Friday, 31 July 2020

कैसे करे धान की खेती

कैसे करे धान की खेती


धान विश्व की सर्वाधिक महत्वपूर्ण अन्य वाली फसल है। विश्व की आधी से अधिक जनसंख्या का प्रमुख भोजन चावल है। भारत में कुल कृषि क्षेत्रफल के लगभग एक तिहाई भाग पर धान की खेती की जाती है। भारत में इसकी खेती प्राचीन काल से होती आ रही है। प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में इसका अनेक बार वर्णन किया गया है इसका प्रयोग प्राचीन काल से आज तक शुभ अवसरों पर अक्षत के रूप में प्रयोग होता आया है। चावल में 8% प्रोटीन, 73% स्टार्च,2.2 % बसा,11.8 % सेल्यूलोज पाया जाता है।


धान के लिए आवश्यक जलवायु

धान की फसल के लिए नमी युक्त गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है इसकी वृद्धि एवं विकास के लिए 20 से 35 सेंटीग्रेड तापमान होना चाहिए। इसकी खेती के लिए 130 से 150 से मी औसत वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र अधिक उपयुक्त होते हैं।


धान के लिए उपयुक्त मिट्टी

धान की खेती के लिए भारी दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है यह विभिन्न प्रकार की मिट्टियों में जैसे--- चिकनी हल्की दोमट, दोमट , कंकरीली तथा क्षारीय मिट्टी में उगाया जाता है। किंतु पर्याप्त जीवांश पदार्थ वाली ऐसी मिट्टियां जिनकी जल धारण क्षमता अधिक हो धान के लिए अच्छी होती है।


धान की नवीनतम प्रजातियां

उन्नत प्रजातियां---  नरेंद्र  ऊसर-3, विवेक धान-62, वसुंधरा भवानी, दीप्ति, श्रावणी, सूर्या ,नीरजा ,भागीरथी, पूसा सौगंध पवित्र ,पंचमी, RH-204, हजारी धान, मालवीय बासमती , भूतनाथ, VL धान-65,चंद्रहासिनी ,शुष्क सम्राट ,MTU-1075

संकर धान की प्रजातियां----- अजय, हरियाणा संकर धान-1, राजलक्ष्मी , इंदिरा सोना,PA-103, HRI-120, पूसा HR-10,

धान की खेती के प्रकार

धान की खेती दो प्रकार से की जाती है-

धान की पौध की रोपाई विधि-


रोपाई के लिए पौध तैयार करना--
- धान की पौध उपजाऊ तथा जल निकास वाले ऐसे खेत में डालनी चाहिए जो कि सिंचाई के स्रोत के पास हो। एक हेक्टेयर क्षेत्रफल की रोपाई करने के लिए धान की महीन चावल वाली किस्मों का 30 किलोग्राम मध्यम दाने वाली किस्मों का 40 किलोग्राम और मोटे दाने वाली किस्मों का 50 किलोग्राम बीज की पौध तैयार करने की आवश्यकता होती है। एक हेक्टेयर में रोपाई करने के लिए लगभग 500 से 600 वर्ग मीटर में नर्सरी डालनी चाहिए।
धान की पौध तैयार करने के लिए जया, पंत धान-4, आई आर-8, जैसी मध्यम देर से पकने वाली किस्मों को मई के अंत या जून के शुरू में ही नर्सरी में बो देना चाहिए। जल्दी पकने वाली किस्मों जैसे-- गोविंद, साकेत -4, रत्ना आदि की बुवाई 10 से 15 जून के आसपास करनी चाहिए। नर्सरी में 100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50 किलोग्राम फास्फोरस प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए।
बुवाई के 10 से 15 दिन बाद खैरा रोग तथा सफेदा रोग के लिए छिड़काव अवश्य करना चाहिये। खैरा रोग के लिए 5 किलोग्राम जिंक सल्फेट का 20 किलोग्राम यूरिया का या 2.5 किलोग्राम बुझे हुए चूने के साथ 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर नर्सरी में छिड़काव करना चाहिए। नर्सरी में लगने वाले कीट से बचाव के लिए 1 लीटर सुमिथियान 55 ई सी या 1 लीटर एंडोसल्फान 35 ईसी का 600 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रत्येक 2 ईयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।


