This is default featured slide 1 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 2 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 3 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 4 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 5 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

Thursday, 13 August 2020

अमरूद उगाने की पूरी जानकारी




अमरूद स्वाद में मीठा और स्वादिष्ट फल होने के साथ-साथ यें कई औषधीय गुणों से भरपूर भी होता है। अमरुद एक ऐसा फल है। जो भारत के ज्यादातर हिस्सों में उगाया जाता है। आज हम आपके साथ अमरूद को उगाने की पूरी जानकारी शेयर करने वाले हैं। अगर आप शहर में रहते हैं। और अमरुद के पौधे उगाना चाहते हैं। तो आप बड़ी आसानी से अमरूद के पौधे उगा सकते हैं।


अमरूद को किन-किन तरीकों से उगाया जा सकता है। -


■ अमरुद को बीज से भी बड़ी आसानी से उगाया जा सकता है।


■ अमरुद को बीज के साथ-साथ कटिंग से भी उगाया जा सकता है। कटिंग से अमरुद के पौधे काफी जल्दी तैयार हो जाते हैं। कटिंग से तैयार किए गए अमरूद के पौधों पर सिर्फ 1 वर्ष में फल भी आने लगती हैं।


■ अमरुद के पौधे एयर लेयरिंग के द्वारा भी तैयार किया जा सकता है। एयर लिरिंग से तैयार किए गए पौधों पर और भी जल्दी फल आने लगते हैं। अगर आप घर पर अमरुद लगाने की सोच रहे हैं। तो आप अमरुद के पौधे कटिंग से लगाइए या फिर एयर लिरिंग के द्वारा अमरूद बीज से grow होने में काफी समय लेता है। और बीच से grow किए गए अमरूद के पौधों पर कम से कम 3 साल बाद फल आना शुरू होते है।




■ अमरुद के पौधे आप नर्सरी से भी खरीद सकते हैं।

अमरूद लगाने का सही समय -

 अमरुद दो मौसम में उगाया जाता है। गर्मी और बरसात गर्मी के मौसम में अमरुद लगाने के लिये मार्च में इनकी seeding तैयार की जाती है। बरसात के मौसम के लिये मई जून के महीने में आप अमरूद की seeding तैयार कर सकते हैं। अमरुद को कटिंग और एयर लेयरिंग के द्वारा मार्च से लेकर सितंबर तक कभी भी उगा सकते हैं


 गर्मी के मौसम ➡️  मार्च में बीज लगायें

 बरसाती मौसम ➡️  मई में बीज लगायें 


 अमरूद कहां पर लगाएं -

अगर आपके पास खुद का बगीचा है। तो आप उस बगीचे में अमरुद के पौधे लगा सकते हैं। अमरुद के पौधे आपको जमीन पर 8 से 10 फीट के अंतर पर लगा सकते हैं। अगर आप शहर में रहते हैं। और अमरुद के पौधे भी लगाना चाहती हैं। लेकिन खुद का बगीचा ना होने के कारण आप अमरुद के पौधे नहीं लगा पाते। लेकिन अब आप गमलों में भी काफी बढ़िया अमरुद उगा सकते हैं। आजकल अमरुद में कुछ अलग किस्म की वैरायटी भी आ गई है। जिन्हें आप गमले में लगा सकते हैं। और उन अमरूद के पौधों से अधिक मात्रा में फल और फूल प्राप्त कर सकते हैं। गमले में अमरूद लगाने के लिये कम से कम 18 इंच का गमला या फिर उससे बड़े गमले प्रयोग करें।


 गमले के लिए अमरूद की प्रजाति -

अगर आप अमरुद के पौधे छत पर गमलों में लगाना चाहते हैं। तो ताइवान किस्म या इजराइली अमरुद के पौधे लगाएं। यह दोनों अमरूद की प्रजाति गमलों में बड़ी आसानी से लग जाती हैं। और इन अमरूद के पौधों पर बहुत बड़े-बड़े अमरुद भी आते हैं। जो खाने में बहुत ही स्वादिष्ट होते हैं। अमरूद के पौधों को ज्यादा देखरेख की आवश्यकता नहीं होती है।

यह भी जानिए -
अगर आप बागवानी या खैती करते है। तो आजकल फसल का बीमा काफी जरूरी हो गया है। भारत में किसान अक्सर बीमा को नजर अंदाज करते है।अमरीका में फसल बीमा की दर 80-90% है। यानी कि लगभग हर किसान बीमा का फायदा लेता है। चीन में भी फसल बीमा करवाने की दर बढ़ रही है। आप भी अगर खैती करते है। तो आप फसल बीमा जरूर कराएं। आजकल सरकारी कंपनी के अलावा निजी क्षेत्र की अनेक कंपनी फसल बीमा और farming beema कर रही है। 
farming बीमा करने वाली कुछ कंपनियां

hdfc agriculture insurance
view hdfc ergo policy online
view hdfc ergo policy online
hdfc ergo insurance
csc crop insurance
hdfc agriculture insurance




अमरूद लगाने के लिए गमले का आकार -

गमलों में पौधे लगाने के लिये मिट्टी का गमला सर्वोत्तम होता है। अगर आपके पास मिट्टी का गमला नहीं है। तब आप सीमेंट का गमला या प्लास्टिक का गमला ले सकते हैं। गमले में अमरूद के पौधे लगाने के लिये कम से कम 18 इंच का गमला प्रयोग में लाना चाहिए है। या फिर उससे बड़ा गमला




अमरूद को लगाने के लिए गमले की तैयारी -

 अमरुद को गमले में लगाने से पहले गमले की निचली सतह में पानी निकलने के लिये ज्यादा से ज्यादा छेद होने चाहिए। अगर गमले में छेद नहीं होंगे। तो अमरुद के पौधे का उचित विकास नहीं होगा। गमले की तली में जो छेद होते हैं। उन छेदों से पानी ही नहीं निकलता बल्कि हवा का भी आगमन होता है। जिससे पौधे की जड़ें काफी तेजी से विकास करती हैं।

अमरूद के लिए मिट्टी की तैयारी -

 गमलों में अमरूद लगाने के लियें सबसे जरूरी और महत्वपूर्ण होता है। मिट्टी की तैयारी आपको अपने बगीचे की नार्मल मिट्टी (50%) और कंपोस्ट खाद (30%) (20%) रेतीली मिट्टी तीनों को आपस में मिक्स करके मिट्टी तैयार करें। और इस मिट्टी को किसी गमले में भरकर मिट्टी को एक समान कर लें।


अमरूद को गमले में लगाने की विधि -

अब आपको एक अमरूद का पौधा लेना है। और फिर आपको लेना है। वह गमला जिसमें हमने मिट्टी तैयार करके भरी हुई थी। उस गमले में आपको एक गड्ढा बनाना है। और उसी गड्ढे में आपको अमरूद का पौधा लगा देना है। अमरूद का पौधा लगाने के बाद आप उसमें भरपूर पानी दीजिए। पानी लगाने के बाद आप उस गमले को 2 से 3 दिन के किये छांव में रखें। फिर उस गमले को आप धूप में रख सकते हैं।



अमरूद लगाने की विधि -

■ अमरुद के पौधों के आस पास सफाई रखें। इसके लिए प्रत्येक पौधे के लगभग 1•5 से 2 फीट चारों ओर निराई गुड़ाई कर खरपतवार हटा दें।


■ गमले में लगा अमरूद का पौधा 25 से 30 दिन का हो जाए। तब आपको अमरुद के पौधे में पहली बार खाद देनी है। एक अमरुद के पौधे में आपको खाद की मात्रा 200 ग्राम रखनी है। दूसरी बार खाद आपको पौधे में 80 से 85 दिन बाद देनी है। इस बार आपको खाद की मात्रा 50 ग्राम बढ़ा है। अब आपको अमरुद के पौधे में 2 महीने में एक बार खा देनी है। खाद आपको 500 ग्राम के करीब देनी है।


■ प्रत्येक महीने अमरुद के पौधे का निरीक्षण करें। की उसमें कोई दीमक तो नहीं लगी। या उसमें सबसे ऊपर की छोटी-छोटी कोमल पत्तियों काली तो नहीं पड़ रही। अगर ऐसा है। तो तुरंत उचित उपाय करें।



अमरूद लगाने की विधि -

 आमतौर पर अमरूद के पौधों में जिंक या बोराॅन की कमी देखी जाती है। अमरूद के पौधों में जिंक की कमी होने पर अमरूद के पौधों की बढ़वार रुक जाती है। टहनियां ऊपर से सूखने लगती है। अमरुद के पौधे पर फूल भी कम बनने लगते हैं। और फल भी फटने लगते हैं। जिंक की कमी से ग्रसित पौधे में सामान्य रूप से फल नहीं लगते हैं।


 खाद देने का तरीका - 

■ सर्दी और वर्षा ऋतु में फूल आने के 15 दिन पहले 500 ग्राम जिंक सल्फेट प्रति पौधे डालनी चाहिए।


■ अमरुद के पौधे पर फूल खिलने से पहले एक बार 15 दिनों के अंतराल पर 0•2 से 0•4 प्रतिशत जिंक सल्फेट का छिड़काव करना चाहिए।



Friday, 31 July 2020

कैसे करे धान की खेती

कैसे करे धान की खेती


धान विश्व की सर्वाधिक महत्वपूर्ण अन्य वाली फसल है। विश्व की आधी से अधिक जनसंख्या का प्रमुख भोजन चावल है। भारत में कुल कृषि क्षेत्रफल के लगभग एक तिहाई भाग पर धान की खेती की जाती है। भारत में इसकी खेती प्राचीन काल से होती आ रही है। प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में इसका अनेक बार वर्णन किया गया है इसका प्रयोग प्राचीन काल से आज तक शुभ अवसरों पर अक्षत के रूप में प्रयोग होता आया है। चावल में 8% प्रोटीन, 73% स्टार्च,2.2 % बसा,11.8 % सेल्यूलोज पाया जाता है।


धान के लिए आवश्यक जलवायु

धान की फसल के लिए नमी युक्त गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है इसकी वृद्धि एवं विकास के लिए 20 से 35 सेंटीग्रेड तापमान होना चाहिए। इसकी खेती के लिए 130 से 150 से मी औसत वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र अधिक उपयुक्त होते हैं।


धान के लिए उपयुक्त मिट्टी

धान की खेती के लिए भारी दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है यह विभिन्न प्रकार की मिट्टियों में जैसे--- चिकनी हल्की दोमट, दोमट , कंकरीली तथा क्षारीय मिट्टी में उगाया जाता है। किंतु पर्याप्त जीवांश पदार्थ वाली ऐसी मिट्टियां जिनकी जल धारण क्षमता अधिक हो धान के लिए अच्छी होती है।


धान की नवीनतम प्रजातियां

उन्नत प्रजातियां---  नरेंद्र  ऊसर-3, विवेक धान-62, वसुंधरा भवानी, दीप्ति, श्रावणी, सूर्या ,नीरजा ,भागीरथी, पूसा सौगंध पवित्र ,पंचमी, RH-204, हजारी धान, मालवीय बासमती , भूतनाथ, VL धान-65,चंद्रहासिनी ,शुष्क सम्राट ,MTU-1075

संकर धान की प्रजातियां----- अजय, हरियाणा संकर धान-1, राजलक्ष्मी , इंदिरा सोना,PA-103, HRI-120, पूसा HR-10,

