Tuesday, 9 June 2020

मक्का की खेती की पूरी जानकारी




 मक्का की खेती भारत में  दाने के लिए भुट्टे के लिए  या चारे के लिए की जाती है  मक्का में  10% प्रोटीन , 70.3% कार्बोहाइड्रेट 1.2% खनिज तत्व तथा 1.4% राख पाई जाती है। मक्के में जीन नामक प्रोटीन के अतिरिक्त ट्रिप्टोफेन तथा लाइसिन नामक अनिवार्य अमीनो अम्ल पाए जाते हैं। मक्के की रोटी बनाकर खाई जाती है इसलिए इसका उपयोग शराब, ग्लूकोज एसिटिक अम्ल रंग गोंद प्लास्टिक तथा कागज आदि बनाने में किया जाता है मक्के से लगभग 5% खाद्य तेल निकलता है।




क्षेत्रफल एवं उत्पादन-'-----
विश्व में मक्का की खेती अमेरिका ब्राजील अर्जेंटीना चीन दक्षिण अफ्रीका इटली तथा भारत में की जाती है। विश्व में सर्वाधिक मक्का संयुक्त राज्य अमेरिका में पैदा होती है। भारत में मक्का लगभग 8.26 मिलियन हेक्टेयर पर बोयी जाती है। जिससे कुल लगभग 16 .7 2 मिलियन टन उत्पादन होता है।



मक्का की खेती के लिए आवश्यक जलवायु
मक्का गर्म जलवायु की फसल है इसके अंकुर और वृद्धि एवं विकास के लिए 25 से 28 सेंटीग्रेड तापमान तथा 60 से 70% आपेक्षिक आर्द्रता आवश्यक होती है। मक्का विभिन्न प्रकार की जलवायु सहन करने की क्षमता रखती है इसलिए इसकी अनेक किस्में विकसित की जा चुकी हैं।


भूमि----    अच्छी वृद्धि एवं पैदावार के लिए उपजाऊ दोमट मिट्टी जिसमें समुचित वायु संचार हो और जिस का पीएच मान 6 से 7 हो मक्का की खेती के लिए उपयुक्त होती है। अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए समुचित जल निकास का होना अति आवश्यक है।



फसल प्रणाली------ मक्का के कुछ 1 वर्षीय प्रचलित फसल चक्र निम्न प्रकार--
¤ मक्का -आलू ,       
¤मक्का -आलू -गेहूं -मूंग ,
¤मक्का -गेहूं
¤ मक्का -उड़द -गेहूं
¤ मक्का मूंग गेहूं
¤ मक्का आलू प्याज
¤ मक्का तोरिया गेहूं
¤ मक्का आलू गेहूं
¤ मक्का तेल
¤  मक्का लोबिया गेहूं ।


मक्का की किस्में------   भारत में मक्का की प्रचलित किस्मों को निम्नलिखित तीन भागों में बांटा जा सकता है--
(1)  शंकर मक्का  (2) संकुल मक्का  (3) स्थानीय मक्का


शंकर मक्का की प्रमुख विशेषताएं--
शंकर मक्का में अधिक उत्पादन देने की क्षमता होती है। शंकर मक्का के अनुकूल शक्ति क्षेत्र विशेष के लिए होती है। शंकर मक्का का बीज प्रत्येक वर्ष नया तैयार करना होता है यदि शंकर मक्का की फसल का बीज अगले वर्ष भूतिया जाए तो उसका शंकर आज समाप्त हो जाता है और पैदावार में लगभग 25 से 30% की कमी आ जाती है।



संकुल मक्का की प्रमुख विशेषताएं--
संकुल मक्का का बीज प्रतिवर्ष नया खरीदने की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि इसमें अगले वर्ष बीज बोने पर उपज में कोई विशेष कमी नहीं आती। एक बार लिए गए बीज से लगातार तीन फसलें तक ले सकते हैं। संकुल जातियों में पेत्रको की संख्या अधिक होती है इनकी अनुकूल क्षमता काफी बड़े क्षेत्र के लिए होती है संकुल मक्का बनाने में जातीय संकर ओज का दोहन किया जाता है इसलिए इसकी उत्पादन क्षमता अधिक होती है।


मक्का की नवीन प्रजातियां
संकर मक्का---:  विवेक शंकर ,कोहिनूर ,सीडरैक, प्रताप शंकर , पूसा अति अगेति, विवेक मक्का शंकर, MCH-2, PAC-9703, HM-4, DK-701, K-60, JH -31153 ।


संकुल मक्का-----::  अमर मक्का , नर्मदा मोटी मक्का, जवाहर मक्का -216 , बिरसा विकास मक्का -2, पूसा कम अपोजिट- 4, विवेक संकुल मक्का-35, जवाहर पॉपकॉर्न बीएल बेबी , कॉर्न गोल्डन बेबी । 