धान की पौध तैयार करने की दो प्रमुख विधियां हैं--


भीगी विधि--- इस विधि द्वारा पौध तैयार करने के लिए खेत में पानी भरकर दो या तीन बार जुताई करते हैं जिससे मिट्टी लेहे युक्त हो जाए और खरपतवार नष्ट हो जाए। आखरी जुताई के बाद पाटा लगाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए। 1 दिन बाद जब मिट्टी की सतह पर पानी ना रहे तब खेत को 1 मीटर चौड़ी तथा 8 मीटर लंबी क्यारियाॅ बनाते  हैं। जिससे बुवाई, निराई सिंचाई तथा आदि क्रियाएं आसानी से की जा सके। बीज की दर प्रत्येक क्यारी में जया, आई आर-8 हाथी मोटे दाने वाली किस्मों में 800 ग्राम रत्ना, साकेत-8, गोविंद आज पतले दानों वाली किस्मों में 600 ग्राम रखना चाहिए। बोने से पहले 10 वर्ग मीटर क्षेत्र की दर से 250 ग्राम यूरिया तथा 500 ग्राम सुपर फास्फेट अच्छी तरह मिला देना चाहिए।
अंकुरित बीजों को समान रूप से बिखेर कर बोना चाहिए। वर्षा के कारण अगर बीज पानी में डूब जाए तो अनावश्यक पानी निकाल देना चाहिए।

शुष्क विधि---  अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में शुष्क विधि अपनानी चाहिए। इसमें खेत को शुष्क अवस्था में तैयार करते हैं। तीन चार बार जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बना लिया जाता है।
खेत को समतल करके भीगी विधि मैं दिए गए आकार के अनुसार 20 सेमी ऊंची क्यारियां बनाने चाहिए तथा मेल की जगह 30 सेमी चौड़ी नाली बनानी चाहिए। सूखा बीज 10 सेमी की दूरी पर लाइनों में 2 सेमी गहरा वह देना चाहिए। बीज खाद आदि की मात्रा भीगी विधि के अनुसार ही प्रयोग करनी चाहिए।

डेपोग विधि----  यह विधि फिलीपींस में प्रचलित है। इस विधि की विशेषता यह है कि पौधे को बिना मिट्टी के माध्यम से उगाया जाता है। थोड़ा अंकुरित होकर के बीजों को लगभग आधा सेमी मोटी परत को केले के पत्ते, पॉलिथीन की चादर अथवा सीमेंट के फर्श पर बिछाकर उसमें प्रतिदिन पानी देते रहते हैं। ऐसे चिड़ियों के बचाव से दूर रखा जाता है। पौधे को तैयार करने में किसी भी उर्वरक अथवा खाद की आवश्यकता नहीं पड़ती है। यह पौध 2 सप्ताह में तैयार हो जाती है। इस विधि द्वारा पौधे उगाने में श्रम एवं समय दोनों की बचत होती है।

धान की रोपाई

खेत की तैयारी--- धान की पौध की रोपाई करने से पहले खेत में पानी भर कर दो या तीन बार पडलर चलाना चाहिए, जिससे मिट्टी मुलायम तथा लेहयुक्त हो जाए। इसके बाद पाटा चलाकर खेत को समतल कर लिया जाता है। इसके बाद उर्वरकों को मिश्रण बनाकर खेत में समान रूप से बिखेर कर उसमें पडलर चलाकर 15 सेमी की गहराई तक मिट्टी में अच्छी तरह से मिला देते हैं जिसके कारण उर्वरकों का विशेष रूप से नाइट्रोजन कॉलेज बहुत कम होगा।
धान की पौध को रोपाई से पहले खेत में अच्छी प्रकार से लेह लगाना या कीचड़ करना अति आवश्यक होता है निम्नलिखित लाभ होते हैं--
(1)- इससे खेत में पानी का रिसाव बहुत कम हो जाता है और पानी की बचत होती है।
(2)- खेत में खरपतवार तथा कीड़े नष्ट हो जाते हैं।
(3)- पौध के कल्ले अधिक संख्या में निकलते हैं।


रोपाई का समय एवं पौध की उम्र
मध्यम अवधि की बोनी उन्नतशील प्रजातियों की 20 से 25 दिन आयु की पौध रोपाई के लिए उपयुक्त रहती है। देशी तथा देर से पकने वाली प्रजातियों की 30 से 35 दिन की पौध रोपाई के लिए उपयुक्त रहती है। ऊसर भूमि में रोपाई के लिए कम से कम 35 दिन की पौध प्रयोग करनी चाहिए। इससे कम उम्र की कोमल पौध प्रयोग करने से भूमि में उपस्थित लवणों के कारण पौध जलकर नष्ट हो जाती है।

● पौध रोपाई की दूरी व गहराई--
बोनी प्रजातियों की पौध की रोपाई 3 से 4 सेमी अधिक गहराई पर नहीं करनी चाहिए अन्यथा कल्ले कम निकलते हैं और फसल देर से पकती है जिसके फलस्वरूप उपज में कमी आ जाती है। पौध की रोपाई करते समय खेत में हल्का पानी होना चाहिए। साधारण उर्वरा शक्ति वाली भूमि में पंक्तियों वा पौधों की दूरी 20 × 10 सेमी तथा अधिक उर्वर भूमि में 20 ×15 सेमी रखें। साधारण दशा में एक स्थान पर दो से तीन पौधे रोपने चाहिए। यदि रोपाई में देर हो जाए तो एक स्थान पर 3 से 4 पौधे लगाने चाहिए। यदि रोपाई कतारों में करना संभव ना हो तो प्रति वर्ग मीटर क्षेत्र में कम से कम 50 स्थानों में पौधों की रोपाई की जानी चाहिए अन्यथा पौधों की संख्या कम रह जाएगी।

