Saturday, 13 June 2020

टमाटर की उन्नत उत्पादन तकनीक की खेती





 जलवायु--
टमाटर के लिए सम जलवायु अच्छी होती है। यों तो टमाटर वर्ष में दो बार उगाया जाता है। सर्दी के मौसम में सितम्बर से मार्च और जनवरी से जुलाई अगस्त। तापमान की बात की जाए तो 25_35° तापमान तक टमाटर का सही उत्पादन होता है। ज्यादा गर्मी होने पर टमाटर के पौधे पर फल आना बंद हो जाता है। आजकल कुछ संकर किस्म ( हाइब्रिड) के टमाटर गर्मियों में भी फल देते रहते है। अगर आप छत पर गमलों में टमाटर उगाने की सोच रहे है। तो टमाटर का गमला ऐसी जगह रखें जहां दोपहर की तेज धूप पौधे पर ना पड़े। 



भूमि--- 
टमाटर की खेती लगभग सभी प्रकार की भूमियों में की जा सकती है जो उर्वर हो, जीवांश  पदार्थयुक्त हो, तथा जिनमें जल निकाल का प्रबंध हो लेकिन इसके लिए सबसे उपयुक्त भूमि बलुआ और दोमट होती है अगेती जातियों की बुवाई के लिए मिट्टी और दोमट टमाटर की खेती के लिए उपयुक्त होती है मिट्टी का पीएच मान 6 से 7 के माध्यम होना चाहिए।

गमलें के लिए मिट्टी -
 गमले में टमाटर उगाने के लिए ऐसी मिट्टी की तैयारी करें जिसमें बरसात का पानी आसानी से बाहर निकल जाए इसके लिए आपको मिट्टी भुरभुरी बनानी होगी गमले में अच्छे टमाटर आए इसके लिए मिट्टी में कुछ मात्रा में जैविक खाद जरूर मिला लें जिससे पौधों की उचित ग्रोथ हो सके और आपको सही उत्पादन मिल सके।

साधारण मिट्टी - 70%
खाद -30%


खेती की तैयारी----- टमाटर के लिए भूमि की अच्छी तैयारी की आवश्यकता होती है । पहली जुताई मिट्टी पलट हल से कर के तीन से चार जुताई देसी हल से जुताई के बाद पाटा लगा दे जिससे मिट्टी भुरभुरी हो जाए खेत की तैयारी के बाद उचित क्यारियां तथा सिंचाई के लिए नालियां बना लें।

बीज की दर-- एक हेक्टेयर खेती की रोपाई के लिए 400 से 500 ग्राम बीज की आवश्यकता होती है।


खाद तथा उर्वरक--- टमाटर की खेती  में टमाटर की अच्छी पैदावार लेने के लिए पोषण तत्वों की संतुलित मात्रा में आवश्यकता पड़ती है मृदा जाॅच के उपरांत खाद एवं उर्वरकों का उपयोग आर्थिक दृष्टि से उपयुक्त रहता है मृदा जांच  ने होने की अवस्था में सामान्य रूप से निम्न पोषक तत्व का उपयोग किया जाना चाहिए-- 
गोबर की खाद रोपाई के लगभग 1 माह पूर्व खेती की तैयारी करते समय खेत में अच्छी तरह मिला देनी चाहिए नाइट्रोजन की आधी मात्रा फास्फोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा का मिश्रण पौधों रोपने से पहले 8 से 10 सेमी गहरे गहरे कूॅड में डालना चाहिए जो कि पौधे की कतारों से लगभग 8 से 10 सेमी की दूरी पर रहे नाइट्रोजन की मात्रा को दो बराबर भागों में बांटकर एक भाग रोपाई के 20 से 25 दिन बाद तथा दूसरा भाग फूल आने के समय में डालें । बोरेक्स तथा जिंक सल्फेट की पूरी मात्रा को अंतिम जुताई के समय खेत में मिला दे। बोरेक्स को देने से टमाटर के फल फटते नहीं है और उच्च गुणों वाले फल प्राप्त होते है।




पौधे तैयार करना--- टमाटर की खेती में टमाटर के पौधे तैयार करने के लिए जमीन की सतह से 15 से 20 सेमी ऊंची ऊंची क्यारियाॅ बनाते हैं। क्यारी की लंबाई आवश्यकतानुसार तथा चौड़ी सामान्यत 1 मीटर रखें और बीज की बुवाई पंक्तियों में करें । बीज को जमीन में 1 . 5 से 2 .0 सेमी गहरा बोते है। बुवाई के बाद ऊपरी सतह पर सड़ी हुई गोबर खाद की पतली सी परत बिछा कर समतल कर लेते हैं क्यारी को धूप एवं तेज बरसात ठंड से बचने के लिए घास फूस से ढक देते हैं तथा हजारे या फुहारे सिंचाई करते हैं जब बीज पूर्ण रूप से अंकुरित हो जाते हैं तब ऊपर से घास फूस की परत को हटा दिया जाता है पोधे 1 सप्ताह के हो जाएं तो उन पर इंडोफिल  दवाई की 2 ग्राम मात्रा को प्रति लीटर की दर में पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए ।संकर किस्में के पौधे पर कभी कभी पत्तियां सुरंग बनाने वाले कीट का प्रकोप होता है इसके नियंत्रण के लिए मोनोक्रोटोफॉस दवा की दो मिली मात्रा को प्रति लीटर की दर में पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। पौधो को कठोरता प्रदान करने के  उद्देश्य से पौधे निकालने से 3 से 4 दिन पहले से सिंचाई बंद कर देनी चाहिए पौधे को कठोर बनाने के लिए400 पी०पी० एम० को सोडियम क्लोराइड  के घोल का छिड़काव भी उपयुक्त रहता है।