खेत की तैयारी----
खरीफ में मक्का बोने के लिए पहली जुताई मिट्टी पलट हल से इसके बाद दो से तीन जुताईयां कल्टीवेटर हैरो या रोटावेटर से करते हैं। प्रत्येक जुताई के बाद नमी संरक्षण के लिए पाटा लगाना आवश्यक है यदि खेत में गर्मी की जुताई संभव हो तो अवश्य करना चाहिए जिससे कीट, रोग कारी जीव तथा खरपतवारओं का नियंत्रण होता है। 


मक्का का बीज------
बीज सदैव प्रमाणित एवं निरोग होना चाहिए। शंकर मक्का का बीज प्रत्येक वर्ष बदलना पड़ता है। जबकि संकुल एवं देसी किस्मों का बीज 3 से 4 वर्ष तक अपने खेत  मे बोया जा सकता है। किंतु ध्यान रखना चाहिए कि संकुल मक्का की किस्म के खेत के पास मैं कोई दूसरी किस्म ना बोई गई हो क्योंकि इससे पर परागण द्वारा बीज के अशुद्ध होने की संभावना बढ़ जाती है।


बीज उपचार-----  बीज को बोने से पहले किसी एक फफूंदी नाशक रसायन जैसे सीरम कैप्टन या कार्बेंडाजिम की 2.5 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर लेना चाहिए।


बोने का समय-'----
उत्तर भारत में मक्का की बुवाई खरीफ में वर्षा प्रारंभ होने पर की जाती है। जून के मध्य से जुलाई के प्रारंभ तक बुवाई चलती रहती है। वर्षा प्रारंभ होने से पहले यदि पलेवा से मक्का की जून के दूसरे सप्ताह तक बुवाई कर दी जाए तो अंकुरण व प्रति इकाई क्षेत्र पौधों की संख्या उपज की दृष्टि से अच्छी रहती है। यह मक्का की बुवाई का सर्वोत्तम समय होता है




दक्षिण भारत आंध्र प्रदेश गुजरात महाराष्ट्र मैसूर कर्नाटक और बिहार जैसे क्षेत्रों में रवि की फसल के लिए भवाई अक्टूबर से नवंबर में करते हैं
वसंत ऋतु में फरवरी से मार्च तक की मक्का की बुवाई की जाती है। शहरों के नजदीक इस फसल को भुट्टो के लिए जाते हैं।
मक्का बोने की विधियां--
(1) हल के पीछे कूड़ों  में--  -- इस विधि से  हल से बनी कूंडो में 15 से 20 सेमी की दूरी पर बीज को बोते हैं।
(2) डिबलर विधि----- इस विधि से पौध अंतरण अर्थात लाइन से लाइन तथा पौधे से पौधे की दूरी निर्धारित करना आसान रहता है। इसलिए यह सर्वोत्तम विधि हो सकती है किंतु इस विधि से बड़े क्षेत्रफल पर बुवाई नहीं की जा सकती है यह अत्यंत खर्चीली विधि है।


(3) छिड़काव विधि-'----'   यह विधि अधिकतर चारे की फसल बोने के लिए अधिक उपयुक्त है। इस विधि से यदि मक्के की बुवाई की जाती है तो पौध अंतरण एक समान नहीं होता तथा बीज की मात्रा अधिक लगती है और कृषि क्रियाएं जैसे निराई गुड़ाई आज से रुकावट पैदा होती है।


खाद तथा उर्वरक देने का समय----
मृदा जाच के आधार पर खाद एवं उर्वरकों का उपयोग करना चाहिए। यदि किसी कारणवश मृदा की जांच ना हो सके तो उस स्थिति में 200 से ढाई सौ कुंतल गोबर की सड़ी खाद 50 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन 30 से 40 किलोग्राम फास्फोरस तथा 30 से 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें। गोबर की खाद बीज बोने की एक महीना पहले खेत में अच्छी तरह से मिला दें नाइट्रोजन की आधी मात्रा फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा बीज बोने की समय खेत में मिला देनी चाहिए।



सिंचाई एवं जल निकास--
मक्का पानी के प्रति अत्यंत संवेदनशील फसल है खेत में नमी की कमी में यह मुरझाने लगती है जबकि नमी की थोड़ी सी अधिकता में यह पीली पड़ने लगती है इसलिए इसमें उचित नमी का विशेष ध्यान रखना पड़ता है।
खरीफ मक्का में वर्षा प्रारंभ होने से पहले अर्थात जून में बोई गई फसल मैं 10 से 15 दिन पर 2 से 3 सिंचाई या की आवश्यकता पड़ती है किंतु वर्षा प्रारंभ होने पर बोई गई फसल में सामान्यतः सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती सूखा पड़ने पर एक सिंचाई की आवश्यकता पड़ सकती है।