धान की खेती के प्रकार

धान की खेती दो प्रकार से की जाती है-

धान की पौध की रोपाई विधि-


रोपाई के लिए पौध तैयार करना--
- धान की पौध उपजाऊ तथा जल निकास वाले ऐसे खेत में डालनी चाहिए जो कि सिंचाई के स्रोत के पास हो। एक हेक्टेयर क्षेत्रफल की रोपाई करने के लिए धान की महीन चावल वाली किस्मों का 30 किलोग्राम मध्यम दाने वाली किस्मों का 40 किलोग्राम और मोटे दाने वाली किस्मों का 50 किलोग्राम बीज की पौध तैयार करने की आवश्यकता होती है। एक हेक्टेयर में रोपाई करने के लिए लगभग 500 से 600 वर्ग मीटर में नर्सरी डालनी चाहिए।
धान की पौध तैयार करने के लिए जया, पंत धान-4, आई आर-8, जैसी मध्यम देर से पकने वाली किस्मों को मई के अंत या जून के शुरू में ही नर्सरी में बो देना चाहिए। जल्दी पकने वाली किस्मों जैसे-- गोविंद, साकेत -4, रत्ना आदि की बुवाई 10 से 15 जून के आसपास करनी चाहिए। नर्सरी में 100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50 किलोग्राम फास्फोरस प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए।
बुवाई के 10 से 15 दिन बाद खैरा रोग तथा सफेदा रोग के लिए छिड़काव अवश्य करना चाहिये। खैरा रोग के लिए 5 किलोग्राम जिंक सल्फेट का 20 किलोग्राम यूरिया का या 2.5 किलोग्राम बुझे हुए चूने के साथ 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर नर्सरी में छिड़काव करना चाहिए। नर्सरी में लगने वाले कीट से बचाव के लिए 1 लीटर सुमिथियान 55 ई सी या 1 लीटर एंडोसल्फान 35 ईसी का 600 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रत्येक 2 ईयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।


धान की पौध तैयार करने की दो प्रमुख विधियां हैं--


भीगी विधि--- इस विधि द्वारा पौध तैयार करने के लिए खेत में पानी भरकर दो या तीन बार जुताई करते हैं जिससे मिट्टी लेहे युक्त हो जाए और खरपतवार नष्ट हो जाए। आखरी जुताई के बाद पाटा लगाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए। 1 दिन बाद जब मिट्टी की सतह पर पानी ना रहे तब खेत को 1 मीटर चौड़ी तथा 8 मीटर लंबी क्यारियाॅ बनाते  हैं। जिससे बुवाई, निराई सिंचाई तथा आदि क्रियाएं आसानी से की जा सके। बीज की दर प्रत्येक क्यारी में जया, आई आर-8 हाथी मोटे दाने वाली किस्मों में 800 ग्राम रत्ना, साकेत-8, गोविंद आज पतले दानों वाली किस्मों में 600 ग्राम रखना चाहिए। बोने से पहले 10 वर्ग मीटर क्षेत्र की दर से 250 ग्राम यूरिया तथा 500 ग्राम सुपर फास्फेट अच्छी तरह मिला देना चाहिए।
अंकुरित बीजों को समान रूप से बिखेर कर बोना चाहिए। वर्षा के कारण अगर बीज पानी में डूब जाए तो अनावश्यक पानी निकाल देना चाहिए।

शुष्क विधि---  अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में शुष्क विधि अपनानी चाहिए। इसमें खेत को शुष्क अवस्था में तैयार करते हैं। तीन चार बार जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बना लिया जाता है।
खेत को समतल करके भीगी विधि मैं दिए गए आकार के अनुसार 20 सेमी ऊंची क्यारियां बनाने चाहिए तथा मेल की जगह 30 सेमी चौड़ी नाली बनानी चाहिए। सूखा बीज 10 सेमी की दूरी पर लाइनों में 2 सेमी गहरा वह देना चाहिए। बीज खाद आदि की मात्रा भीगी विधि के अनुसार ही प्रयोग करनी चाहिए।

डेपोग विधि----  यह विधि फिलीपींस में प्रचलित है। इस विधि की विशेषता यह है कि पौधे को बिना मिट्टी के माध्यम से उगाया जाता है। थोड़ा अंकुरित होकर के बीजों को लगभग आधा सेमी मोटी परत को केले के पत्ते, पॉलिथीन की चादर अथवा सीमेंट के फर्श पर बिछाकर उसमें प्रतिदिन पानी देते रहते हैं। ऐसे चिड़ियों के बचाव से दूर रखा जाता है। पौधे को तैयार करने में किसी भी उर्वरक अथवा खाद की आवश्यकता नहीं पड़ती है। यह पौध 2 सप्ताह में तैयार हो जाती है। इस विधि द्वारा पौधे उगाने में श्रम एवं समय दोनों की बचत होती है।

धान की रोपाई

खेत की तैयारी--- धान की पौध की रोपाई करने से पहले खेत में पानी भर कर दो या तीन बार पडलर चलाना चाहिए, जिससे मिट्टी मुलायम तथा लेहयुक्त हो जाए। इसके बाद पाटा चलाकर खेत को समतल कर लिया जाता है। इसके बाद उर्वरकों को मिश्रण बनाकर खेत में समान रूप से बिखेर कर उसमें पडलर चलाकर 15 सेमी की गहराई तक मिट्टी में अच्छी तरह से मिला देते हैं जिसके कारण उर्वरकों का विशेष रूप से नाइट्रोजन कॉलेज बहुत कम होगा।
धान की पौध को रोपाई से पहले खेत में अच्छी प्रकार से लेह लगाना या कीचड़ करना अति आवश्यक होता है निम्नलिखित लाभ होते हैं--
(1)- इससे खेत में पानी का रिसाव बहुत कम हो जाता है और पानी की बचत होती है।
(2)- खेत में खरपतवार तथा कीड़े नष्ट हो जाते हैं।
(3)- पौध के कल्ले अधिक संख्या में निकलते हैं।


रोपाई का समय एवं पौध की उम्र
मध्यम अवधि की बोनी उन्नतशील प्रजातियों की 20 से 25 दिन आयु की पौध रोपाई के लिए उपयुक्त रहती है। देशी तथा देर से पकने वाली प्रजातियों की 30 से 35 दिन की पौध रोपाई के लिए उपयुक्त रहती है। ऊसर भूमि में रोपाई के लिए कम से कम 35 दिन की पौध प्रयोग करनी चाहिए। इससे कम उम्र की कोमल पौध प्रयोग करने से भूमि में उपस्थित लवणों के कारण पौध जलकर नष्ट हो जाती है।

● पौध रोपाई की दूरी व गहराई--
बोनी प्रजातियों की पौध की रोपाई 3 से 4 सेमी अधिक गहराई पर नहीं करनी चाहिए अन्यथा कल्ले कम निकलते हैं और फसल देर से पकती है जिसके फलस्वरूप उपज में कमी आ जाती है। पौध की रोपाई करते समय खेत में हल्का पानी होना चाहिए। साधारण उर्वरा शक्ति वाली भूमि में पंक्तियों वा पौधों की दूरी 20 × 10 सेमी तथा अधिक उर्वर भूमि में 20 ×15 सेमी रखें। साधारण दशा में एक स्थान पर दो से तीन पौधे रोपने चाहिए। यदि रोपाई में देर हो जाए तो एक स्थान पर 3 से 4 पौधे लगाने चाहिए। यदि रोपाई कतारों में करना संभव ना हो तो प्रति वर्ग मीटर क्षेत्र में कम से कम 50 स्थानों में पौधों की रोपाई की जानी चाहिए अन्यथा पौधों की संख्या कम रह जाएगी।

खेत में सीधे बीज की बुवाई विधि-
कूडो में सीधे शुष्क बीज की बुवाई के लिए 90 से 110 दिन वाली प्रजातियों का ही चुनाव करना चाहिए। खेत में पलेवा करके या पहली वर्षा होने पर मध्य जून से जुलाई के प्रथम सप्ताह के बीच खेत की तैयारी करके 50 से 60 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से ली सैनी की दूरी पर बनी 4 सेमी गहरे कूडो मैं उपचारित बीज की बुवाई कर देनी चाहिए। उर्वरकों को खेत की तैयार बुवाई के समय ही कूडों में देना चाहिए। बाद में आवश्यकतानुसार सिंचाई या खरपतवार नियंत्रण करते रहना चाहिए।

सिंचाई अथवा जल प्रबंध---
धान की फसल को कुछ विशेष अवस्थाओं में रोपाई के बाद 1 सप्ताह तक अंकुरण फूटने तथा दाना भरते समय पानी की अधिक आवश्यकता होती है। इस समय खेत में 4 से 5 सेमी पानी भरा होना चाहिए। यदि वर्षा के अभाव के कारण पानी की कमी दिखाई दे तो सिंचाई अवश्य करनी चाहिए। कल्ले निकलने के समय खेत में 5 सेमी से अधिक पानी भरा रहना भी फसल के लिए हानिकारक होता है अतः जिन खेतों में पानी भरा रहता हो वहां जल निकासी का उचित प्रबंध होना चाहिए।

खाद तथा उर्वरक

धान की फसल नाइट्रोजन को अमोनिया रूप में प्राप्त करती है इसमें नाइट्रेट उर्वरकों का प्रयोग ना कर अमोनीकल उर्वरकों जैसे-- यूरिया तथा अमोनिया सल्फेट का प्रयोग करना चाहिए। फास्फोरस को सुपर फास्फेट तथा पोटाश को पोटेशियम सल्फेट के रूप में देना अच्छा होता है। इसके अतिरिक्त कंपोस्ट खाद या गोबर की खाद धान में प्रयोग करना सबसे अच्छा माना गया है इसके अतिरिक्त खलिया तथा सनई या ढैंचा की हरी खाद का प्रयोग लाभदायक होता है इसके अतिरिक्त धान के खेत में टालीपोट्रिक्स नामक नील हरित काय के प्रयोग
से 20 से 30 किलोग्राम नाइट्रोजन की प्रति हेक्टेयर बचत हो जाती है।

धान की निराई गुड़ाई --- 
खरपतवारो की समस्या ऊंची मिट्टी तथा सीधी धान बुवाई वाले खेतों में अधिक होती है जबकि लेह युक्त रोपाई वाले खेतों में यह समस्या कम होती है। ऊंची भूमियों में पहेली निराई गुड़ाई खुरपी आदि यंत्रों की सहायता से बुवाई के 20 से 25 दिन पर करनी चाहिए तथा दूसरी निराई गुड़ाई 40 से 45 दिन बाद करनी चाहिए।

कटाई तथा मड़ाई----
बालियां निकलने के 25 से 30 दिन बाद धान की लगभग सभी किस्में पक जाती हैं। जब दाने सख्त हो जाएं तो कटाई कर लेनी चाहिए। इस समय दाने में लगभग 20% नमी होती है कटाई से 15 दिन पहले सिंचाई बंद कर देनी चाहिए।
आज भी अधिकतर किसान धान को डंडे से पीटकर ही जाने निकालते हैं जबकि अब पैर से चलाए जाने वाले तथा शक्ति चालित यंत्र उपलब्ध हैं जिनकी क्षमता पुराने तरीकों से बहुत अधिक है। अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान ने ढोल के आकार का एक शक्तिशाली यंत्र बनाया है यह यंत्र मंडई तथा ओ साई दोनों ही क्रियाएं एक साथ करता है अतः हमें इसका प्रयोग करना चाहिए।

धान की पैदावार-- 
धान के विभिन्न  किस्मों की पैदावार अलग-अलग है। नई बोनी किस्मों में औसतन 40 से 60 कुंतल धान प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त होती है और देसी किस्मों की अच्छी खेती किए जाने पर 25 से 30 कुंतल प्रति हेक्टेयर पैदावार प्राप्त होती है। इसे ध्यान से लगभग 60 से 65% तक चावल प्राप्त हो जाता है।

धान के प्रमुख कीट

पत्ती लपेटक--- इस कीट की सुड़ियां पति के दोनों किनारों को जोड़कर नालीनुमा रचना बनाकर पत्ती को अंदर से खाती रहती है जिससे उसमें सफेद धारियां बन जाती हैं।
इस कीट की रोकथाम के लिए एंडोसल्फान 35 ई• सी• कि 1 लीटर मात्रा को 600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए ।

● सैनिक कीट------ इनकी सुड़ियां दिन में किल्लो में अथवा मिट्टी की दरारों में छुपी रहती हैं तथा रात में पत्तियों को अथवा बाली निकलने पर उनको काट कर गिरा देती हैं।
इस कीट की रोकथाम के लिए एंडोसल्फान 35 ई सी की उपरोक्त मात्रा का छिड़काव करना चाहिए।

●  गंन्धी बग----- इसे कीट के शिशु तथा प्रौढ़ बाली की दूधिया अवस्था में रस चूस लेते हैं। जिससे दाने नहीं बनते अगर दाने बनते हैं तो वह कठोर हो जाते हैं।
रोकथाम---- खेत खरपतवार मुक्त होना चाहिए तथा फूल आने के बाद मेलाथियान 5% की 25 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर किधर से सुबह शाम बुरकाव करना चाहिए।