रोपण विधि--- नर्सरी से जब पौधे 6 से 7 पत्ती के हो जाएं या जो पौधे की ऊंचाई 15 से 20 सेमी की हो तब उनको रोपड के लिए उपयुक्त समझना चाहिए । रोपड़ के लिए 60 सेमी चौड़ी तथा जमीन की सतह से 20 सेमी ऊंची ऊंठी हुई क्यारियाॅ बनाई जाती है जिनके दोनों तरफ 20 सेमी चौड़ी नाली होती है। इन्हीं क्यारियां मैं दोनों तरफ 30 सेमी की दूरी पर पौधे की रोपाई की जाती है पौधे की रोपाई के बाद नालियों की हल्की सिंचाई कर देते हैं जिससे पौधे अच्छी तरह स्थापित हो जाएं।  बरसात की फसल की रोपाई ऊंचे थारले या मेड़ों पर करना अच्छा रहता है। इससे पौधे बरसात में पानी की अधिकता से मरते नहीं । सामान्यत सीमित बढबार वाले वृक्षों के लिए पौधे से पौधे की दूरी 45 सेमी रखी जाती है और पंक्तिि से पंक्ति की दूरी  75 सेमी रखी जाती है।



सिंचाई तथा जल निकास----- टमाटर की खेती के लिए टमाटर की फसल में सिंचाई बहुत ही सावधानी पूर्वक करने की आवश्यकता होती है इसकी उचित समय पर सिंचाई करना बहुत ही आवश्यक होता है इसके अधिक सिंचाई तथा कम सिंचाई दोनों ही हानिकारक है इसके लिए यह आवश्यक है कि भूमि में सामान्यत नमी सदैव होनी चाहिए इस प्रकार टमाटर की जमीन की फसल एवं जाडे की फसल में सिंचाई 10 से 15 दिन के अंतर पर करनी चाहिए तथा स्केट फसल एवं गर्मी की फसल में सिंचाई 7 से 10 दिन के अंतर पर करनी चाहिए। लंबे अंतराल के बाद गहरी सिंचाई करने पर टमाटर के फल फट जाते हैं। खेत में उचित जल निकास की व्यवस्था होनी चाहिए  ताकि अधिक समय तक खेत में पानी ना भरा रहे । आवश्यकता  से अधिक पानी को खेत से बाहर निकाल देना चाहिए।



               
               टमाटर की खेती से मुनाफा कैसे लें

टमाटर के फलों का उत्पादन----टमाटर के फलों का अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए दो से चार सोडियम साल्ट की 5 पीपीएम गो लगा रोपाई के 40 से 50 दिन बाद छिड़काव करने पर पैदावार में लगभग 50% की वृद्धि हो जाती है और पौधों पर फल भी जल्दी आ जाते हैं और फसल भी जल्दी पककर तैयार हो जाती है। पैरा क्लोरोफिनाॅक्सी एसिटिक एसिड के 15 पीपीएम का छिड़काव करने से फलों की संख्या में बहुत अधिक वृद्धि होती है।

टमाटर के फटने का कारण तथा उपचार

कारण(1) लंबे समय के बाद ज्यादा सिंचााई करना । 
(2)  मिट्टी में बोरान तत्व की कमी। 
(3)  तापमान में अधिक उतार चढ़ाव।
(4) कुछ किस्म के फल अनुवांशिक रुप से फटते हैं।

उपचार--  फसल की नियमित रुप से हल्की सिंचाई करें। मिट्टी जांच के उपरांत खेत में बुक्स मिलाए या फल लगाते समय बोरेक्स के घोल का फसल पर छिड़काव करें। टमाटर के पौधों के साथ टेक लगाएं, टमाटर की ऐसी किस्मो को उगाए जिनके फल नहीं फटते हो।

टमाटर की तुडाई---टमाटर के फल की तुड़ाई इस बात पर निर्भर करती है कि फल को कहां भेजना है। और किस रुप में उपयोग करना है।
इसके फलों की तोड़ाई विभिन्न अवस्था में की जाती है।
अधिक दूरी के बाजार को भेजने के लिए। स्थानी बाजारों के लिए। घर के पास सब्जियों के तुरंत प्रयोग के लिए टमाटर की पकी हुई अवस्था में अचार एवं डिब्बो मैं बंद करने के लिए।