खेत में सीधे बीज की बुवाई विधि-
कूडो में सीधे शुष्क बीज की बुवाई के लिए 90 से 110 दिन वाली प्रजातियों का ही चुनाव करना चाहिए। खेत में पलेवा करके या पहली वर्षा होने पर मध्य जून से जुलाई के प्रथम सप्ताह के बीच खेत की तैयारी करके 50 से 60 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से ली सैनी की दूरी पर बनी 4 सेमी गहरे कूडो मैं उपचारित बीज की बुवाई कर देनी चाहिए। उर्वरकों को खेत की तैयार बुवाई के समय ही कूडों में देना चाहिए। बाद में आवश्यकतानुसार सिंचाई या खरपतवार नियंत्रण करते रहना चाहिए।

सिंचाई अथवा जल प्रबंध---
धान की फसल को कुछ विशेष अवस्थाओं में रोपाई के बाद 1 सप्ताह तक अंकुरण फूटने तथा दाना भरते समय पानी की अधिक आवश्यकता होती है। इस समय खेत में 4 से 5 सेमी पानी भरा होना चाहिए। यदि वर्षा के अभाव के कारण पानी की कमी दिखाई दे तो सिंचाई अवश्य करनी चाहिए। कल्ले निकलने के समय खेत में 5 सेमी से अधिक पानी भरा रहना भी फसल के लिए हानिकारक होता है अतः जिन खेतों में पानी भरा रहता हो वहां जल निकासी का उचित प्रबंध होना चाहिए।

खाद तथा उर्वरक

धान की फसल नाइट्रोजन को अमोनिया रूप में प्राप्त करती है इसमें नाइट्रेट उर्वरकों का प्रयोग ना कर अमोनीकल उर्वरकों जैसे-- यूरिया तथा अमोनिया सल्फेट का प्रयोग करना चाहिए। फास्फोरस को सुपर फास्फेट तथा पोटाश को पोटेशियम सल्फेट के रूप में देना अच्छा होता है। इसके अतिरिक्त कंपोस्ट खाद या गोबर की खाद धान में प्रयोग करना सबसे अच्छा माना गया है इसके अतिरिक्त खलिया तथा सनई या ढैंचा की हरी खाद का प्रयोग लाभदायक होता है इसके अतिरिक्त धान के खेत में टालीपोट्रिक्स नामक नील हरित काय के प्रयोग
से 20 से 30 किलोग्राम नाइट्रोजन की प्रति हेक्टेयर बचत हो जाती है।

धान की निराई गुड़ाई --- 
खरपतवारो की समस्या ऊंची मिट्टी तथा सीधी धान बुवाई वाले खेतों में अधिक होती है जबकि लेह युक्त रोपाई वाले खेतों में यह समस्या कम होती है। ऊंची भूमियों में पहेली निराई गुड़ाई खुरपी आदि यंत्रों की सहायता से बुवाई के 20 से 25 दिन पर करनी चाहिए तथा दूसरी निराई गुड़ाई 40 से 45 दिन बाद करनी चाहिए।

कटाई तथा मड़ाई----
बालियां निकलने के 25 से 30 दिन बाद धान की लगभग सभी किस्में पक जाती हैं। जब दाने सख्त हो जाएं तो कटाई कर लेनी चाहिए। इस समय दाने में लगभग 20% नमी होती है कटाई से 15 दिन पहले सिंचाई बंद कर देनी चाहिए।
आज भी अधिकतर किसान धान को डंडे से पीटकर ही जाने निकालते हैं जबकि अब पैर से चलाए जाने वाले तथा शक्ति चालित यंत्र उपलब्ध हैं जिनकी क्षमता पुराने तरीकों से बहुत अधिक है। अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान ने ढोल के आकार का एक शक्तिशाली यंत्र बनाया है यह यंत्र मंडई तथा ओ साई दोनों ही क्रियाएं एक साथ करता है अतः हमें इसका प्रयोग करना चाहिए।

धान की पैदावार-- 
धान के विभिन्न  किस्मों की पैदावार अलग-अलग है। नई बोनी किस्मों में औसतन 40 से 60 कुंतल धान प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त होती है और देसी किस्मों की अच्छी खेती किए जाने पर 25 से 30 कुंतल प्रति हेक्टेयर पैदावार प्राप्त होती है। इसे ध्यान से लगभग 60 से 65% तक चावल प्राप्त हो जाता है।