तन बेधक कीट---- इस कीट के शिशु तने के अंदर प्रवेश कर अंदर ही अंदर कोशिकाओं को खा जाती हैं जिसके कारण पौधे के शीर्ष सूखकर नष्ट हो जाते हैं।
रोकथाम--- (1)- सहनशील प्रजातियों जैसे- साकेत, आई आर-8 आज की बुवाई करना।
(2)- रासायनिक नियंत्रण के लिए एंडोसल्फान 35 ई सी की उपरोक्त मात्रा का प्रयोग करना चाहिए।

धान के प्रमुख रोग तथा उनका नियंत्रण

खैरा रोग--- यह रोग खेत में जस्ते या जिंक की कमी के कारण होता है। इसमें मध्य एवं नई पत्तियों का आधार पहले पीला पड़ता है फिर यह नोक की ओर बढ़ता है। इसकी कमी की स्थिति में पत्तियों पर अनियमित आकार के कत्थई धब्बे दिखाई देते हैं। पौधा बोना रह जाता है और अंकुरण भी कम निकलते हैं।

नियंत्रण---- फसल में बुवाई से पहले 20 से 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से देना चाहिए अथवा खड़ी हुई फसल मैं लक्षण दिखाई देने पर 5 किलोग्राम जिंक सल्फेट के साथ 3 किलोग्राम चूना को 800 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।

झोका रोग--- इस रोग के कारण पत्तियों पर आंख के आकार के दबे बनते हैं जो किनारों पर कत्थई और बीच में राख के रंग के होते हैं। गंभीर अवस्था में पुष्पवृन्तो, बालियों तथा तने पर काले भूरे रंग के धब्बे बनते हैं जो कभी-कभी महामारी का रूप ले लेते हैं।

नियंत्रण-- (1)- बोलने से पहले थीराम 200 ग्राम तथा कार्बेंडाजिम 1.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए।
(2)- बाली निकलते समय एक किलोग्राम कार्बेंडाजिम या 2 किलोग्राम डाईथेन एम-45 प्रति हेक्टेयर की दर से 10 दिन के अंतर पर दो-तीन छिड़काव करने चाहिए।

जीवाणु झूलसा----- इस रोग से पत्तियां किनारे एवं लोक की ओर सूखने लगती हैं सूखे हुए किनारे अनियमित आकार के होते हैं जो पत्ती के मध्य भाग की ओर बढ़ते हैं और पत्तियां सूख जाती हैं।
रोकथाम---(1)- बोने से पहले बीज को 4 ग्राम ट्राइकोडरमा विरिडी प्रति किलोग्राम की दर से उपचारित करना चाहिए।
(2)- नाइट्रोजन का प्रयोग बंद कर 75 ग्राम एग्रो मायसिन तथा 500 ग्राम कॉपर ऑक्सिक्लोराइड का 800 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।

शीथ झुलसा---- इस रोग से पत्तियों के शीथ पर अनियमित आकार के हल्के पीले धब्बे बनते हैं जो किनारे पर भूरे रंग के होते हैं। इस इस रोग के नियंत्रण के लिए एक किलोग्राम कार्बेंडाजिम उपरोक्त अनुसार प्रयोग करना चाहिए।

जीवाणु धारीदार---- इस रोग से पत्तियों पर नसों के बीच कत्थई रंग की लंबी लंबी अनेक धारियां बन जाती हैं। इस रोग के नियंत्रण के लिए जीवाणु झुलसा की भांति नियंत्रण करना चाहिए।

Monday, 6 July 2020

इलायची की खेती

इलायची की खेती
इलायची उत्पादक देश में भारत का नाम पहले नंबर पर आता है ।भारत में इलायची का उत्पादन केरल तमिलनाडु और कर्नाटक में सबसे ज्यादा किया जाता है। इलायची का पौधा पूरे साल हरा भरा रहता है ।इसकी पत्तियां एक या 2 फीट लंबाई की होती हैं। इलायची का इस्तेमाल मुख शुद्धि और मसाले के रूप में किया जाता है ।इसकी खुशबू की वजह से इसका इस्तेमाल मिठाइयों में भी किया जाता है।


उपयुक्त मिट्टी--- इलायची की खेती के लिए मुख्य रूप से लाल दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है ।इसके अलावा उचित देखरेख और भी कई तरह की मिट्टी में इसकी खेती की जा सकती है ।इलायची की खेती के लिए मिट्टी का Ph मान 5 से 7 . 5 के बीच होना चाहिए।


इलायची के पौधे के लिए उपयुक्त जलवायु और तापमान---
इलायची की खेती के लिए उष्ण कटिबंधीय  जलवायु उपयुक्त होती है ।इलायची की खेती समुद्र तल से 600 से 1500 की ऊंचाई वाले स्थानों पर की जा सकती है इसकी खेती के लिए 1500 मी0 बारिश हवा में नमी और छायादार जगह का होना जरूरी है।

इलायची की उन्नत किस्में ----- इलायची की दो प्रजातियां पाई जाती हैं जिन्हें छोटी या बड़ी इलायची और हरी व काली इलायची के नाम से जाना जाता है।

(1) हरी इलायची----- हरी इलायची को छोटी इलायची भी कहते हैं। इसका उपयोग खाने में मुख शुद्धि, औषधि मिठाई और पूजा पाठ में किया जाता है इसके पौधे 10 से 12 साल तक पैदावार देते हैं।

(2) काली इलायची----- काली इलायची को बड़ी इलायची भी कहते हैं। बड़ी इलायची का इस्तेमाल मसाले के रूप में किया जाता है ।इसका आकार छोटी इलायची से काफी बड़ा होता है। इसका रंग हल्का लाल काला होता है ।काली इलायची में कपूर जैसी खुशबू आती है।

खेत की जुताई----  पहली जुताई मिट्टी पलट हल से करके तीन से चार जुदाईयां देसी हल या कल्टीवेटर से करके मिट्टी भुरभुरी तथा डेले रहित बना लेनी चाहिए।


इलायची की खेती की सिंचाई---- इलायची की खेती के लिए सिंचाई की अति आवश्यकता होती है। खेत की सिंचाई मौसम के हिसाब से करनी चाहिए ।गर्मी के मौसम में 5 से 6 दिन बाद एक सिंचाई करनी चाहिए ।जबकि सर्दी के मौसम में लगभग 12 से 15 दिन बाद सिंचाई करनी चहिए ।खेत में जल निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए ।जिससे बरसात का फालतू पानी खेत से बाहर निकाला जा सके।

इलायची के औषधि गुण----। आयुर्वेदिक  चिकित्सको के अनुसार इलायची के इस्तेमाल से स्वास, खांसी ,बवासीर, क्षय, पथरी आदि रोगों में किया जाता है ।

गले में खराश---- यदि आवाज बैठी हुई हो या गले में खराश है तो सुबह उठते समय पानी पिए और रात को सोते समय इलायची चबाकर खाएं तथा गुनगुना पानी पिए ।

गले में सूजन---- यदि गले में सूजन है तो मूली के पानी में छोटी इलायची का सेवन करने से गले में होने वाले रोगो से छुटकारा पाया जा सकता है ।


बीज कहां से खरीदें---- इलायची की खेती के लिए सबसे उपयुक्त बीज का ही चुनाव करें ।यह बीज किसी दुकान या संस्थान से खरीदा जा सकता है। बीज हमेशा अच्छी क्वालिटी के होने चाहिए। घटिया किस्म के बीज से किसान  पैदावार में ज्यादा मुनाफा नहीं ले पाते हैं ।और पैदावार भी कम होती है।

पौध तैयार करना-----  इलायची की खेती के लिए प्रारंभ में नर्सरी में पौधे तैयार किए जाते हैं । पौधों को तैयार करने के लिए नर्सरी से 10 सेंटीमीटर की दूरी पर पौधों को लगाना चाहिए। बीजों को खेत में बोने से पहले ट्राइकोडर्मा नामक रसायन से उपचारित कर लेना चाहिए। एक हेक्टेयर खेत के लिए एक से सवा किलो बीज की आवश्यकता होती है।


इलायची के पौधे के लिए खाद------- इलायची के पौधे के लिए गोबर खाद सबसे अच्छी होती है। कंपोस्ट खाद या ऑर्गेनिक खाद से उगाया गया पौधा काफी अच्छा और मजबूत होता है ।इसके कारण पौधे से हमें जो भी फल प्राप्त होते हैं वह पूर्ण रुप से स्वादिष्ट और सुंदर होते हैं। इसके अलावा किचन से निकले खाद्य पदार्थ के छिलके ,नीम की खली आदि का उपयोग खाद के रूप में कर सकते हैं।

फसल की कटाई और सफाई-----    इलायची के पौधे की कटाई उसकी पूरी तरह से पकने से पहले कर लेनी चाहिए। बीजू पौधों की कटाई के बाद उसकी सफाई की जाती है। उसके बाद इसके बीज  के कैप्सूल को 8 से 12 सेंटीग्रेड तापक्रम पर सुखाकर तैयार किया जाता है। इसके बीजों को धूप में सुखाकर और पारस्परिक तरीके से तैयार किए जाते हैं।

इलायची सुखाने की विधि
(1)  धूप में सुखाना----  इलायची को धूप में सुखाने से बेहतर होगा कि आप पैदावार होने के बाद इसको प्राकृतिक रूप से  सूखने दें लगभग 3 से 4 दिनों में आप इसको सुखा सकते हैं।

(2)  भट्टी बनाकर सुखाना-----  आप चाहे तो इसको सुखाने के लिए किसी एक कमरे का चुनाव कर सकते हैं बाद में इसमें तापमान को बढ़ाकर कमरे को बंद करके रखें भट्टी में कोयला या लकड़ी को जलाकर रखें इस विधि को अपनाकर आप चाहें तो इसे सुखा सकते हैं।

इलायची में लगने वाले कीट
  कैटरपिलर----- यह किट पौधे की पत्तियों को खाकर नष्ट कर देते हैं।
● शूट बोरर----- यह कीट पौधे की तनी में घुसकर उसे अंदर से खोखला कर देता है जिसके कारण पौधे सूखकर नष्ट हो जाते हैं।

शूट फ्लाई---- यह पौधे के तने में घुसकर छोटे-छोटे छेद बना देते हैं । जिससे तना पूरी तरह खराब हो जाता है । इसके अलावा थ्रिप्स और एकिड नामक कीट पौधे को काफी नुकसान पहुंचाते हैं।
रोकथाम----  इस कीट की रोकथाम के लिए 1 किलो वैशालीन के अवयव को 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर पौधे पर छिड़काव करने से इन कीटों से छुटकारा पाया जा सकता है।

Sunday, 21 June 2020

गन्ना की खेती




गन्ना की खेती

गन्ना चीनी का प्रमुख स्रोत है भारत में कपड़ा उद्योग के बाद चीनी उद्योग का दूसरा स्थान है। चीनी उद्योग से देश के कुल राष्ट्रीय आय में महत्वपूर्ण योगदान है। इसमें लाखों लोगों को रोजगार प्राप्त होता है तथा हमारे भोजन में ऊर्जा का मुख्य स्रोत भी  है। गन्ने का मुख्य उपयोग शक्कर या चीनी बनाने के लिए 35 से 55% तथा गुड़ बनाने के लिए 40 से 42% और चूसने एवं बीज के लिए 18 से 20% के लिए किया जाता है।
इसके अतिरिक्त इससे शराब भी बनाई जाती है और गन्ने की खोई से कार्डबोर्ड या गत्ता तथा कागज आज बनाए जाते हैं इसे जलाने के रूप में भी प्रयोग किया जाता है।
गन्ने की हरी पत्तियां जानवरों के चारे के रूप में तथा सूखी पत्तियों को छप्पर तथा खाद बनाने में प्रयोग किया जाता है