टमाटर में मुनाफा-----
फलों को तोड़ने के बाद कटे फटे गले व छति ग्रस्त फलों को निकालकर अलग कर देना चाहिए इसके बाद टमाटर की ग्रेडिंग यानी छटाई कर के टोकरी में सजाकर बाजार में भेजें जिससे बाजार से अधिक मुनाफा प्राप्त कर सके।


रोग नियंत्रण---टमाटर की फसल में लगने वाली प्रमुख बीमारियों के लक्षण तथा उनकी रोकथाम का वर्णन---

अगेती झुलसा----'यह रोग ऑल्टरनेरिया सोलेनाई नामक  फफूंद के द्वारा होता है इस रोग का लक्षण सबसे पहले पुरानी पतियों पर छोटे-छोटे गोल एवं काले रंग के धब्बो के रूप में दिखाई पड़ता है। प्रभावित पत्तियां पीली पढ़कर सूख कर गिर जाती है।

पपीता उगाने की पूरी जानकारी

रोकथाम----
बुबाई से पहले बीज को थीरम नामक दवा से उपचारित करे।
इंडोफिल एम 45 की 2 ग्राम मात्रा को प्रति लीटर की दर से पानी में घोलकर छिड़काव करें। कॉपर ऑक्सिक्लोराइड की 3 ग्राम मात्रा को प्रति लीटर की दर से पानी में घोलकर छिड़काव करें।


पछेती झुलसा------यह रोग फाइटोप्थोरा प्रजाति के  फफूंद के द्वारा होता है। इस बीमारी से पत्तियों के किनारे पर हल्के नीले भूरे धब्बे बन जाते हैं शुरू में धब्बे मठमैले भूरे रंग के तथा बाद में काले रंग के हो जाते हैं। ठंडे और नम मौसम में यह धब्बे पत्तियों पर तेजी से बढ़ने लगते हैं।
रोकथाम-----डाइथेन m-45 के 0.25 प्रतिशत घोल का 10-15 दिन के अंतर पर दो से तीन छिड़काव करें।


पण॔कुंचन(चित्ती रोग)----उत्तर भारत की मैदानी क्षेत्रों में बरसात में लगाई गई टमाटर की फसल की यह प्रमुख बीमारी है जो सफेद मक्खी के द्वारा फैलती है रोग ग्रस्त पौधों की पत्तियां सिकुड़कर मुड जाती हैं पत्तियां खुरदरी एवं मोटी हो जाती है इस रोग से प्रभावित पौधे छोटे और गाड़ी नुमा हो जाते हैं ।


रोकथाम------(1) रोग ग्रस्त पौधों को उखाड़ कर जला दें या मिट्टी में दबा दें।
(2) रोग वाहक कीट सफेद मक्खी के नियंत्रण के लिए मोनोक्रोटोफॉस दवा की 2 मिलीलीटर मात्रा को प्रति लीटर की दर से पानी में घोलकर 15 दिन की अंतराल पर छिड़काव किया जाए।


 टमाटर मे जीवाणु उकटा रोग---यह रोग राल स्टोरियां सोलेनासीएरम नामक जीवाणु के कारण होता है इस रोग की मुख्य पहचान है कि पत्तियां बिना पीली हुए पूरा पौधा मुरझा जाता है और नीचे गिर जाता है यदि तने को काटकर उसे दबाया जाए तो जीवाणु का हरा पीला पदार्थ निकलता है।

रोकथाम----
(1) सदैव रोगमुक्त पौधों की रोपाई करें।
(2) निरोगी किस्मों को उगाएं।
(3) क्लोरोपिक्रिन रसायन से मिट्टी को उपचारित करें।


टमाटर मे कीट नियंत्रण

फल छेदक कीट-----इस कीट की  मादा नई पत्तियों पर अंडे देती है जिसके लारवा निकलते हैं यह लारवा पौधों की पत्तियां तथा फलों को खा कर नुकसान पहुंचाते हैं फलों पर आक्रमण के समय लारवा का आधा शरीर फल के अंदर तथा आधा फल के बाहर होता है फलों में छेद कर देने से फल की गुणवत्ता खराब हो जाती है।
रोकथाम----
(1) पौधे पर फूल आने की समय सुमिसीडीन  का 0.15% घोल का 10 -15 दिन के अंतर पर छिड़काव करें।
(2) एक लिटर मेलाथियान 50 ईसी 600 लीटर पानी में घोलकर फल के आने के समय छिड़काव करें।

सफेद मक्खी----'यह कीट टमाटर की फसल को दोहरा नुकसान पहुंचाता है एक  तो पौधे की कोमल पत्तियों के रस को चूसकर दूसरा चिट्ठी रोग के विषाणुओ का संचरण करके। इस कीट का प्रकोप गर्मियों में अधिक देखा गया है।

रोकथाम---इस कीट के नियंत्रण के लिए ट्राईजोफॉस के  0.05% घोल का छिड़काव करना चाहिए।
जैसिड,माहू पत्ती खाने वाली सूंडी, मीलीबग आदि कीटों का प्रकोप भी टमाटर की फसल पर होता है।



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