धान के प्रमुख कीट

पत्ती लपेटक--- इस कीट की सुड़ियां पति के दोनों किनारों को जोड़कर नालीनुमा रचना बनाकर पत्ती को अंदर से खाती रहती है जिससे उसमें सफेद धारियां बन जाती हैं।
इस कीट की रोकथाम के लिए एंडोसल्फान 35 ई• सी• कि 1 लीटर मात्रा को 600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए ।

● सैनिक कीट------ इनकी सुड़ियां दिन में किल्लो में अथवा मिट्टी की दरारों में छुपी रहती हैं तथा रात में पत्तियों को अथवा बाली निकलने पर उनको काट कर गिरा देती हैं।
इस कीट की रोकथाम के लिए एंडोसल्फान 35 ई सी की उपरोक्त मात्रा का छिड़काव करना चाहिए।

●  गंन्धी बग----- इसे कीट के शिशु तथा प्रौढ़ बाली की दूधिया अवस्था में रस चूस लेते हैं। जिससे दाने नहीं बनते अगर दाने बनते हैं तो वह कठोर हो जाते हैं।
रोकथाम---- खेत खरपतवार मुक्त होना चाहिए तथा फूल आने के बाद मेलाथियान 5% की 25 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर किधर से सुबह शाम बुरकाव करना चाहिए।

तन बेधक कीट---- इस कीट के शिशु तने के अंदर प्रवेश कर अंदर ही अंदर कोशिकाओं को खा जाती हैं जिसके कारण पौधे के शीर्ष सूखकर नष्ट हो जाते हैं।
रोकथाम--- (1)- सहनशील प्रजातियों जैसे- साकेत, आई आर-8 आज की बुवाई करना।
(2)- रासायनिक नियंत्रण के लिए एंडोसल्फान 35 ई सी की उपरोक्त मात्रा का प्रयोग करना चाहिए।

धान के प्रमुख रोग तथा उनका नियंत्रण

खैरा रोग--- यह रोग खेत में जस्ते या जिंक की कमी के कारण होता है। इसमें मध्य एवं नई पत्तियों का आधार पहले पीला पड़ता है फिर यह नोक की ओर बढ़ता है। इसकी कमी की स्थिति में पत्तियों पर अनियमित आकार के कत्थई धब्बे दिखाई देते हैं। पौधा बोना रह जाता है और अंकुरण भी कम निकलते हैं।

नियंत्रण---- फसल में बुवाई से पहले 20 से 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से देना चाहिए अथवा खड़ी हुई फसल मैं लक्षण दिखाई देने पर 5 किलोग्राम जिंक सल्फेट के साथ 3 किलोग्राम चूना को 800 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।

झोका रोग--- इस रोग के कारण पत्तियों पर आंख के आकार के दबे बनते हैं जो किनारों पर कत्थई और बीच में राख के रंग के होते हैं। गंभीर अवस्था में पुष्पवृन्तो, बालियों तथा तने पर काले भूरे रंग के धब्बे बनते हैं जो कभी-कभी महामारी का रूप ले लेते हैं।

नियंत्रण-- (1)- बोलने से पहले थीराम 200 ग्राम तथा कार्बेंडाजिम 1.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए।
(2)- बाली निकलते समय एक किलोग्राम कार्बेंडाजिम या 2 किलोग्राम डाईथेन एम-45 प्रति हेक्टेयर की दर से 10 दिन के अंतर पर दो-तीन छिड़काव करने चाहिए।

जीवाणु झूलसा----- इस रोग से पत्तियां किनारे एवं लोक की ओर सूखने लगती हैं सूखे हुए किनारे अनियमित आकार के होते हैं जो पत्ती के मध्य भाग की ओर बढ़ते हैं और पत्तियां सूख जाती हैं।
रोकथाम---(1)- बोने से पहले बीज को 4 ग्राम ट्राइकोडरमा विरिडी प्रति किलोग्राम की दर से उपचारित करना चाहिए।
(2)- नाइट्रोजन का प्रयोग बंद कर 75 ग्राम एग्रो मायसिन तथा 500 ग्राम कॉपर ऑक्सिक्लोराइड का 800 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।

शीथ झुलसा---- इस रोग से पत्तियों के शीथ पर अनियमित आकार के हल्के पीले धब्बे बनते हैं जो किनारे पर भूरे रंग के होते हैं। इस इस रोग के नियंत्रण के लिए एक किलोग्राम कार्बेंडाजिम उपरोक्त अनुसार प्रयोग करना चाहिए।

जीवाणु धारीदार---- इस रोग से पत्तियों पर नसों के बीच कत्थई रंग की लंबी लंबी अनेक धारियां बन जाती हैं। इस रोग के नियंत्रण के लिए जीवाणु झुलसा की भांति नियंत्रण करना चाहिए।

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