क्षेत्रफल एवं उत्पादन

गन्ना विश्व के लगभग सभी क्षेत्रों में उगाया जाता है किंतु भारत मैं इसकी खेती लगभग 5 मिलियन हेक्टेयर में की जाती है जिससे कुल 350 मिलियन टन गन्ना पैदा होता है। इसकी औसत हो पाजी 690 कुंतल प्रति हेक्टेयर है। क्षेत्रफल और उत्पादन की दृष्टि से भारत में गन्ना उत्पादन का उत्तर प्रदेश का प्रथम स्थान है। इसकी औसत उपाय 593 कुंतल प्रति हेक्टेयर है। भारत में गन्ने की प्रति हेक्टेयर सर्वाधिक उत्पादन तमिलनाडु राज्य की 1070 कुंतल प्रति हेक्टेयर है उत्तर प्रदेश में इसकी खेती सहारनपुर मेरठ गोरखपुर तथा रोहिलखंड मंडलों में सर्वाधिक होती है।

गन्ना के लिए आवश्यक जलवायु
गन्ना उष्णकटिबंधीय जलवायु का पौधा है। इसके लिए अधिक तापमान तथा चमकीली धूप सामान आर्द्रता और पाला रहती जलवायु उपयुक्त होती है। इसके अंकुरण के लिए 25 से 30 सेंटीग्रेड तापमान अच्छा होता है जबकि इसकी वृद्धि और विकास के लिए 32 से 37 डिग्री तापमान उपयुक्त होता है इसकी खेती 50 सेमी से 250 सैनी वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में जहां सिंचाई के साधन है वहां पर आसानी से की जा सकती है।

गन्ने के लिए मिट्टी तथा खेत की तैयारी
गन्ने के लिए दोमट मिट्टी का खेत सबसे बढ़िया होता है किंतु भारी दोमट मिट्टी होने पर भी गन्ने की अच्छी फसल हो सकती है खेत को तैयार करने के लिए एक बार मिट्टी पलटने वाले हल से जोत कर तीन चार बार हैरो चलाना चाहिए । बुवाई के समय खेत में नमी होना आवश्यक है। खेत में उचित जल निकास का साधन होना चाहिए।




गन्ने के लिए  बीज का चुनाव

गन्ने का पूरा थाना कभी भी नहीं बोया जाता है इसे सदैव टुकड़ों में काटकर बोया जाता है क्योंकि गन्ने मैं शीर्ष सुषुप्त अवस्था में पाई जाती है। यदि पूरा गन्ना बिना कांटे बो दिया जाता है तो केवल ऊपरी भाग ही अंकुरित हो पाता है निचला नहीं। गन्ने में कुछ हार्मोन ऐसे होते हैं जो पौधों में ऊपर से नीचे की ओर प्रभावित होते हैं। टुकड़ों में काटकर बोलने से इनका प्रभाव रुक जाता है तथा कालिका आसानी से अंकुरित हो जाती हैं।
गन्ने के तने को टुकड़ों में काटकर बोया जाता है। काटते समय तेज धार वाले गड़ासी से इस प्रकार काटते हैं कि गन्ने की गांठ या कलिका को कोई हानि ना पहुंचे। प्रत्येक टुकड़े में दो या तीन कलिका होनी चाहिए। डीजे ऐसी फसल से लेना चाहिए जो निरोगी हो तथा उसमें की आदि का प्रकोप ना हुआ हो और बीज शुद्ध तथा स्वस्थ हो।


गन्ना बोने की विधियां---

समतल खेत में गन्ना बोना --- चंचल खेतों में गन्ना की बुवाई हल्के पीछे पंक्तियों में करते हैं। इस विधि में गन्ने के लिए 75 से 90 सेमी की दूरी पर देशी हल द्वारा 8 से 10 सेमी गहरे कोड बनाए जाते हैं जिनमें गन्ने के टुकड़ों को सिरा से सिरा मिलाकर बो दिया जाता है। आटा चलाकर टुकड़ों को ढक दिया जाता है उत्तर भारत में इसी विधि का ज्यादा से ज्यादा प्रचलन है।

रिजर द्वारा बनाए गए कूँड में गन्ना बोना

इस विधि में गन्ना रिजर द्वारा 10 से 15 सेमी गहरे कूड  बनाए जाते हैं। गन्ने के टुकड़ों को इन कुंडों में बोकर ऊपर से 5 से 7 सेमी मिट्टी डाल देते हैं। इसमें बुवाई के तुरंत बाद पानी दे दिया जाता है। पाटा नहीं लगाया जाता। यह विधि पूर्वी उत्तर प्रदेश और दक्षिणी भारत में भारी भूमि के लिए प्रचलित है।

नालियों में गन्ना बोना

यह विधि गन्ने की अधिकतम पैदावार लेने के लिए उपयुक्त है। इस विधि द्वारा खाद व पानी की बचत होती है क्योंकि उस का अधिकतम उपयोग होता है गन्ना गिरता नहीं है। इस विधि में 90 से मी की दूरी पर मजदूरों द्वारा 20 सेमी गहरी नालियां बनाई जाती हैं। इन नालियों का निर्माण करने से 45 सेमी चौड़ी नाली व 45 सेमी चौड़ी और 15 सेमी ऊंची मैंने बन जाती हैं। नालियों में उर्वरक बिखेर कर मिला दिया जाता है। इसके बाद उपचारित टुकड़ों को नालियों में एक-एक करके वह दिया जाता है और मिट्टी से ढक देते हैं।


गन्ना बोने की दोहरी पंक्ति विधि

अच्छी उपज आयु एवं खाद तथा सिंचाई सुविधा वाले स्थानों के लिए भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान लखनऊ द्वारा विकसित गन्ना बोने की दोहरी पंक्ति विधि अधिक उपयोगी पाई गई है। दोहरी पंक्ति विधि में गन्ने के दो टुकड़ों को अगल-बगल बोलते हैं जिससे पौधे भरत तो बढ़ने से पैदावार में 25 से 60% तक वृद्धि होती है।

अंकुरित गन्ने के टुकड़ों का या रेग्यून्गन बुवाई हेतु प्रयोग

रेग्यून्गन शब्द जापानी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है एक आंख वाले अंकुरित गन्ने के टुकड़े की बुवाई। भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान लखनऊ ने शोध में पाया है कि यदि बुवाई से एक या दो माह पहले गन्ने के अंगोलो को काट दिया जाए तो ऊपर ही भाग से कल खाएं सक्रिय होकर तीन से चार पंक्तियों की हो जाती हैं फिर इन्हें 40 सेमी के लंबाई की तीन आंख के टुकड़ों को काट कर बोया जाए तो उपज अच्छी होती है।


बीज की दर--  

तीन आंख के लगभग 35000 से 40000 टुकड़े जिनका वजन गन्ने की मोटाई के अनुसार 60 से 70 कुंतल हो सकता है प्रति हेक्टेयर बुवाई के लिए पर्याप्त होते हैं। देर से बुवाई करने पर बीज की मात्रा को 25 से 50% तक बढ़ा देना चाहिए।

  गन्ने का बीज उपचार

बीज जनित्र बीमारियों से बचाव के लिए कटे हुए टुकड़ों को पारा युक्त रसायन जैसे -एरीटान 6% की 280 ग्राम, या एग लाल 3% की 360 ग्राम मात्रा को 112 लीटर पानी में घोलकर बीज को उपचारित करते हैं। इससे पहले टुकड़ों को 4 से 5 घंटे पानी में डुबोकर रखने से अंकुरण अच्छा हो जाता है।


 गन्ने के लिए खाद तथा उर्वरक

पोषक तत्वों की मात्रा का निर्धारण करने से पहले खेत का परीक्षण कराना आवश्यक होता है। अधिक लंबी अवधि की फसल होने के कारण गन्ना में कार्बनिक खाद्य जैसे हरी खाद या गोबर की खाद अथवा कंपोस्ट खाद ओं का उपयोग आवश्यक होता है हरी खाद या गोबर खाद द्वारा खेत में कम से कम एक तिहाई नाइट्रोजन की मात्रा की पूर्ति करनी चाहिए शेष पोषक तत्वों की पूर्ति उर्वरकों द्वारा करनी चाहिए। यदि मृदा का परीक्षण किसी कारणवश ना हो सके तो गन्ने की फसल को निम्न पोषक तत्व प्रदान करने चाहिए जैसे
150 से 180 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 से 80 किलोग्राम फास्फोरस, 20 से 40 किलोग्राम पोटाश और लगभग 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट की आवश्यकता पड़ती है।
खाद को फसल बोने के एक महीना पहले खेत में डालकर अच्छी तरह मिला देना चाहिए। उर्वरकों द्वारा नाइट्रोजन की एक तिहाई मात्रा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय तथा नाइट्रोजन की शेष मात्रा को कल्ले फूटते समय तथा अधिकतम वृद्धि की अवस्था में देना चाहिए।

गन्ने की सिंचाई---- उत्तर प्रदेश में गन्ने में सिंचाई के अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न मात्रा में आवश्यकता होती है प्रदेश के पूर्वी भाग में चार से पांच सिंचाई मध्य क्षेत्र में 5 से 6 सिंचाई पश्चिमी क्षेत्र में 7 से 8 सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है।


गन्ने की  निराई गुड़ाई--  

 अंकुरण बढ़ाने के उद्देश्य से गन्ने में अंकुरण से पहले ही खेत की गुड़ाई करनी पड़ती है जिससे खेत में वायु संचार तथा मृदा में नमी संरक्षण भी होता है। गन्ने में बरसात शुरू होने से पहले तक निराई गुड़ाई चार पांच बार करनी पड़ती है जिसे खुरपी या फावड़े की सहायता से कर सकते हैं।

खरपतवार नियंत्रण

फसल की प्रारंभिक अवस्था में है खरपतवारो का नियंत्रण आवश्यक होता है। इसके लिए ग्रीष्मकालीन फसल में दो से तीन तथा वर्षा कालीन फसल में तीन से चार निकाय गुड़ाई की आवश्यकता होती है। निकाय गुड़ाई का कार्य खुरपी फावड़ा आदि के द्वारा किया जा सकता है। निकाई गुड़ाई करने से खरपतवार नष्ट होने के साथ-साथ मृदा मैं वायु संचार बढ़ जाता है तथा मृदा नमी संरक्षण में भी लाभ होता है। 

रासायनिक विधि से खरपतवारो को नष्ट करने के लिए वैशालीन दवा का एक किलोग्राम सक्रिय अवयव को 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से बीज बोने से पूर्व खेत में छिड़क करें मिट्टी में मिला देने से प्रारंभ में खरपतवार अंकुरित नहीं होते हैं।

मेडी चढ़ाना एवं बांधना

वर्षा शुरू होने तक खेत में फसल पर एक बार मिट्टी चढ़ाने का कार्य पूरा कर देना चाहिए। दो पंक्तियों के बीच से मिट्टी उठाकर दोनों तरफ फसल पर 15 से 20 सेमी ऊंची मिट्टी चढ़ाने से फसल गिरने से बच जाती है। और वृद्धि एवं विकास अच्छा होता है जिससे उपज बढ़ जाती है।



गन्ने की कटाई 

गन्ने की फसल की कटाई उस समय करनी चाहिए जब उसमें मिठास की अधिकतम प्रतिशत हो। यह फसल की आयु बुवाई के समय आदि पर निर्भर करती है। कटाई हेतु गन्ना पकने की जानकारी प्राय रिफ्रैक्टोमीटर की रीडिंग से ज्ञात की जाती है। जब गन्ने में ब्रिक्स 17% से अधिक हो तो गन्ना कटाई योग्य माना जाता है।

गन्ने की पैड़ी का प्रबंध 

गन्ने की मुख्य फसल को कटाई के बाद तने के भूमिगत भाग पर स्थित कालियाँ अंकुरित होकर जब पुनः नई फसल उत्पन्न करती हैं तो उस फसल को पेडी कहते हैं। भारत में गन्ने का 30% से अधिक भाग पेडी से प्राप्त होता है जबकि उत्तर प्रदेश में यह लगभग 50% है। गन्ने में पैड़ी लेने के मुख्य भाग निम्नलिखित है--
(1)- पेडी रखने से खेत की तैयारी बीज एवं बुवाई का खर्च तथा समय बच जाता है।
(2)- पैड़ी की फसल में उत्पादन व्यय कम आता है।
(3)- पेडी की फसल में चीनी प्रतिशत अधिक पाया जाता है।
(4)- पेड़ी कम समय में पक कर तैयार हो जाती है ।
(5)- शीघ्र पकने के कारण चीनी मिलें पेराई शीघ्र शुरू कर देती है।
(6)- पेडी की फसल लेने से मुख्य फसल में दी गई खाद की मात्रा के अवशेष का उपयोग हो जाता है।