निराई गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण--
मक्का की फसल में निराई गुड़ाई का बहुत महत्व है खेत को सदैव खरपतवारो से मुक्त रखने के लिए मक्का में 2 से 3 निराई गुड़ाई खुरपी से करते हैं। गुड़ाई कभी भी अधिक गहरी नहीं करनी चाहिए जिससे फसल की जड़े कटने का डर रहता है दूसरी निराई गुड़ाई के समय पौधों पर हल्की मिट्टी भी चढ़ा देनी चाहिए।
खरपतवार नियंत्रण के लिए इमेजिन नामक रसायन की 1.5 किलो ग्राम मात्रा को 1000 लीटर पानी में घोलकर बुवाई के तुरंत बाद किंतु फसल के अंकुरण से पहले इसका छिड़काव एक हेक्टेयर की दर से खेत में करना चाहिए। इससे अधिकांश फसल के 1 वर्षीय घास वह चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार नष्ट हो जाते हैं छिड़काव के समय खेत में नमी का होना अत्यंत आवश्यक है।


मक्का की देखभाल-----  
मक्का की फसल को विशेष रूप से भुट्टे में दाना बनने पर, दिन में चिड़ियों द्वारा हानि पहुंचने प्रारंभ हो जाती है और रात के समय जंगली जानवरों से हानि पहुंचती है।  इन दिनों में फसल की रखवाली करना बहुत ही आवश्यक है।


मक्का की कटाई एवं मड़ाई--
मक्का की देसी किस्में 70 से 80 दिन में तथा शंकर व संकुल किस्में 90 से 120 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है जबकि चारे वाली फसल 60 से 70 दिन में तैयार हो जाती है। दाने के लिए फसल की कटाई तब की जाती है जब भुट्टे को ढकने वाली पत्तियां पीली पड़ने लगती है तथा भुट्टे के ऊपर धागे या सिल्क भूरे रंग की हो जाएं और पूरा पौधा पीला पड़ जाए इस समय दाने में लगभग 25 % नमी रह जाती है।


फसल को मोटे सहित जमीन से हंसी आया दरांती से काट लेते हैं इसके बाद में भुट्टा तोड़ कर अलग कर लेते हैं इसके पश्चात डंठल को सुखाकर एवं बंडल बनाकर छाया में रख दिया जाता है और भुट्टे को दाना निकालने की मशीन से दाना अलग कर धूप में सुखा लिया जाता है।



मक्का के प्रमुख कीट रोग तथा उनका नियंत्रण-
तना बेधक कीट---   इस कीट की सुरिया लारवा पौधों को हानि पहुंचाते हैं यह पहले पत्तियों मैं छोटे-छोटे छिद्र बनाता है फिर पत्तियों के सहारे यह तने में प्रवेश कर जाता है इसके प्रकोप से नई पत्तियां सूख जाती हैं और अधिक प्रकोप होने पर यह भुट्टो के दानों को भी खा जाते हैं।


नियंत्रण विधि------  बुवाई के 15 से 20 दिन पर 1.5 लीटर एंडोसल्फान को लगभग 800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करे

फुदके---    इस कीट के शिशु तथा प्रौढ़ दोनों पत्तियो को खा                        जाते हैं।
उपाय-----   इसके नियंत्रण के लिए लिंडेन 1.3% का पाउडर या एल्डरिन 5% धूल की 25 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से बुर्काव करना चाहिए ।


पत्ती लपेटक  कीट-''--------  यह फसल में कम संख्या में लगता है किंतु कभी-कभी खतरनाक रूप धारण कर पत्तियों को अंदर ही अंदर खा जाता है।
उपाय----     एंडोसल्फान 35 ई सी की 1 लीटर मात्रा को 800 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करना चाहिए।


वालदार सूँडी----  इसका शरीर बालों से ढका होता है । यह भुट्टे की रेसिपी धागे खा जाते हैं।
उपाय-----  एंडोसल्फान दवा का छिड़काव करना चाहिए।


बीज सड़न तथा पौध का झुलसा रोग-
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बीज सड़ जाते हैं अंकुरण कम होता है और पौधे मरने लगते हैं।
उपाय----  उपचारित बीज का प्रयोग करें थीरम य कैप्टान से बीज को उपचारित करना ।



रोमल फफूंदी रोग----  पर्णहरिम का हास होने से पत्तियों पर धारियां पड़ जाती हैं प्रभावित हिस्सों में सफेद रुई जैसे रेशे नजर आते हैं पौधे छोटे होते हैं कई कई भुट्टे निकलते हैं।
उपाय------  2-3 छिड़काव इंडोफिल एम 45 के खड़ी फसल पर करें।


पत्तियों का झुलसा--
यह अंडाकार लंबे-लंबे भूरे रंग के धब्बे पत्तियों के निचले हिस्से में ज्यादा, कभी-कभी पौधा झुलसा-सा दिखाई देता है लाली लिए हुए भूरे रंग की समानांतर धारियां जिनमें 2.5 से 40 सेमी के गोलाकार धब्बे दिखाई देते है।
उपाय---  रोग रोधी किस्में बोनी चाहिए। इंडोफिल -45 का 0.3 % छिड़काव लक्षण देखते ही प्रारंभ करना चाहिए तथा भुट्टे निकलने तक प्रत्येक सप्ताह करना चाहिए।




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