न दो विधियों द्वारा तैयार किया जाता है--
(1) बीज से बीज पैदा करना
(2) जड़ से बीज पैदा करना
पहली विधि में पौधों को जिस स्थान पर उगाते हैं उसी स्थान पर उसमें बीज बनने देते हैं जबकि दूसरी विधि में स्वच्छ एवं अच्छी गाजरो को फरवरी में उखाड़ कर उनका निचला सिरा 10 सेमी काट दिया जाता है फिर पहले से तैयार खेत में निर्धारित दूरी पर लगा देना चाहिए । इसके उपरांत सिंचाई करें दें, कुछ दिनों के बाद इसमें तने निकलने लगते हैं जिसमें फूल व फलियां आती हैं। इन फलियों की कटाई कर बीज प्राप्त किया जा सकता है।

हेलो

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