पैड़ी से हानियां--

● एक खेत में लगातार गन्ने की फसल वर्षों तक खड़ी रहने के कारण फसल पर कीटों तथा बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है 
● भूमि कमजोर या खराब हो जाती है।
● कभी-कभी फसल कमजोर होने से उपज कम प्राप्त होती है जिससे किसान को आर्थिक हानि का सामना करना पड़ता है

गन्ने की पेड़ी से अधिक उपज प्राप्त करने के लिए कृषि क्रियाएं

फसल का चुनाव---- बुवाई के लिए गन्ने की अच्छी निरोग शुद्ध तथा कीट व रोग रहित फसल का चुनाव करना चाहिए। बसंत काल में बोई गई फसल पैड़ी के लिए सर्वाधिक उपयुक्त होती है।

फसल की कटाई----- फसल की कटाई फरवरी से मार्च के महीने तक तेजधार हथियार से जमीन से सटाकर करनी चाहिए जिससे खेत में अधिक डंठल ना हो।

खेत की सफाई---- खेत में अनावश्यक ठूॅठो की छटाई, पत्तियों को इकट्ठा करके जलाना, खरपतवार को नष्ट करना खेत में बनी  मेड़ों को तोड़ना, फावड़े की सहायता से खेत में पड़े कूड़े करकट को इकट्ठा करके जलाना, आदि।


गन्ने के प्रमुख कीट एवं रोग तथा नियंत्रण

दीमक-- यह कीट बुवाई से कटाई तक कभी भी लग सकता है। यह गन्ने के बोए हुए टुकड़ों, जड़ तथा तने को काटकर वहां पर मिट्टी भर देता है।

नियंत्रण विधि--  इस कीट के नियंत्रण के लिए 4% फेनवैलेरेट की धूल का 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बोरगांव करना चाहिए अथवा एमेड़ा क्लोप्रेड 200 एसएल की 400 मिलीमीटर मात्रा को 2000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।

तना बेधक कीट----  यह कीट गन्ने के तने में छेद करके प्रवेश कर जाता है तथा उसे अंदर ही अंदर खाता रहता है गन्ना फाड़ने चीरने पर लाल रंग का दिखाई देता है यह कीट गन्ने को अधिक नुकसान पहुंचाते हैं।

नियंत्रण विधि--- जुलाई से अक्टूबर तक 15 दिन के अंतर पर ट्राइकोकार्ड का प्रयोग करें। अगस्त से सितंबर माह में मोनोक्रोटोफॉस की 2 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 1000 लीटर पानी में घोलकर 15 दिन में दो बार छिड़काव करें

कण्डुआ रोग--- इस रोग के कारण अगले की पत्तियां छोटी , पतली व नुकीली हो जाती है इसका अंगुली से लगाव एक समान दूरी पर इस प्रकार हो जाता है कि अंगोला पंखी नुमा लगता है। आगोले के सिरे से काले रंग का चाबुक जो कि एक सफेद पतली झिल्ली से ढका रहता है निकल आता है जिसकी लंबाई लगभग 1 मीटर तक हो जाती है।

नियंत्रण (1)- बीजोपचार करके टुकड़ों की बुवाई करना।
(2)- रोग रोधी प्रजातियों  को लगाना।
(3)- रोगी फसल से पेडी ना लेना।
(4)- रोग ग्रस्त पौधों को उखाड़ कर या जलाकर नष्ट कर देना

● उकठा रोग--- यह फफूंदी से फैलने वाला रोग है इससे प्रभावित गन्ने के अगोले शुरू में पीले पड़ने लगते हैं तथा धीरे धीरे पूरा अंगोला सूख जाता है और नीचे की ओर मुड़ जाता है। इन गन्नों की पोरियों का रंग हल्का पीला तथा अंदर से खोखला हो जाता है।

नियंत्रण--  इस कीट के नियंत्रण के लिए एगलाल या एरीटान से बीजोपचार करना।उचित फसल चक्र अपनाना। रोग रोधी किस्मों का प्रयोग करना।


पत्ती की लालधारी--- गन्ने की पत्तियों पर लाल अथवा भूरे रंग की समांतर धारियां निचली सतह पर पड़ जाती है। कभी-कभी धारियॉ इतनी अधिक हो जाती है कि पूरी लाल दिखने लगती है। पत्तियों का क्लोरोफिल समाप्त हो जाता है इस रोग से फसल की बढ़वार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

नियंत्रण--- (1) बीज उपचार करना।
(2)  रोग रोधी प्रजातियों की बुवाई करना।
(3) उचित फसल चक्र का प्रयोग करना।




   गन्ने का बीज उत्पादन----

(1)- गन्ने के आधार पर बीज उत्पादन के लिए प्रजनक बीज गन्ना नर्सरी से प्राप्त किया जा सकता है जो शुद्ध किस्म का हो, अर्थात रोग मुक्त होना चाहिए।
(2)- ऐसे खेत का चुनाव करना चाहिए जो उपजाऊ हो उचित जल निकास युक्त हो, तथा उसमें पिछले वर्ष से गन्ने की कोई फसल न की गई हो
(3)- बीज को 50 सेंटीग्रेड पर 2 घंटे तक फफूंदी नाशक दवा से उपचारित करने के बाद बुवाई करनी चाहिए।
(4)- गन्ने की अधिक उपज लेने के लिए 150 किलोग्राम नाइट्रोजन 100 किलोग्राम फास्फोरस तथा 75 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में प्रयोग करना चाहिए।
(5)- भूमि की किस्म तथा क्षेत्र की जलवायु के अनुसार सिंचाई की आवश्यकता होती है। खेत में उचित जल निकास की सुविधा होना अति आवश्यक है।
(6)- खरपतवार नियंत्रण के लिए रासायनिक दवाओं का प्रयोग करना चाहिए ।
(7)- उकठा व कंडुआ गन्ने के मुख्य रोग हैं। इनसे प्रभावित गन्ने के झुण्डों को कड़ाई से पूर्व निकाल कर नष्ट कर देना चाहिए।
(8)- कंसुआ, तनाबेदक ,दीमक गन्ने के प्रमुख कीट है। इनका नियंत्रण समय से रसायनों के प्रयोग से करना चाहिए।
(9)- आवाच्छनीय पौधों को समय-समय पर निकालते रहना चाहिए।
(10)- गन्ने की फसल 10 महीने की होने पर कटाई की जा सकती है। किंतु यह ध्यान रखना चाहिए कि कटाई ,छिलाई तथा ढुलाई के समय गन्ने की आंख को नुकसान ना होने पाए तथा कटा हुआ गन्ना अधिक समय तक धूप में ना रहने पाए। इसलिए बुवाई के समय ही गन्ने की कटाई करना अच्छा रहता है।



केला की खेती


केला की खेती
केला एक  बहुत प्राचीनतम पौधा है। जो प्राचीनकाल समय से ही भारतवर्ष मे उगाया जा रहा है। इसमे खनिज पदार्थ तथा विटामिन प्रचुर मात्रा मे पाये जाते है। हमारे देश मे हिंदुओं के सभी धार्मिक  तथा शुभ कार्यों मे केले को प्रमुख स्थान मिल है। कोई भी धार्मिक उत्सव या शादी विवाह ऐसा नहीं है जिसमे केले के पौधे अथवा पत्तों का प्रयोग न किया जाता हो।  केले के फलों का प्रयोग फल की तरह खाने मे,सब्जी के रूप मे,आटा,चॉकलेट ,फिग,चिप्स इत्यादि के रूप मे किया जाता है।
केले के लिए जलवायु 



केला उष्ण जलवायु का पौधा है। जो भू मध्य रेखा के दोनों तरफ गर्म तथा ठंडी जलवायु के क्षेत्रों मे अधिक मात्रा मे पैदा किया जाता है। जहां पर वर्ष अधिक होती है। यह मध्य तथा उत्तरी भारत मे ऐसे क्षेत्रों मे पैदा किया जाता है जहां पर गर्मियों मे गर्म व तेज हवाये चलती है। तथा जाड़ों मे पाला पड़ता है। 175 से 200 सेमी वर्षा वाले क्षेत्र इसके लिए उपयुक्त होते है। इसकी उचित वृद्धि व विकास के लिए औसत 25-27 सेन्टीग्रेट तापक्रम तथा 77 प्रतिशत आपेक्षिक आर्द्रता की आवश्यकता होती है। भारतवर्ष मे केले के लिए उत्तम जलवायु केरल,तमिलनाडू ,महाराष्ट्र तथा बंगाल मे उपलब्ध है। 


केले के लिए  मिट्टी 
केले की खेती सभी प्रकार की मिट्टी मे की जा सकती है। इसके लिए उर्वर,गहरी,बलुई तथा दोमट मिट्टी सर्वोत्तम होती है। नदियों के किनारे की भारी व जलोढ़  मिट्टी मे भी केले को सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। इसे हम अपने घर पर गमलों मे भी लगा सकते है।
केले की किस्म ---- उपयोग के आधार पर केले की जातियों को निम्नलिखित पाँच भागों मे विभाजित किया गया है--
[1] पकी हुई ताजी खाई जाने वाली ---अल्पना,हरीछाल,रथाली,रजेली,सफ़ेदबेलची,चम्पा,पुवन, अमृतसागर ,बसराई,मर्तमान,आदि।
[2] सब्जी के रूप मे खाई जाने वाली ------ हजारा मंथन,पचमोभ, माइण्डोली मंथन नेंद्रन चिनिया, अमृत भान काबुली, कोलंबो ,मुथेली ,मुंबई मुठिया, केपियर गंज आदि।
(3) चिप्स में प्रयुक्त किस्में।
(4) जैम बनाने के लिए किस्में।
(5) पाउडर बनाने में प्रयुक्त किस्मे।
केले की प्रमुख जातियों के गुण
●    पुवन----
इसे लालबेल्ची, चंपा ,चीनी चंपा आदि भी कहते हैं यह दक्षिण भारत, पश्चिम बंगाल तथा आसाम में उगाई जाती है। इसके पौधे लंबे होते हैं फल पतला तथा फल का छिलका पतला पीले रंग का होता है। फलों मैं अविकसित बीज भी पाए जाते हैं इसके फल गुच्छे में 200 से 220 फल आते हैं। यह पर्ण- चित्ती रोग के लिए प्रतिरोधी तथा टिकाऊ किस्मे है। यह दक्षिण भारत की सबसे लोकप्रिय किस्म है।
● रॉबस्टा--- इसके पौधे मध्यम ऊंचाई के होते हैं। इसकी खेती मुख्य रूप से महाराष्ट्र ,आंध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु में की जाती है। इसके पहले लंबे, गुच्छे सघन तथा गोदा मुलायम क्रीम रंग का होता है। यह  पर्ण चित्ती रोग से अधिक तथा पनामा रोग से कम ग्रसित होता है।
मंथन----- इसे बंकेश, कसादिया, कनचर केला आदि भी कहते हैं। इसकी खेती सब्जी के लिए केरल मदुरई तंजौर कोयंबटूर सूरत तथा बड़ौदा में की जाती है। इसके पौधे लंबे होते हैं। प्रतिफल गुच्छे इसमें 100 से 110 फल लगते हैं। इस की भंडारण क्षमता अधिक होती है।
हरी छाल------ ऐसे ही मुंबई ,मालभोग ,बनान व राजपुरी भी कहते हैं। इसकी खेती मुंबई तथा आंध्र प्रदेश के क्षेत्रों में की जाती है। इसके फल लंबे, सीधे तथा गहरे रंग के होते हैं। यह किस्म पर्ण चिट्टी रोग से अधिक ग्रसित होती है।
अल्पान----- इसका पौधा 3 से 4 मीटर तथा सफेद हरा, भारी लंबा कसा हुआ, फलियां मध्यम पकने पर पीली स्वादिष्ट खटास लिए हुए मीठी तथा टिकाऊ होती हैं।
नेंद्रन--- इसे बाना नेंद्रन, ऑटू नेंद्रन, राजेली आदि नामों से जाना जाता है। इसके पौधे लंबे ,फल बड़े व मोटे होते हैं। यह किस्म मालाबार कर्नाटक तथा कोचिन में अधिक होती है।


प्रवर्धन या प्रसारण----- केले का प्रसारण अधो भुस्तारी द्वारा वानस्पतिक तरीके से किया जाता है आधो- भूस्तारी  दो तरह के पाए जाते हैं-
(1) नुकीली वा पतली पत्तियों वाले----- यह अधो-भूस्तारी पतली नुकीली पत्तियों वाले तलवार की तरह होते हैं। देखने में कमजोर मालूम होते हैं लेकिन इनके आंतरिक रूप से यह अधिक ताकतवर होते हैं। प्रसारण के लिए इनका ही प्रयोग किया जाता है।
(2) चौड़ी पत्तियों वाले------- यह अधो- भूस्तारी चौड़ी पत्तियों वाले होते हैं। देखने में यह अधिक मजबूत एवं ताकतवर दिखाई देते हैं लेकिन ये आंतरिक रूप से कमजोर होते हैं। यह अधो भुस्तारी प्रसारण के लिए प्रयोग नहीं करने चाहिए।
रोपण---
पश्चिमी तथा उत्तरी भारत में केला लगाने का सबसे अच्छा समय जून-जुलाई है। दक्षिणी भारत केरल मालाबार मैं सितंबर से अक्टूबर तक तथा कर्नाटक और आंध्र प्रदेश तथा उड़ीसा में केला लगाने का सबसे उपयुक्त समय जून है।
रोपड़ का कार्य दो विधियों द्वारा किया जा सकता है-
(1) नालियों में रोपाई---- खेत की अच्छी तरह तैयारी करें 50 सेमी चौड़ी तथा 50 सेमी गहरी और 3 मीटर की दूरी पर नालियां बनाई जाती हैं। इन नालियों में किस्म के अनुसार एक या 2 मीटर की दूरी पर केले की रोपाई की जाती है।
(2) गड्ढों में रोपाई----- गड्ढों को 2 से 3 मीटर की दूरी पर पंक्तियां बनाकर 45×45×45 सेमी आकार के गड्ढे खोद लिए जाते हैं। इसमें ढाई सौ से 300 कुंतल प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर की खाद का भराव कर दिया जाता है प्रति गड्ढे 10 किलोग्राम गोबर की खाद तथा 100 ग्राम नाइट्रोजन, 80 ग्राम फास्फोरस, तथा 100 ग्राम पोटाश का भराव उपयुक्त होता है।
इन्हीं गड्ढों में केलो की रोपाई की जाती है।
खाद तथा तथा उर्वरक----
भूमि की उर्वरता के अनुसार प्रति पौधा 18 से 20 किलोग्राम गोबर की साड़ी खाद, 300 ग्राम नाइट्रोजन, 100 ग्राम फास्फोरस तथा 300 ग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है। गोवर की साड़ी खाद गड्ढे को भरते समय प्रयोग करें। फास्फोरस की आधी मात्रा रोपाई के समय सतह से आधी मात्रा रोपाई के बाद देनी चाहिए। नत्रजन की पूरी मात्रा पांच भागों में विभाजित कर अगस्त, सितंबर ,अक्टूबर ,फरवरी तथा अप्रैल महीने में देनी चाहिए। और पोटाश को तीन भागों में विभाजित कर सितंबर ,अक्टूबर तथा अप्रैल महीने में देनी चाहिए।
सिंचाई---- रोपाई के तुरंत बाद एक सिंचाई अवश्य कर देनी चाहिए, इसके बाद वर्षा ऋतु में वर्षा ना होने पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहें। जाड़ों में आवश्यकतानुसार 15 से 20 दिन के अंतर पर तथा ग्रीष्म ऋतु में हर 7 से 8 दिन के अंतर पर सिंचाई करते रहना चाहिए।
निकाई गुड़ाई व देखभाल---
केले के प्रारंभिक अवस्था में आवश्यकतानुसार निराई गुड़ाई कर खरपतवार को खेत से निकाल देना चाहिए। वर्षा  समाप्त होने के बाद पौधों पर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए जब तक पौधों में फूल बनाना प्रारंभ ना हो जाए तब तक पुतियों को नहीं बढ़ने देना चाहिए। कभी-कभी यह पौधे गिर भी जाते हैं। इन्हें गिरने से बचाने के लिए बांस या लकड़ी के सहारे का प्रयोग आवश्यक होता है ।
अंतरासस्य-----
पौधों को लगाने के पश्चात उद्यान में सनई को हरी खाद के रूप में बोया जा सकता है। ऐसा करने से भूमि कटाव से सुरक्षित रहती है एवं उसको जमीन में जोत कर खाद्य नत्रजन की मात्रा को भी बढ़ाया जा सकता है।
केले के पौधे की निचली पत्तियां आधी सूख जाती हैं जो सूर्य की रोशनी से इनकी रक्षा करती हैं। पत्तियों के  सूख जाने पर इसे तेज चाकू से काटा जा सकता है।


बहु वर्षीय फसल की वृद्धि के नियमानुसार करना----
फल वृक्ष को बहु वर्षीय बनाने के लिए जब पौधे पर फल आने लगे उस समय केवल एक स्वस्थ अधो-भूस्तारी को आगे वृद्धि के लिए छोड़ देना चाहिए। शेष अधो-भूस्तारी को तेज चाकू से काटकर अलग कर दें जब पैतृक वृक्ष के फल पक जावे उस समय दूसरे अधो-भूस्तारी के आगे वृद्धि करने देना चाहिए।
पैतृक वृक्ष के फल तोड़ने के बाद, काट देना चाहिए। उस समय पहला अधोभूस्तारी जो 5 से 6 महीने का होता है। पैतृक वृक्ष का स्थान ले लेता है। इस प्रकार से 6-6 महीने बाद एक-एक अधोभूस्तारी की वृद्धि करके इसकी बहु वर्षीय फसल को नियमानुसार किया जा सकता है।
मिट्टी चढ़ाना अथवा सहारा देना
बागवानी की निकाई कुड़ाई के बाद पौधों के चारों ओर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए जिससे पानी पौधों के तने से सीधे संपर्क में नहीं आते तथा पौधे को सहारा भी मिल जाता है। केले के फलों का गुच्छा भारी होने के कारण पौधे नीचे को झुक जाते हैं उन्हें सहारा ना देने पर गिर भी जाते हैं। पौधों को सहारा देने के लिए दो बांसों को आपस में बांधकर कैंची की तरह बना लेते हैं तथा फलों के गुच्छे में लगाकर सहारा देते हैं।
फूल और फल लगना----
केले के पौधे पर फूल एवं फल अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न भिन्न समय पर लगते हैं। दक्षिण तथा पश्चिम भारत में केले की अगेती किस्में रोपाई के लगभग 7 महीने बाद फूलने लगती हैं। केला फूलने के अगले 7 महीने के अंदर फलियां पक कर तैयार हो जाती हैं। इस प्रकार के लोगों की रोपाई के लगभग 14 महीने पश्चात फल उपलब्ध हो जाते हैं और दूसरी फसल 20 से 25 महीने के बीच तैयार हो जाती है। पौधे से फल के घेर को अलग कर लेने के बाद पौधे को भूमि की सतत से काट दिया जाता है। क्योंकि केले के पेड़ पर पूरे जीवन काल में सिर्फ एक बार फल लगते हैं। तने को एक बार में ना काट कर उसे दो या तीन बार में काटना चाहिए जिससे पुत्ती पर हानिकारक प्रभाव ना हो। ठेले पर लगने वाले पुष्प का रंग लाल होता है। स्कूल में नर और मादा दोनों ही पाए जाते हैं। किंतु इसमें निषेचन की क्रिया नहीं हो पाती जिससे फल में बीज नहीं बनता है।
कटाई----- जब फल पूर्णत  परिपक्व हो जाए  तो उसको हरी दशा में ही फलों के गुच्छे को तेज चाकू से काट लेना चाहिए। और बाजार में बिक्री के लिए भेज दिया जाता है।
फलों को पकाने----
                          केले को पकाने के लिए धार को किसी बंद कमरे में रखकर केले की पत्तियों से ढक देते हैं। एक कोने में उपले तथा अंगीठी जलाकर कमरे को गीली मिट्टी से सील कर देते हैं। रघुवर 48 से 72 घंटे में केला पक कर खाने योग्य हो जाता है। इस तरह केला पकाने से चित्तियां पड़ जाती हैं तथा उनमे मिठास अधिक हो जाती है। केले के ढेर पर 500 पीपीएम एथिल का छिड़काव करके ढेर को बोरे से ढक देने से केला अच्छी तरह पक जाता है।
उपाज------ केले की उपज जलवायु तथा जातियों पर अधिकतर निर्भर करती है। केले का औसत उत्पादन 300 से 400 कुंतल प्रति हेक्टेयर हो जाता है।
केले में लगने वाले कीट
तना छेदक---- इस कीट के ग्रब्स पौधे के तने में छेद करते हैं जिसके कारण सड़न पैदा हो जाती है।
इसके नियंत्रण के लिए फोरेट   या थीमेट 10 जी दानेदार कीटनाशी को प्रतिपदा 25 ग्राम प्रयोग करना चाहिए।
केले पर पत्ती बिटल----- यह कीट केले की पत्तियों को खाकर नुकसान पहुंचाते हैं। इसके नियंत्रण के लिए मिथाइल लो डीमेटऑन 25 ई० सी० को 1 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।
फल छेदक कीट-----  इस कीट के कैटरपिलर फल में नीचे की तरफ से छेद करके अंदर सुरंग बना देते हैं जिसके कारण फली सड़ जाती है। इस कीट के नियंत्रण के लिए 0.25%  सुमिसीडीन का छिड़काव करना चाहिए।
मूल छेदक सूत्रकृमि----ये सूक्ष्मजीव पतले धागे के समान होते हैं जो केले की जड़ों पर आक्रमण करते हैं और उन पर कांटे बना देते हैं जिससे पौधे की वृद्धि व विकास रुक जाता है।
रोकथाम---- पौधे के चारों तरफ गुड़ाई करके नीम की खली मिला दें या नेमागान का छिड़काव करें। उचित फसल चक्र अपनाएं।
केले में लगने वाले रोग तथा नियंत्रण
पनामा रोग--- यह केले का सबसे हानिकारक रोग है जो फ्यूजेरियम ऑक्सीपोरम स्पेक्ट्रम कुबेन्स नामक फफूंद के कारण होता है। इस रोग से प्रभावित पौधे में सर्वप्रथम नीचे की पुरानी पत्तियों पर हल्की पीली धारियां बनती है और वे टूट कर लटक जाती हैं। ऊपर की नई पत्तियों को छोड़कर सभी पत्तियां गिर जाती हैं। नई पत्तियों की सतह दागदार पीली तथा सिकुड़न दार होती है।
रोकथाम  (1)- रोग से प्रभावित पौधे को जड़ से उखाड़ कर नष्ट कर दें
(2)- नाइट्रोजन का उपयोग कम कर दें।
(3)- जिस खेत में यह रोक लगा हो उसमें 3 से 5 वर्ष तक केले की फसल ना करें।
(4)- बाविस्टिन  के 0.2 %  घोल को मिट्टी में मिलाना चाहिए।
(5)- खेत में पानी भर देने से इसका प्रभाव कम हो जाता है।
गुच्छा शीर्ष रोग ( बन्ची टॉप)--
        भारत में उन सभी क्षेत्रों में जहां पर केले की बागवानी की जाती है वहां पर इस रोग का प्रकोप देखा गया है ।यह वायरस से होने वाला एक भयानक रोग है। इस रोग से प्रभावित पौधे की पत्तियां छोटी एवं संकरी हो जाती है तथा उनके किनारे ऊपर की ओर मुड़ जाते हैं, पत्तियां छोटे डंठलो वाली हो जाती है एवं पौधे का ऊपरी सिरा एक गुच्छे में परिवर्तित हो जाता है। कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि यह रोग माइक्रो प्लाज्मा के द्वारा होता है।
रोकथाम-(1) रोग ग्रस्त पौधों को उखाड़ कर जला दें या मिट्टी में दबा दें।
(2) महू के कीट नियंत्रण के लिए मेलाथियान 50 ई सी के 0.1% घोल का छिड़काव करना चाहिए।
फल बिगलन या झुलसा रोग---
यह रोग एक फफूंदी द्वारा उत्पन्न होता है जिसे ग्यीयोस्पोरियम फ्यूजेरम कहते हैं। यह फफूंद नम मौसम मे मुख्य रूप से बरसात में काफी सक्रिय होता है। इस रोग से फलों के गुच्छे एवं डंठल काले हो जाते हैं तथा बाद में सड़ने लगते हैं।
रोकथाम---- इस रोग की रोकथाम के लिए कॉपर ऑक्सिक्लोराइड का 0.3% का छिड़काव करना चाहिए।
अंतः बिगलन----- 
यह रोग फफूंद द्वारा होता है। इस रोग से प्रभावित पौधों के अंदर की पत्तियां गल जाती है और नई पत्तियों के निकलने में रुकावट पैदा  करती है। इस प्रकार से पत्तियों का गलना अंदर की ओर बढ़ता चला जाता है और अंततोगत्वा फूल नहीं निकल पाता।
रोकथाम (1)- खेत में उचित जल निकास की व्यवस्था करें।
(2)-- पौधों को उचित दूरी पर लगाएं।
(3)-- डाईथिन m-45 के 0.25% घोल का छिड़काव करें।






काशीफल की खेती


काशीफल की खेती भारत में प्राचीन काल से की जा रही है इसके पके फलों को सामान्य ताप पर काफी लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है इसकी कोमल पत्तियों तथा फूलों से भी सब्जी बनाई जाती है इनके बीजों से कीटनाशक तैयार किए जा सकते हैं।

 जलवायु---सीताफल गर्म मौसम की सब्जी है इसकी खेती जायद तथा खरीफ दोनों मौसम में की जाती है। नेपाली के प्रति बहुत प्रभावित होती है इसके अंकुरण के लिए 20 से 21 सेंटीग्रेड तथा वृद्धि और विकास के लिए 22 से 25 सेंटीग्रेड तापक्रम उचित होता है।

भूमि एवं उसकी तैयारी---

यह फसल सभी प्रकार की मिट्टियों में उगाई जा सकती है। इसके लिए हल्की दोमट मिट्टी सर्वोत्तम मानी जाती है। भूमि में उचित जल निकास का होना आवश्यक होता है।
इसलिए खेत की तैयारी के लिए एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा 3-4 जुताइयाॅ कल्टीवेटर से करनी चाहिए प्रत्येक देसी हल्की जुताई के बाद पाटा लगाकर खेत को भुरभुरा बना लिया जाता है।

उन्नत किस्में----
पूसा विश्वास ,कोयंबटूर-1, कोयंबटूर-2 ,पूसा विकास , पूसा रत्नाकर ,पूषा अलंकार, सोलन बादामी ,आजाद कद्दू, पूसा शंकर ,सी॰एम-14,

 पूसा विश्वास ----
बीज बोने लगभग 120 दिन के अंदर फल पककर तैयार हो जाता है । फल गोल एवं मध्यम आकार के होते है। इनकी उपज 300 से 400 कुंतल तक मिल जाती है।

पूसा विकास --- यह  किस्म 125 दिन मे तैयार हो जाती है। फल गोल तथा छोटे आकार के होते है। यह किस्म व्यवसायिक उत्पादन के लिए उपयुक्त है। इस किस्म का औसत उत्पादन 300 कुंतल प्रति हेकटेर है।

अर्का चंदन----यह फल माध्यम आकार के जिनका औसत भार 2.5 से 3 किलोग्राम और फल दोनों सिरों पर कुछ दबा हुआ होता है। गूदा मीठा व अत्यंत मधुर गंध वाला होता है। इनमे विटामिन ए अधिक मात्रा मे पाया जाता है। इस किस्म की ऑसत उपज 325 कुंतल प्रति हेक्टेयर है।

अर्का सूर्यमुखी-----  इस किस्म के फल लगभग 110 दिन मे तैयार हो जाते है। फल छोटे,गोल चपटे व नारंगी रंग के होते है। फलों पर सफेद धारियाँ बनी होती है,गूदा सुगंधित एवं अधिक विटामिन सी वाला होता है। यह किस्म फल मक्खी के लिए अत्यंत प्रीतिरोधी होती है। इस किस्म का औसत उत्पादन 350 कुंतल प्रति हेक्टेयर है।

वी आर एम 5---- यह किस्म भारतीय अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली द्वारा तैयार की गई है। इसका गूदा गहरे हरे रंग का होता है। यह किस्म फफूंदी तथा कुकूम्बर ग्रीन मोटेल विषाणु की प्रतिरोधी किस्म है।

पूसा संकर --- -यह किस्म लगभग 120 दिन मे फसल देना शुरू कर देती है। इसके फल चपटे और भार मे लगभग 4.5 किलो के होते है। इनकी लताओं की लंबाई अधिक होते है। इस किस्म का उत्पादन 450 कुंतल प्रति हेक्टेयर है।

कोयंबटूर---- यह एक पछेती किस्म है। जो लगभग 125 से 135 दिनों मे तैयार हो जाती है। फल ग्लोब के आकार के मध्यम बड़े एवं आकर्षक होते है। प्रत्येक बेल पर 7 से 9 फल लगते है।


खाद तथा उर्वरक----
गोबर की सड़ी खाद   -------200 से 250 कुंतल प्रति हेक्टेयर
नाइट्रोजन        ---------    50 से 60 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर 
फास्फोरस-------'----         70 से 80 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर 
पोटाश    ----------------   50 से 60 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर
गोबर की खाद बीज बोने की तीन चार सप्ताह पूर्व खेत में मिला दे नाइट्रोजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा बीज बोने के समय खेत में अच्छी तरह से मिला देनी चाहिए नाइट्रोजन की आधी मात्रा जो पौधे पर तीन से चार पत्तियां आ जाएं तथा शेष नाइट्रोजन फूल निकलने के समय पौधों के चारों तरफ से टॉप ड्रेसिंग के रूप में देकर मिट्टी में मिला दें तथा बाद में सिंचाई कर दें।

बोने का समय
ग्रीष्मकालीन फसल  -------- जनवरी से मार्च तक 
वर्षा कालीन फसल----------- जून से जुलाई तक


बोने की विधि 
(1) ग्रीष्मकालीन फसल की बुवाई नालियों में की जाती है यह नालियां 70 से 75 सेमी चौडी 10 से 12 सेमी गहरी तथा 150 सेमी की दूरी पर बनाई जाती है नालियों में 2-3 बीज एक स्थान पर 60 सेमी की दूरी पर बोए जाते हैं।
(2) वर्षा कालीन फसल में 1.5 मीटर की दूरी पर थाले बनाकर एक स्थान पर तीन या चार बीज 3 से 5 सेमी की गहराई पर लगाए जाते हैं एक थाले से दूसरे थाले की दूरी 1 मीटर रखी जानी चाहिए।


सिंचाई तथा जल विकास---वर्षा कालीन फसल में आमतौर पर सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है यदि लंबे समय तक वर्षा ना हो तो आवश्यकतानुसार सिंचाई कर देनी चाहिए। ग्रीष्मकालीन में फसल की 5 से 7 दिन के अंतर से सिंचाई करनी चाहिए। 
वर्षा कालीन फसल के लिए जल निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए जिससे खेत के फालतू पानी को समय से बाहर निकाला जा सके।


खरपतवार नियंत्रण-------
ग्रीष्मकालीन फसल में दो से तीन तथा वर्षा कालीन फसल में तीन से चार बार निकाय गुड़ाई की आवश्यकता होती है निकाय गोडाई का कार्य खरपी तथा फावड़ा के द्वारा किया जा सकता है। निकाई गुड़ाई करने से खरपतवार नष्ट होने के साथ-साथ मिट्टी वायु संचार बढ़ जाता है तथा मिट्टी नमी संरक्षण में भी लाभ होता है।
खरपतवार को नष्ट करने के लिए वैशालीन दवा का एक किलोग्राम सक्रिय अवयव को 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से बीज बोने से पहले खेत में छिड़क छिड़क कर मिट्टी में मिला देने से खरपतवार अंकुरित नहीं होते हैं।


रोग नियंत्रण----

(1) मृदु रोमिल आसिता 
यह फफूंदी केवल पत्तियों पर आक्रमण करती है जिन क्षेत्रों में वर्षा अधिक होती है वहां पर इसरो का प्रकोप अधिक होता है। पत्तियों की ऊपरी सतह पर पीले से लेकर भूरे रंग के धब्बे पढ़ते हैं तथा निचली सतह पर रुई के सामान मुलायम वृद्धि होती है जिसके कारण पौधों पर फल कम लगते हैं।
रोकथाम--
इस रोग के नियंत्रण के लिए डाईथेन  M-45  के 0.2% के घोल का 10 से 15 दिन के अंतराल पर दो से तीन बार छिड़काव करते है।


पाउडर आशिता  --
इस रोग से पत्तियों पर सफेद तथा पीले रंग का पाउडर जैसा पदार्थ इकट्ठा हो जाता है और बाद में बादामी रंग बदल कर पत्तियां समाप्त हो जाती हैं।
रोकथाम---- इस रोग के नियंत्रण के लिए 0.3%  केराथेन का छिड़काव करना चाहिए।


कीट नियंत्रण

ऐपीलेकना कीट--- यह कीट फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं यह अंकुरित हो रहे छोटे पौधों को खाते हैं।
उपाय--- मैलाथियान के घोल का छिड़काव करना चाहिए।

तना छेदक कीट----इस कीट की सुडियाॅ रात में निकलते हैं जो कोमल तनों को जमीन की सतह से काट देती है।
उपाय---
इन कीटों से बचाव के लिए अंतिम जुताई के समय हेप्टाक्लोर 5% के घोल को 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में अच्छी तरह से मिला दे।

फल मक्खी ---- इस कीट की मादा अपने अण्डरोपक को फलों की ऊपरी सतह के ठीक नीचे प्रवेश कराकर अंडे देती है। वे अंडे फल के अंदर फूटते है। और उनसे मैगत निकलता है। जो फलों को अंदर ही अंदर खाता रहता है। जिससे फल खराब हो जाते है।

रोकथाम--- जब पौधे पर फूल आना प्रारंभ हो जाए उस समय सेविन दवा के 0.2 प्रतिशत घोल का 15 दिन के अंतराल पर 2 से 3  छिड़काव करने चाहिए।

माहू ---- ये अत्यंत छोटे-छोटे हरे रंग के कीट होते है। इनके शिशु तथा प्रौड पौधों के कोमल भागों से रस चूसते है। इन कीटों की संख्या बहुत तेजी से बडती है। पत्तियां पीली पड़ जाती है। यह कीट विषाणु के फैलाने का कार्य करता है। इस कीट का प्रकोप उस समय अधिक होता है जव तापमान सामान्य से कम हो और आर्द्रता अधिक हो।
रोकथाम---- इस कीट के नियंत्रण के लिए साइपर मेथन, के 0.15 प्रतिशत घोल का छिड़काव करना चाहिए। 

फलों की तोड़ाई-----सीताफल की कटाई पूर्ण रूप से पक जाने पर की जाती है जो बाजार की मांग पर आधारित होती है बीज बोने के 70 से 90 दिनों के बाद हरे फल तोड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं फल जब औसत आकार का हो जाए तो मुलायम अवस्था में ही तोड़ लेना चाहिए। लंबे समय के भंडारण के लिए फलों को उस समय तोड़ना चाहिए जब वह पूरी तरह से पक जाए।


बीज उत्पादन---
 सीताफल के शुद्ध बीज उत्पादन के लिए पृथक्करण की दूरी 400 मीटर रखनी चाहिए। जिससे दूसरी किस्म से पर परागण ना हो सके बीज लेने वाली फसल से आवांछनीय पौधों को प्रारंभिक अवस्था में ही निकाल देना चाहिए।

बीज उत्पादन वाली फसल से खरपतवार के साथ ही कीट एवं रोग नियंत्रण पर भी ध्यान रखना चाहिए फलों की कटाई पूर्ण रूप से पकने के बाद ही करें उसे कुछ दिनों तक रखने के बाद बीजों को गूदो से अलग करके साफ पानी से धोने के बाद धूप में सुखा लेना चाहिए। इस प्रकार 3 से 4 क्विंटल बीज प्रति हेक्टेयर प्राप्त होता है

मूली की खेती



भारतवर्ष में उगाई जाने वाली जड़ वाली सब्जियों में मूली का प्रमुख स्थान है इसकी जड़ पत्तियां एवं फलियां सभी का उपयोग किया जाता है मूली कब्ज को दूर करती है यह मूत्र को खोल कर लाती है और भूख भी बढ़ाती है सभी रोगों में मूली नित्य सेवन करने योग्य शाक  है। मूली में पाई जाने वाली चरपराहट मिथाइल आइसो थायो सायनाइड की उपस्थिति के कारण होती है।

पोषक मूल्य----
स्वास्थ्य की दृष्टि से मूली को मानव भोजन में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है मूली के संपूर्ण पौधे का किसी न किसी रूप में प्रयोग किया जाता है इसका उपयोग सब्जी सलाद पराठा आदि के रूप में किया जाता है।

जलवायु----मूली को सभी प्रकार के मौसम में उगाया जा सकता है इसकी यूरोपियन किस्मों को कम तापमान की आवश्यकता होती है जबकि एशियाई किस्मों को ऊंचे तापमान की आवश्यकता होती है मूली की अच्छी जुड़े बनने तथा अच्छे स्वाद के लिए 10 से 15 सेंटीग्रेड तापमान अच्छा रहता है।

भूमि----इसके लिए बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है बलुआ दोमट मिट्टी जिसमें जीवांश की मात्रा अधिक हो ऐसी मिट्टी में मूली की अच्छी पैदावार की जाती है।

उन्नत किस्में----
(1) एशियाई या उष्णकटिबंधीय समूह---'
इस वर्ग की किस्में मध्यम से लंबे आकार की चिकनी ठोस और चटपटी होती हैं ।यह गर्म स्थानों में वह उगाने के लिए उपयुक्त होती है । जैसे-- पूसा देसी ,पूसा चेतकी, जापानी सफेद ,कल्याणपुर ,पंजाब सफेद ,हिसार मूली ,मेघालय सिलेक्शन।

(2) यूरोपियन या शीतोष्ण समूह ----
यूरोपियन किस्मों की जड़ों का आकार छोटा, खाने में स्वादिष्ट और कम चटपटी होती हैं । यह ठंडे स्थानों पर उगाने के लिए बहुत ही उपयुक्त रहती है जैसे-- रैपिडरेड सफेद टिंण्ड, सफेद आईसीकिल ,पूसा हिमानी।

कुछ उन्नत किस्मों की विशेषताएं-----

पूसा चेतकी--:
इसकी जड़ें 15 से 20 सेमी लंबी ,पत्तियां हरी मध्यम आकार की और कटाव दार होती हैं । जड़ें बिल्कुल सफेद, चिकनी कोमल व कम तीखी होती हैं ,। मैदानी क्षेत्रों में इसे अप्रैल के अंत से अगस्त के शुरू तक उगाया जा सकता है।

कल्याणपुर-1--::इस किस्म की मूली सफेद रंग की होती है जो 22 सेमी लंबी बढ़ती है। इसे वर्षा व शरद ऋतु में उगाया जा सकता है। यह किस्म चेपा सरसों की आरा मक्खी और श्वेत रतुआ की मध्यम प्रतिरोधी किस्म है।

हिसार मूली-1 ----:
इसमें किस्म की बुवाई सितंबर से अक्टूबर तक की जाती है इसकी जड़ें सीधी लंबी और सफेद रंग की होती हैं यह किस्म बुवाई के 50 से 55 दिन बाद तैयार हो जाती है।

पूसा हिमानी---: 
यह किस्म पहाड़ी तथा मैदानी क्षेत्रों में बोई जा सकती है मैदानी क्षेत्रों में इसकी बुवाई दिसंबर से फरवरी तक तथा पहाड़ी इलाकों में पूरे वर्ष उगाया जा सकता है इसकी जड़ें 25 से 30 सेमी लंबी होती है बुवाई की 60 दिन बाद हे फसल तैयार हो जाती है।

सफेद आईसीकील---;यह किस्म ठंडी जलवायु के लिए उपयुक्त है इसकी जड़ें पतली और सफेद होती है जो ऊपर से नीचे की तरफ पतली होती जाती है इस किस्म की मूली बुवाई के 30 दिन बाद तैयार हो जाती है इसे बोने का उचित समय अक्टूबर से फरवरी तक होता है।

 भूमि की तैयारी---मूली की फसल भूमि के अंदर होती है इसलिए खेत की तैयारी अच्छी प्रकार से करनी चाहिए । पहली जुताई मिट्टी पलट हल से करके 3-4 जुताई कल्टीवेटर से करके मृदा भुर भुरी कर लेनी चाहिए।

खाद तथा  उर्वरक--- 250 मूली प्रति हेक्टेयर पैदावार बढ़ाने के लिए खेत में मृदा की जांच करना बहुत ही आवश्यक है । यदि भूमि की जांच ना हो सके तो उसमें 200 से 250 कुंतल गोबर की खाद 50 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन 40 से 50 किलोग्राम फास्फोरस और 40 से 50 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से देनी चाहिए गोबर की खाद  बीज बोने के  1 माह पूर्व  खेत में  अच्छी तरह से  मिला दे ।

बुवाई का समय---
मूली को साल भर उगाया जा सकता है। व्यावसायिक स्तर पर इसे मैदानी क्षेत्रों में सितंबर से जनवरी तक और पर्वतीय क्षेत्रों में मार्च से अगस्त तक बोया जाता है इस अवधि में मूली की बुवाई करने पर मूली अच्छी मुलायम और लंबी होती है जिसका बाजार में मूल्य अधिक होता है।

बीज बोने की विधि--मूली की बुवाई दो विधियों से की जाती है।
(1) मेड़ों पर बीज बोना--:
इस विधि में 30 से 40 सेमी की दूरी पर 25 सेमी ऊंची मेंडें बना ली जाती हैं मेडो के दोनो तरफ 2 से 3 सेमी की गहराई पर बुवाई की जाती है। बीज अंकुरण के बाद जब पौधों में दो पत्तियां आ जाएं तो पौधों को 8 से 10 सेमी की दूरी छोड़कर बाकी पौधों को निकाल दिया जाता है।

(2) कतारों में वुवाई करना--- 
खेत अच्छी प्रकार से तैयार करने के बाद उसमें क्यारियाॅ बना ली जाती हैं इन क्यारियो में 30 सेमी की दूरी पर कतारे बना ली जाती है इन  कतारों में बीज को लगभग 3 सेमी की गहराई पर बो देते हैं। जब पौधों पर दो से तीन पत्तियां आ जाएं उस समय 8 से 10 सेमी की दूरी पर एक स्वस्थ पौधे को छोड़कर शेष पौधों को निकाल देते हैं।

सिंचाई तथा जल निकास---बीज की बुआई के बाद खेत की सिंचाई करना आवश्यक है  अंकुरण के15-20 दिनों बाद पौधे जल का सर्वाधिक उपयोग करते हैं इस समय सिंचाई का विशेष रुप से ध्यान रखें । बरसात ना होने पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करेंं। और गर्मियों में एक सप्ताह के अंतर पर और सदियों में 10 से 15 दिन केेेे अंतराल पर सिंचाई करते रहनाा चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण-----
खरपतवार की मात्रा के अनुसार दो या तीन बार निकाई गुडाई मूली के लिए आवश्यक होती है बड़ी मूली वाली जातियों में मिट्टी चढ़ाई जाती है निराई गुड़ाई करते समय यदि पौधों की संख्या अधिक हो तो फालतू पौधों को निकाल देना चाहिए।
रसायन विधि से खरपतवार नियंत्रण हेतु  टोंक-ई-25 नामक खरपतवार नाशी का वुवाई के पूर्व छिड़काव किया जा सकता है   

कीट नियंत्रण------

माहू-- माहू पौधों के सभी कोमल भागो का रस चूसता है। यह पीले हरे रंग के छोटे-छोटेे कीट होतेे हैं जब आकाश में बादल छाए होते है और मौसम ठंडा होता हैै तो इस कीट का प्रकोप बढ़ जाता है।
रोकथाम---इस कीट की रोकथाम के लिए 1 लीटर मेलाथियान-50ई सी को 600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से फसल पर छिड़काव करें।

डायमंड बैकमोथा--
इस कीट की सुड़ियां पौधों की पत्तियां को खाई खाती हैं। इसे कीट का आक्रमण अगस्त से दिसंबर तक होता है यह सुडिंयां सिलेटी रंग की होती हैं ।
रोकथाम--
 इस कीट की रोकथाम के लिए साइपरमैथरीन घोल का छिडकाव करना चाहिए।

रोग नियंत्रण---

सफेद रतुआ--यह रोग फफूंदी के कारण होता है इस रोग से प्रभावित पौधों की पत्तियों पर सफेद या पीले से फफोले दार धब्बे बन जाते हैं जो बाद में मिलकर अनियंत्रित आकार के धब्बों का निर्माण करते हैं।
रोकथाम--
इसकी रोकथाम के लिए डाइथेन जेड-78 के 0.2% घोल का छिड़काव करें तथा रोग प्रतिरोधी जातियों को  उगाएं।

मोजेक रोग--यह रोग विषाणु के द्वारा होता है इस रोग से प्रभावित पौधों की पत्तियां धब्बे युक्त पीले रंग की हो जाती हैं तथा इसका आकार सामान्य से छोटा हो जाता है और पत्तियों की मोटाई भी बढ़ जाती है इस रोग के विषाणु कीटो द्वारा स्वस्थ पौधों पर पहुंचते हैं।

खुदाई---मूली की खुदाई उसकी उगाई जाने वाली किस्मों पर निर्भर करती है ।मूली की एशियाई किस्स में 40 दिन बाद खाने योग्य हो जाती हैं जबकि यूरोपियन किस्म 20 दिन बाद खाने योग्य हो जाती हैं मूली की खुदाई जड़ों की मुलायम अवस्था पर करनी चाहिए।



उपज----: मूली की उपज भूमि की किस्म भूमि की उर्वरता ,उन्नतसील किस्म, जलवायु आदि बातों पर निर्भर करती है। एशियाई किस्मों का औसतन उत्पादन 200 से 250 कुंतल प्रति हेक्टेयर तथा यूरोपियन किसानों का औसत उत्पादन 100 से 125 कुंतल प्रति हेक्टेयर है।

    बीज उत्पादन 

मूली का भारतीय एवं एशियाई जातियों का बीज मैदानी क्षेत्रों मे तथा यूरोपीय जातियों का बीज पहाड़ी क्षेत्रों मे तैयार किया जाता है। बीज तैयार करने की दो विधियाँ है-

[1] खेत मे ही पौधे को छोड़कर खेत मे ही कटाई करते समय उपयुक्त स्वस्थ पौधों की कटाई नहीं की जाती। उन्हे वही पड़ी रहने देना चाहिए। अन्य पौधे को निकाल दिया जाता है। तथा शेष पौधे मे सिचाई कर दी जाती है। कुछ समय बाद उनमे तने निकल आते है, जिन पर फूल तथा फलियाँ बनती है।

[2]  पुनः रोपाई ----

 चुने हुए पौधों को खेत से निकालकर किसी दूसरे स्थान पर पुनः रोपित कर देते है।यह रोपाई मध्य नवंबर से दिसम्बर के प्रथम सप्ताह तक करते है।  रोपाई के तुरंत बाद इनकी सिचाई कर दी जाती है। तथा आवश्यकतानुसार नत्रजन की कुछ मात्रा भी डाल दी जाती है। कुछ समय बाद इसमे तने तथा शाखाये निकल आती है। जिन पर फूल तथा फलियाँ बनती है। फलियाँ जब पककर सूख जाती है तब उनकी कटाई करके बीज प्राप्त कर लिया जाता है ।